भाजपा सत्ता में होने को सार्थक कर रही है। यही वह कर भी सकती थी क्योंकि जनसंघ के स्थापना काल से ही जिन मुद्दों को लेकर वह जनता के पास जाती रही वे एक-एक कर अपने निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं। तरीके पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन धारा 370 पर दृढ़ इच्छाशक्ति दिखा कर मोदी-शाह की जोड़ी ने इतिहास में अपना नाम तो दर्ज करवा ही लिया है। इतिहास इस तथ्य को भी रेखांकित करेगा कि सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की क्या भूमिका रही। सत्तासीन पार्टी को यह अधिकार है कि न्यायालय में सरकार का पक्ष रखते हुए वह अपनी विचारधारा से प्रेरित हो।

तो… भले ही यह न्यायादेश हो, लेकिन दशकों से विवादित किसी मुद्दे को निर्णय के मुकाम तक पहुंचाने में सरकार की जो भी भूमिका है, उसका क्रेडिट उसे मिलना ही चाहिये। पर…इससे आगे क्या…?

स्वतंत्रता के बाद गांधी जी की सोच थी कि कांग्रेस अपनी भूमिका निभा चुकी और उसे नेपथ्य में चले जाना चाहिये। लेकिन, उनकी इस बात को नहीं माना गया और कांग्रेस अगले कई दशकों तक देश की राजनीति की धुरी बनी रही। स्वतंत्र भारत में कांग्रेस की भूमिका को अपरिहार्य मानने वालों का तर्क था कि कांग्रेस एक विचार है जिसमें देश को परतंत्रता से मुक्त करने मात्र का उद्देश्य ही नहीं, देश के निर्माण का स्वप्न भी निहित है।

गांधी तो जल्दी ही चले गए लेकिन स्वतंत्र भारत में कांग्रेस शिखर भूमिका में बनी रही। इसने क्या किया, यह क्या कर सकती थी, इसे क्या करना चाहिये था…ये विवाद अंतहीन हैं, लेकिन यह तथ्य है कि आज का भारत जो भी है उसमें कांग्रेस की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही है।

भाजपा की वैचारिकता में ऐसा क्या है जो धारा 370 की समाप्ति और राम मंदिर बनने के बाद राजनीतिक स्तरों पर उसकी प्रासंगिकता को बनाए रख सकता है? उसके दूरगामी उद्देश्यों में ऐसा क्या है जो उसके समर्थन आधार को उसके साथ आगे भी लम्बे समय तक बनाए रख सकता है?

जाहिर है, नए मुद्दे तलाशने होंगे। सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं से भरे इस देश में नए भावनात्मक मुद्दों की तलाश करना कोई कठिन काम नहीं। भाजपा ब्रांड राष्ट्रवाद और संस्कृतिवाद को सदैव कुछ ऐसे लक्ष्य चाहिये जो उनके नेताओं की आवाज में गर्जना और समर्थकों के मन में जोश भर सकें, वरना उनके चूल्हे की आग ठंडी पड़ने लगेगी और ठंडी पड़ती आग कुछ पका नहीं सकती।

यह सोचना महज़ खुशफहमी है कि इतने जटिल और विवादास्पद मुद्दों को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने के बाद भाजपा सरकार आर्थिक मामलों पर ध्यान केंद्रित करेगी और रोजगार के लिये भटकते युवाओं का कुछ कल्याण हो सकेगा, विकास के लाभों से वंचित समुदायों का कुछ भला हो सकेगा।

भाजपा के पास कश्मीर और अयोध्या को लेकर स्पष्ट दृष्टि थी और बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन मामलों में सराहनीय दृढ़ता दिखाई। तीन तलाक के मामले में भी वे अपने दृष्टिकोण को लेकर इतने स्पष्ट और दृढ़ थे कि विरोध में उठने वाली किसी भी आवाज को उन्होंने कोई अहमियत नहीं दी।

जब आपके पास किसी मामले को लेकर स्पष्ट वैचारिक आधार होता है और उसे निर्णायक स्तर तक ले जाने की आवश्यक दृढ़ता होती है तो समाधान तक पहुंचना आसान होता है। लोकतंत्र में समाधान के रास्तों को लेकर विरोध हो सकता है लेकिन अगर समाधान निकल रहे हों तो उनका स्वागत भी होना चाहिये।

जनभावनाओं से जुड़े कुछ जरूरी मुद्दों को लेकर नरेंद्र मोदी के स्पष्ट विचार और उनकी दृढ़ता ने समाधान का मार्ग प्रशस्त किया। कोई भी समाधान सार्वदेशिक स्वीकार्यता नहीं पा सकता और असहमति की गुंजाइश हमेशा रहती है। लेकिन, इससे समाधान का महत्व कम नहीं होता।

लेकिन, यथार्थतः जो सबसे जरूरी मुद्दे हैं, मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, आर्थिक विकास, विकास के लाभों का सम्यक वितरण आदि…उन्हें लेकर भाजपा की या मोदी की वैचारिकी उतनी स्पष्ट नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आर्थिक मामलों में भाजपा सरकार अपने मातृ संगठन से भी प्रेरित नहीं होती। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक थे और अर्थनीतियों को लेकर संघ किसी स्पष्ट दृष्टि और दबाव के साथ भाजपा के पीछे नहीं रहा। यही कारण है कि अटल सरकार ने सरकारी कर्मचारियों का पेंशन तो खत्म किया ही, देश को नवउदारवादी व्यवस्था के चंगुल में सौंपने में उसने कोई कसर बाकी नहीं रखी। संघ के आर्थिक विचार उसके विचारकों के व्याख्यानों में सिमट कर रह गए।

नरेंद्र मोदी अपने अपार बहुमत का उपयोग देश में कारपोरेट राज लाने में करते रहे और संघ के कुछ विचारक या आनुषंगिक संगठन यदा-कदा असहमतियों के कुछ सुर निकालने के अलावा कोई अन्य प्रभावी दबाव नहीं डाल सके।

जब आपके पास अर्थतंत्र को लेकर स्पष्ट विचार नहीं रहते तो आपकी सत्ता आर्थिक अराजकताओं को पैदा करेगी ही करेगी और आज यही हो भी रहा है। चरमराता बैंकिंग तंत्र, सार्वजनिक संसाधनों पर तेजी से काबिज होता कारपोरेट तंत्र, सार्वजनिक शिक्षा और चिकित्सा के संबंध में किसी मौलिक विचार के अभाव में उसके कारपोरेटीकरण की कवायदें, रोजगार सृजन के लिये राजनीतिक-आर्थिक कल्पनाशीलता का अभाव आदि ने देश की अर्थव्यवस्था को जितना रसातल में पहुंचाया है उस पर चर्चा करने की भी मानसिकता उन लोगों में नहीं जो इन अराजक स्थितियों में सर्वाधिक प्रभावित हैं।

नीति आयोग, जिसे ‘न्यू इंडिया’ की मूर्त्ति गढ़नी है, के थिंक टैंक में शामिल अधिकारियों का बयान देखें तो उन्हें हर मर्ज का इलाज निजीकरण में ही दिखाई देता है। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के पिछले एक वर्ष के बयानों को ही गौर से देखें। आम लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले सार्वजनिक शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, रोजगार आदि जैसे अनिवार्य मुद्दों पर उनके विचार निजीकरण से शुरू होकर निजीकरण पर ही खत्म होते हैं। मसलन, नीति आयोग के विचारक मानते हैं कि देश का अंतिम सरकारी स्कूल भी निजी हाथों को सौंप दिया जाए और सरकार सार्वजनिक शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि से अपने हाथ खींच ले।

तो, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के मामलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से शुरू होकर नीति आयोग के थिंक टैंक तक भाजपा की वैचारिक यात्रा जितनी अस्पष्टता की शिकार है उसमें देश के आर्थिक कायाकल्प की कल्पना करना बेमानी है।

नरेंद्र मोदी की टीम में आर्थिक विचारकों का अभाव है और यह कोई छिपी बात नहीं है। स्वयं मोदी भी जब जनता से मुखातिब होते हैं तो वे आर्थिक चुनौतियों पर अधिक बातें नहीं करते, बल्कि ऐसे भावनात्मक मुद्दों पर ही बातें करते हैं जिन पर वे और उनके सहयोगी अधिक सहजता महसूस करते हैं।

135 करोड़ की आबादी, जिसमें अति निर्धनों की संख्या तीन चौथाई से अधिक है, के जीवन को बदलने में न कश्मीर, न राममंदिर प्रभावी साबित होगा। इसके लिये तो देश के नेता में स्पष्ट आर्थिक विजन होना चाहिये। बिना किसी स्पष्ट आर्थिक विजन के आप देश को आर्थिक दलदल में ही धकेल सकते हैं। आगे क्या होगा…?

यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए योगी जी राम नाम की अलख जगाते रहेंगे, मंदिर निर्माण के एक-एक चरण को इतना भुनाएंगे कि स्वयं रामजी भी उकता जाएंगे, हालांकि मूढ़ लोगों की जयजयकार से माहौल राम मय होता रहेगा।

योगी का दायरा तो सीमित है, लेकिन मोदी कब तक पुलवामा, पाकिस्तान, बालाकोट, कश्मीर, तीन तलाक, मंदिर आदि का राग अलापते रह पाएंगे? उन्होंने भावनात्मक मुद्दों को कुशलता से भुना कर भाजपा को राजनैतिक सफलताओं के शिखर तक पहुंचाया है लेकिन आगे की राह कठिन है। उन्हें भावनात्मक मुद्दों से आगे बढ़ कर वास्तविक चुनैतियों का सामना करना होगा और वास्तविक चुनौतियां तो रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा जैसे मुद्दों में ही निहित हैं। वे अयोध्या में संसार का भव्यतम मंदिर बनवा दें, इतिहास उन्हें उन कसौटियों पर भी परखेगा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने आमलोगों के जीवन स्तर को उठाने में कितनी सफलता पाई। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या सामाजिक अशांति को चिंताजनक स्तर पर ले जा रही है और इस मामले में मोदी सरकार की विफलताएं उनकी तमाम सफलताओं पर भारी पड़ सकती है।

यह न सतयुग है, न त्रेता, न द्वापर…यह अर्थ युग है और आज के दौर में वास्तविक कसौटियां आर्थिक कारकों से ही निर्मित होती हैं। किसी भी देश का उदाहरण ले लें, सत्य तो भूख ही है, शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार की जरूरत ही है। भावनात्मक आवरण सत्य की नग्नता को अधिक दिनों तक ढ़क कर नहीं रख सकते।

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