जल्द ही देश के कारखाने और दफ्तर  मध्ययुग में चले जाएंगे। मोदी सरकार ऐसे कानून पारित कराने जा रही है जो कारखाने और दफ्तर को मालिकों की जमींदारी में बदल देंगे। मालिक जब चाहेगा निकाल देगा और जितना चाहेगा उतने घंटे  काम लेगा। आसानी से न कोई यूनियन बन पाएगी और  न कोई हड़ताल हो सकेगी। हड़ताल में भाग लेने या इसे कराने की कोशिश करने वालों को गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे। पहले मालिक गुंडों को सहारा  लेते थे। अब कानूनन ऐसा कर पाएंगे।
‘‘ हम नए श्रम कानूनों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। आगामी जनवरी में दो दिनोे की राष्ट्रव्यापी हड़ताल भी होगी,’’ हिंद मजदूर सभा के महासचिव हरभजन सिंह सिद्धू कहते हैं। लेकिन वह मीडिया के रवैए से निराश हैं। उनका कहना है कि नए श्रम कानून  लोकतंत्र के खिलाफ हैं क्योंकि ये  मजदूरों को उन अधिकारों से वंचित करते है जो किसी भी लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं। मीडिया इस पर कोई बहस चलाने के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना है कि यह सरकार सिर्फ मालिकों को देश की तिजोरी लूटने का हक नहीं दे रही है, बल्कि मजदूरों को भी उनका बंधक बना रही है।
जमींदारी पहले जमीन तक सीमित होती थी। नई व्यवस्था में यह कारखाने और दफ्तर में भी लागू हो जाएगी। जमींदारी प्रथा में जमींदारों को रैयत के साथ कुछ भी करने का अधिकार होता था और वे  उनसे जितना चाहे उतना लगान ले सकते थे  और बिना पैसा दिए जितना चाहे काम ले सकते थे।  नए श्रम कानून इस तरह बनांए जा रहे हैं कि मालिक पुराने ज़माने के जमींदारों की तरह व्यवहार कर सकें।  जब चाहे निकाले, जितना चाहे काम कराए और जो मर्जी वेतन दे।
नए नियमों में महिलाओं को रात की पाली में काम नहीं करने की छूट नहीं रहेगी। उन्हें रात की शिफ्ट में काम करना पड़ेगा। उन्हें दी जाने वाली प्रसूति अवकाश की अवधि तो बढा दी गई है। लेकिन प्रसूति के दौरान नौकरी से निकालने पर मिलने वाली सुविधाएं और हल्के काम देने वाले प्रावधान हटा दिए गए हैं।
 पहले  कामगारों से तीन  महीने में ज्यादा से ज्यादा 50 घंटे ओवरटाइम कराया जा सकता था। अब उसे 125 घंटे  ओवरटाइम कराया जा सकता है।
इसी तरह, अभी तक जो कानून लागू थे उनके मुताबिक दिन भर में फैले काम का समय साढे 10 घंटे से ज्यादा नहीं हो सकता था।  इसमें भोजन के लिए आधे घंटे को अवकाश भी शामिल था। नया काूनन इसे साढे 10 घंटे से बढा कर 12 घंटे करने जा रहा है। मालिक अब कम संख्या में लोगों को भर्ती करेगा और उनसे ज्यादा से ज्यादा काम लेगा। यह ठीक उसकी तरह होगा जैसा जमींदारी के समय होता था जब जमींदार के घर काम करने गया आदमी कब लौटेगा  किसी को पता नहीं होता था।
संसद में लंबित कानून में यूनियन बनाने  के नियम इतने संख्त हो जाएंगे कि राजनीतिक पार्टियों  से जुड़े  या समाजसेवा करने वाले यूनियन के काम में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। किसी भी कारखाने या दफ्तर में यूनियन बनाने के लिए आधे कर्मचारियों की सहमति लेनी पड़ेगी। यह आसान नहीं होगा और बिना मालिक की मर्जी के कोई यूनियन नहीं बन सकेगी।
अब छंटनी या तालाबंदी उसी तरह आसान होगा जैसा जमींदारी  के समय खेतों के बारे में जमींदार करते  थे। नए कानून में ऐसी व्यवस्था होगी कि 300 कर्मचारियों वाले कारखाने या दफ्तर को जब मर्जी बंद किया जा सकता है। चालीस से कम संख्या वाले कारखाने और दफ्तर को तो कारखाना ही नहीं माना जाएगा। वहां कोई श्रम कानून लागू नहीं होगा।

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