अरुण जेटली अग्रिम पंक्ति के भाजपा नेताओं में पहले थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी में ‘पीएम मेटेरियल’ के दर्शन किये थे। उधर, कारपोरेट सेक्टर में अनिल अंबानी पहले उद्योगपति थे जिन्होंने सार्वजनिक मंच से यह कहा था कि उन्हें नरेंद्र मोदी में भारत का भविष्य नजर आता है।

मौका था 2007 में हुए ‘वाइब्रेंट गुजरात’ नाम के सम्मेलन का, जिसमें देश-विदेश के बहुत सारे उद्योगपतियों ने शिरकत की थी। छोटे अंबानी के सुर में सुर मिलाते हुए उसी मंच से तब कई अन्य उद्योगपतियों ने भी मोदी के प्रधानमंत्री बनने की अभिलाषा व्यक्त की थी।

यद्यपि, 2006-07 के उस दौर में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-1 का सूरज भारत के राजनीतिक आकाश पर चमक रहा था और विकल्प की तलाश की कोई बेचैनी देश की जनता में नहीं थी। अभी इस शासन का तीसरा वर्ष ही बीत रहा था और यूपीए चेयर पर्सन के रूप में सोनिया गांधी आम लोगों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कदमों को नापने की कोशिशों में लगी थी। रोजगार गारंटी योजना और सूचना का अधिकार जैसे मुद्दे कानून का रूप ले चुके थे और शिक्षा के अधिकार को लागू करने की तैयारियां चल रही थीं।

इधर, निजी और विदेशी निवेश बढाने के प्रयास भी जारी थे और सार्वजनिक इकाइयों के विनिवेशीकरण के माध्यम से कारपोरेट सेक्टर के लिये खेल के मैदान का क्षेत्रफल लगातार बढाया जा रहा था। गठबंधन सरकार की मजबूरियों के बावजूद मनमोहन आर्थिक नीतियों के स्तर पर अपनी किये जा रहे थे और कुछ गठबंधन सहयोगियों के द्वारा प्रतीकात्मक विरोध के अलावा कोई प्रभावी व्यवधान नहीं डाला जा रहा था। यानी, कारपोरेट सेक्टर के लिये 2006-07 का दौर आमतौर पर ‘ऑल इज वेल’ का था। राजनीति उनके अनुकूल थी और राजनेता उनके हितों के साथ थे।

लेकिन, विजनरी होना कारपोरेट प्रभुओं की पहली विशेषता होती है और भविष्य की राजनीति की पदचाप वे राजनीतिक विश्लेषकों से भी पहले सुनने-समझने लगते हैं। राजनीति को नियंत्रित-संचालित करते रहने के लिये भविष्य की पदचाप को सुनने की योग्यता पहली शर्त्त है। फिर…यह भी एक तथ्य है कि कारपोरेट चाहे जिसे सत्ता में स्वीकार करे, लेकिन तीसरा मोर्चा नामक राजनीतिक स्ट्रक्चर को वह किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करना चाहता। मनमोहन के बाद किसी तीसरे मोर्चे की संभावना को खत्म करने के लिये भी कारपोरेट को किसी नायक की जरूरत थी। ऐसा नायक, जो जनता के दिलों पर राज करे लेकिन जनता के हितों की कीमत पर उनके हितों की रखवाली करे।

भाजपा के शीर्ष पर उभर रहे खालीपन को कारपोरेट प्रभु भांप रहे थे। वाजपेयी नेपथ्य में जा चुके थे, जिन्ना प्रकरण के बाद आडवाणी स्वीकार्यता के लिये एक नए संघर्ष में उलझ चुके थे और 2006 के मई में प्रमोद महाजन की हत्या ने भाजपा के शीर्ष को असमंजस भरी शून्यता से भर दिया था। यद्यपि, 2009 में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने चुनाव में भाग लिया और बुरी तरह मुंह की खाई। भाजपा की इस पराजय ने शीर्ष मंच पर मोदी को लाने की कवायदों को नई ऊर्जा दे दी। 2009 में यूपीए 2 की शुरुआत के साथ ही एक अलग स्तर पर भी खेल शुरू हुआ। विकल्प के रूप में नरेंद्र मोदी की चर्चा। उम्र के नवें दशक में पहुंचे, अपनी निर्णायक परीक्षा में विफल रहे आडवाणी किनारे किये जाने लगे और तारणहार के रूप में ‘मोदी-मोदी’ का जाप शुरू हो गया।

विरोधाभासी गठबंधन की उलझनों में घिरे मनमोहन की सीमाएं थीं जो यूपीए 2 में अधिक स्पष्ट होने लगी। उनकी सौम्यता को उनकी कमजोरी के रूप में प्रचारित किया जाने लगा और मीडिया, जिसका मालिकाना हक कुछ खास हाथों में सिमटता जा रहा था, उन्हें एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में दिखाने की हर संभव कोशिश करने लगा। तब, जबकि हाल में हुए अमेरिकी परमाणु समझौते में उन्होंने अपनी सैद्धांतिक और वैयक्तिक दृढ़ता का अहसास देश को कराया था। यूपीए 2 सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के नए-नए आरोप रोजाना की खबरों में शामिल होने लगे जिनमें प्रमुख था 1 लाख 76 हजार करोड़ का वह दूर संचार घोटाला, जिसके होने न होने पर बहस अब तक जारी है। निस्संदेह…इन आरोपों के कोलाहल में सरकार दिशाहीन सी दिखने लगी और अधिकांश अवसरों पर मनमोहन की चुप्पी ने उनके विरोधियों को उन्हें ‘मौनमोहन’ का विशेषण देने की सुविधा प्रदान की।

नरेंद्र मोदी के लिये पिच तैयार करने वालों की सहूलियत बढ़ती जा रही थी। लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में किसी एक नेता को शीर्ष पद तक लाने के लिये इतनी सुविचारित योजनाओं, इतने षड्यंत्रों और व्यापक पैमाने पर इतने बहुआयामी प्रचार का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। अन्ना आंदोलन इन्हीं षड्यंत्रों की एक महत्वपूर्ण कड़ी था जिसने मनमोहन सरकार को बदनाम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। यद्यपि, इस आंदोलन का मूल स्वर भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में ऊपर से नीचे तक समाए भ्रष्टाचार के वायरस के विरोध का था, लेकिन इसका तात्कालिक और निर्णायक, दोनों प्रहार मनमोहन सरकार को ही झेलना पड़ा।

“….मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना…” के नारे लगाते, अन्ना टोपी पहने, हाथों में जलते कैंडिल थामे जुलूस की शक्ल में देश के नगरों-महानगरों की सड़कों पर निकले मध्यवर्ग की उम्मीदों को कारपोरेट संपोषित मीडिया ने बड़ी सफाई से नरेंद्र मोदी के साथ जोड़ना शुरू कर दिया। वही मीडिया, जो 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी को संदेह भरी नजरों से देखता रहा था। लेकिन, एक दशक बीतते न बीतते मीडिया के स्वर पर मालिकान के राजनीतिक-आर्थिक हित पूरी तरह हावी हो चुके थे और संदेहों का स्थान समर्थन ने ले लिया था।

2012 के गुजरात विधान सभा चुनाव में मोदी की लगातार तीसरी जीत ने योजनाकारों को उत्साह से भर दिया और अब निर्णायक कदम बढ़ाने का वक्त आ चुका था। लंबे समय से अरुण जेटली भाजपा की अंदरूनी राजनीति में मोदी के लिये बैटिंग करते रहे थे। 2009 में आडवाणी की हार के बाद जेटली की सक्रियता मोदी के लिये वरदान साबित हो रही थी क्योंकि यह जेटली ही थे जो भाजपा के शीर्ष राजनीतिक कमान और कारपोरेट के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी थे। यह कोई छुपा रहस्य नहीं है कि एक सफल और बड़े वकील के रूप में अरुण जेटली कोर्ट में बड़े कारपोरेट घरानों का पक्ष रखते रहे हैं। मन और आत्मा से वे कई कारपोरेट घरानों के हितैषी रहे हैं और राजनीतिक मंच पर निरन्तर बढ़ते उनके कद का एक बड़ा कारण कारपोरेट समुदाय का उनके प्रति समर्थन भी रहा है।

बहरहाल…नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए…और पूरी धज से बने। उनके चुनाव प्रचार का वितान जितना व्यापक था उतना अतीत में कभी नहीं देखा गया था। कारपोरेट ने खुल कर उनका साथ दिया और उन्होंने भी खुल कर…प्रायः निर्लज्ज बन कर उद्योगपतियों का बहुआयामी सहयोग लिया। वर्षों से किये गए प्रयत्नों का पुरस्कार जेटली को भी मिला…जो मिलना ही था। अमृतसर से लोकसभा का बहुचर्चित चुनाव हारने के बावजूद उन्हें मोदी सरकार में नम्बर टू की जगह और वित्त मंत्री की हैसियत दी गई।

अरुण जेटली का वित्त मंत्री बनना मोदी का उनके प्रति विश्वास से अधिक कारपोरेट के समर्थन का परिणाम था। वे भारत सरकार में कारपोरेट के प्रमुख प्रतिनिधि बने और अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने इस प्रतिनिधित्व के प्रति निष्ठा कायम रखी। उनकी कारपोरेट हितैषी नीतियों से आम लोगों में मोदी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती गई लेकिन वे अपने पथ पर अविचलित रहे। यहां तक कि मोदी और भाजपा का मुखर समर्थक मध्य वर्ग भी नाराज होने लगा, लेकिन जेटली कारपोरेट के प्रति अपनी निष्ठा से टस से मस नहीं हुए। आखिर वे जनता के नहीं, कारपोरेट के वित्त मंत्री ही तो थे और अपनी यह असलियत वे सबसे अच्छी तरह जानते रहे। इसलिये, सार्वजनिक मंचों पर अपनी जन विरोधी नीतियों के बचाव के लिये उन्हें निर्लज्ज होने में भी कभी गुरेज नहीं हुआ। यद्यपि, अपनी इस निर्लज्जता को उन्होंने अपनी वाकपटुता से ढकने की हर संभव कोशिश हमेशा की।

भाजपा के नीति निर्धारण समूह के प्रमुख सदस्य के रूप में जेटली को पता था कि अगले आम चुनाव में आर्थिक मुद्दे नहीं, भावनात्मक मुद्दे ही सामने लाए जाएंगे और तब जो कोलाहल मचेगा उसमें पांच वर्षों तक कारपोरेट हितों के लिये की गई उनकी जनविरोधी कवायदों की कोई चर्चा भी नहीं होगी।

नरेंद्र मोदी का कार्यकाल पूरा होने वाला है। अगले चुनाव के लिये उनकी मनमाफिक पिच बन कर तैयार है। जनाकांक्षाओं के संदर्भ में उनकी विफलता इतिहास में दर्ज हो चुकी है लेकिन, जैसा कि बहुत पहले से बहुत सारे लोग कहते रहे हैं, अपनी विफलताओं को वे धर्म और राष्ट्र के प्रतिगामी विमर्शों के कुहासे में धकेलने की पूरी कोशिश करेंगे। जाहिर है, लोगों की आशंकाएं सही साबित हो रही हैं। मोदी फिर से अपने रंग में हैं। शहीद होते सैनिकों की संख्या बढ़ रही है, विधवाओं और अनाथ हुए बच्चों के करुण क्रंदन से माहौल का सीना चाक हो रहा है…और उसी अनुपात में मोदी की राजनीति में अचानक से चमक और गतिशीलता बढ़ गई है।

मंजर बदल चुका है। बढ़ती बेरोजगारी, नोटबन्दी के हाहाकारी दुष्प्रभाव, विकास दर के भ्रामक आंकड़े, संस्थाओं की दुर्गति, अच्छे दिनों का खोखलापन…ये सारे मुद्दे पीछे छूट चुके हैं। सामने है भ्रामक राष्ट्रवाद के उन्माद का लहराता महासागर…जो मनुष्यता को लीलने के लिये तैयार बैठा है, जो आमलोगों के जीवन से जुड़े तमाम जरूरी सवालों को अपनी लहरों के शोर में गुम करता जा रहा है।

अरुण जेटली अपनी भूमिका निभा चुके हैं। मोदी अपनी अगली भूमिका के लिये कमर कस रहे हैं। लेकिन, इस देश की जो संस्कृति रही है, जो समाजशास्त्र रहा है, वह मोदी के अगले कार्यकाल की अभिलाषा के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है। आखिर, देश बहुत बड़ा है और भाजपा ब्रांड राष्ट्रवाद का प्रवक्ता बना हिन्दी पट्टी का सवर्ण उच्च और मध्य वर्ग, जो अपनी मुखरता और सामाजिक प्रभुत्व के कारण मोदी समर्थक माहौल का निर्माता नजर आ रहा है, की चुनावी औकात सीमित है।

हो सकता है, नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में आ जाएं, लेकिन कारपोरेट की बंधक बनी रही उनकी राजनीति ने, झूठ को सच बना कर गाल बजाने की उनकी शैली ने, आम लोगों की आकांक्षाओं के प्रति द्रोही उनकी रीतियों-नीतियों ने भावी भारत की राजनीति में भाजपा की राजनीतिक संभावनाओं को कितना आघात पहुंचाया है, यह उनके विचारक आज नहीं तो कल, स्वयं विचार करेंगे। जिस संगठन को गर्व रहा है कि वह व्यक्ति केंद्रित नहीं विचार केंद्रित है, उस पर मोदी-शाह की जोड़ी का एकछत्र नियंत्रण संगठन के व्यक्ति केंद्रित हो जाने का सबूत देता है। यह संगठन के लिये कितना नुकसानदेह साबित होगा, इतिहास उन्हें बताएगा।

आज मोदी हैं, कल नहीं रहेंगे, लेकिन भाजपा को रहना है। सवाल यह है कि मोदी कैसी भाजपा को छोड़ कर जाएंगे और फिर से उठने के लिये भाजपा को कितनी तपस्या करनी होगी, कितना प्रायश्चित करना होगा? एक विफल प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की विरासत भाजपा के लिये भारी बोझ साबित होगी लेकिन उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण सवाल भाजपा के सामने मोदी की लफ्फाजी भरी राजनीतिक शैली को ले कर होगा। इतिहास बहुत निर्मम होता है और वह व्यक्ति मोदी से अधिक सवाल भाजपा नामक संगठन से करेगा। इतना तय है कि अब भाजपा गिरेगी तो उसके लिये फिर से उठना बिल्कुल आसान नहीं होगा, क्योंकि मोदी ने देश का नुकसान तो किया ही है, एक संगठन के रूप में भाजपा का बहुत नुकसान कर दिया है। उन्होंने दिखाया है कि अपने दम पर बहुमत लाने पर भाजपा के शासन और उसकी राजनीति की यही शैली होगी। जाहिर है, इस देश में शासन की यह शैली नहीं चल सकती। इन अर्थों में, मोदी राज ने भाजपा को राजनीतिक और वैचारिक रूप से एक्सपोज करके रख दिया है।

और…सबसे बड़ा सवाल, मोदी युग में देश की राजनीति का स्तर जितना गिरा है, उसे उठने में कितना वक्त लगेगा?

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