एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के सफलतापूर्वक परीक्षण की घोषणा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शन पर आने को अंग्रेजी अखबार ‘टेलीग्राफ’ ने सही ही ‘मिशन बदहवासी’ का नाम दिया। चुनाव जीतने के लिए मोदी कोई भी नाटक कर सकते हैं। अभी तक ,इस तरह की घोषणाएं संबंधित विभाग के लोग करते रहे हैं। साल 2012 में जब अग्नि-5 का परीक्षण किया गया था तो डीआरडीओ के उस समय  के डायरेक्टर जनरल और वर्तमान में नीति आयोग के सदस्य डा वीके सारस्वत ने इसकी घोषणा की थी और परीक्षण की सफलता से जोश में आए कर्मचारियों ने सारस्वत को कंधे पर उठा लिया था। उनकी यह तस्वीर काफी लोकप्रिय भी हुई।
यह कोई गूढ रहस्य नहीं है कि क्यों मोदी घोषणा करने के लोभ को रोक नहीं पाए। एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गरीबों के खाते में हर महीने छह हजार डालने वाली अपनी न्याय स्कीम की घोषणा की थी। जाहिर है कि मोदी ने उसे चर्चा से बाहर करने के लिए ही यह काम किया। लेकिन यह सिर्फ इसी के लिए नहीं था। यह  भाजपा और आरएसएस के उस एंजेंडे का हिस्सा भी है जिसमें उनके सत्ता मंे रहने में बाधक को देशद्रोही साबित किया जाए और मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जाए जो पाकिस्तान को सबक सिखा सकता है और भारत को एक सैन्य महाशक्ति बना सकता है। सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी ढाल बनाना हर लोकतंत्र-विरोधी और तानाशाही की सत्ता का हथियार रहा है। हिटलर से लेकर अयूब खान और जिया-उल-हक तक इसे ही दोहराया जाता रहा है। उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए अपने देश को किस हाल में पहुंचाया, लोग इसे देख चुके हैं। क्या भारत में भी इस हथियार का इस्तेमाल करने दिया जाए?
सेना के शौर्य को बढा-चढा कर पेश करने और देश को युद्ध में झोेंक देने की रणनीति ने मानवता को कितना नुकसान पहुँचाया है और इन देशों को कहां पहुंचा दिया, इसका इतिहास गवाह है। देश की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का इस्तेमाल लोकतंत्र के विरोध में करने का उदाहरण हम देख चुके हैं।  हिटलर के सत्ता में आने के पहले से ही जर्मनी विज्ञान और तकनीक के मामले में दुनिया के सर्वाधिक उन्नत देशोें में था। ब्लूमबर्ग इंडेक्स ने तकनीक और विज्ञान में उसे 2015 में दुनिया का नंबर दो देश माना था। उसने बाद के वर्षों में भी शीर्ष के तीन देशों में स्थान बनाए रखा था। उसके यहां आइंस्टीन, मैक्स प्लांक और ओटो वान जैसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने विज्ञान की दुनिया ही बदल दी।
जर्मनी की इस वैज्ञानिक उपलब्धि का इस्तेमाल हिटलर ने देश और दुनिया की बर्बादी के लिए किया। उसने अपने देश के लोगों को यातना शिविर में पहुँचाया और दुनिया को असीम कठिनाइयों में डाला।
कुछ लोेगों को यह बढा-चढा कर कही गई बात लगेगी, लेकिन भाजपा का रास्ता  वही रास्ता है।  वह नेहरू के नेतृत्व में शुरू हुई विज्ञान की यात्रा को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध और इस उपमहाद्वीप में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फ़ैलाने के लिए करना चाहती  है।  इस विचार के श्रोत भारत की दलित, महिला और अन्य वचिंतों के खिलाफ चली आ रही जाति-व्यवस्था में हैं।   वार मेमोरियल, सर्जिकल स्ट्राइक और मिसाइल प्रक्षेपण को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करना एक गहरी बीमारी के लक्षण हैं।
 वार मेमोरियल के उद्घाटन, सर्जिकल स्ट्राइक और एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के प्रक्षेपण के बाद दिए गए प्रधानमंत्री मोदी के भाषण सिर्फ चुनावी भाषण नहीं हैं।  इनमें भारत को फासीवादी  रास्ते पर ले जाने की मंशा दिखाई देती है। सबसे निराशा की बात है कि लोकतंत्र के रास्ते से देश को भटकाने की इस कोशिश का विरोध करने और विश्व-शांति तथा निरस्त्रीकरण की भारत की पुरानी नीति के पक्ष में खड़े होने के बदले कांग्रेस यह  साबित करने की कोशिश में है कि वह भाजपा से अधिक आक्रामक सुरक्षा नीति अपनाती रही है। यह आजादी के आंदोलन और आजाद भारत में विकसित हुई विदेश नीति की मूल तत्वों के खिलाफ है। इस विदेश नीति का निर्माण गांधी जी की प्रेरणा से हुआ है और इसमें जवाहरलाल नेहरू और डा राममनोहर लोहिया जैसे लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका मूल आधार कांग्रेस के 1937 मेें बने विदेश विभाग की ओर से बने प्रस्ताव में है जिसे डा लोहिया ने बनाया था। वह कांग्रेस के विदेश सचिव थे और नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष। इसी  नीति का नतीजा है कि तीन युद्धों के बाद भी आम भारतीय पाकिस्तान के साथ साझा विरासत महसूस करता है और वहां की जनता दोस्ती के साथ दोस्ती रखना चाहता है। मोदी इसे खत्म करना चाहते हैं और भारत की सोच से युद्ध का रहे हैं।
एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के परीक्षण के बारे में डा मनमोहन सिंह की ओर से फैसला नहीं करने के भाजपा नेताओं के आरोप का जवाब यही है कि भारत शस्त्रों की होड़ की नीति पर नहीं चलता है। उसने प्रतिरक्षा के लिए यह मिसाइल 2012 में ही विकसित कर लिया था और उसकी क्षमता का आकलन कर लिया था। अंतरिक्ष को शस्त्रों की होड़ से बचाने की 1967 की अंतरराष्ट्रीय संधि पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं और अंतरिक्ष को कचरे से मुक्त करने के अंतरराष्ट्रीय निश्चय का वह पक्षधर है। इसलिए इस क्षमता के उपयोग से वह बचा रहा तो इसमें शर्म की क्या बात है ?
 दुनिया के देश शांति की नीति को ही सही मानते हैं और अमेरिका भी तालिबान से बातचीत कर अफगानिस्तान में शांति लाने की कोशिश मेें है । भारत के प्रधानमंत्री की ओर से ‘घुस कर मारने’ की भाषा का इस्तेमाल करना भले ही सिनेमा और टेलीविजन के लिए मनोरंजक डायलाग हो, यह भारत जैसे महान देश को एक आत्मविश्वास से हीन देश के रूप में ही पेश करता है। यह आत्महीनता आजादी के आंदोलन से आरएसएस के दूर रहने और  इसके सांप्रदायिक चिंतन के कारण है। देशभक्ति के नाम पर इसे इस आत्महीनता को देश पर थोपने नहीं देना चाहिए।  उन्हें उन विचारों को स्थापित करने का मौका नहीं मिलना चाहिए जिसे भारत ने उस समय नकार दिया जब वह गुलामी की जंजीर में बंधा था। जवाहर लाल और उनके बाद के नेताओं के नेतृत्व में विकसित विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल भाजपा उस पिछड़े और मानवता-विरोधी विचारों के लिए करना चाहता है जिसे दुनिया नकार चुकी है। चुनाव में इस लोकतंत्र-विरोधी दर्शन का विरोध  भारत के महान विचारों के आधार पर होना चाहिए, मोदी और भाजपा की आधारहीन चुनौतियों के आधार पर नहीं।

Comments