मोदी के रास्ते पर ट्रंप?

अमेरिका में इस साल के अंत में राष्ट्रपति पद का चुनाव होने वाला है और मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के लिए चुनाव लडने वाले हैं। पिछले दिनों अमेरिका के ह्यूस्टन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाउडी मोदी कार्यक्रम हुआ था, जिसमें ट्रंप की मौजूदगी में मोदी ने अबकी बार फिर ट्रंप सरकार का नारा दिया था। गौरतलब है कि पिछले साल भारत में भी लोकसभा के चुनाव हुए थे और साल की शुरुआत में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बालाकोट में एयर स्ट्राइक किया था। सरकार ने आतंकवादी शिविरों को नष्ट करने का दावा किया था और यही चुनाव का मुद्दा बना था। अब उधर अमेरिका में बिल्कुल ऐसी ही कहानी दोहराई गई है। साल के अंत में चुनाव है और साल की शुरुआत ईरान पर हवाई हमले से हुई है, जिसमें अमेरिका ने ईरान के कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी को मार डाला है। इस तरह अमेरिका ने ईरान के खिलाफ खुले युद्ध का ऐलान कर दिया है। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका के करीब 80 सैनिकों के मारे जाने का दावा किया है। इस तरह चुनावी साल में अमेरिका में राष्ट्रवाद का माहौल बन गया है। इसीलिए सोशल मीडिया में यह तुलना चल रही है कि ट्रंप अपने प्रचार के लिए मोदी मॉडल अपना रहे हैं।

जस्टिस काटजू की चिंता कितनी जायज?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रों पर हुए हमले की घटना के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव के बारे में आशंका जताई है और एक भविष्यवाणी भी की है। चुनाव की घोषणा के बाद किए गए अपने ट्विट में उन्होंने ने लिखा है कि दिल्ली में जल्दी ही बडा सांप्रदायिक दंगा हो सकता है, जिससे चुनाव में ध्रुवीकरण हो जाएगा और भाजपा चुनाव जीत जाएगी। इस तरह का अंदेशा पहले भी कई जानकार जता चुके हैं और जिस तरह से नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर आंदोलन खत्म नहीं हो रहा है, उससे भी लग रहा है कि कुछ इलाकों में तनाव बढ सकता है। गौरतलब है कि दिल्ली के जामिया इलाके में शाहीन बाग में लोग अभी भी धरने पर बैठे हैं, जिससे लाखों लोगों को हर दिन आने जाने में परेशानी हो रही है। मगर पुलिस धरना खत्म नहीं करा रही है। इसीलिए इसके पीछे कुछ रणनीति देखी जा रही है। धरने पर बैठे लोगों के खिलाफ अगर ऐन चुनाव से पहले कार्रवाई हुई और हिसा भडकी तो उसे सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश की जाएगी। इसीलिए जस्टिस काटजू की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यही आशंका दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी है, सो वे भी पूरी कोशिश कर रहे हैं कि चुनाव अभियान का फोकस आम आदमी के लिए किए गए कामों पर ही रहे।

महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं की ‘प्रतिभा’

महाराष्ट्र के जरिए कांग्रेस नेताओं की एक और ‘प्रतिभा’ का पता चला। पिछले दिनों महाराष्ट्र मंत्रिपरिषद विस्तार के बाद मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर पेंच फंस गया था। कांग्रेस नेताओं की तरफ से कुछ ऐसे मंत्रालयों की मांग की जा रही थी, जिन्हें देने को शिवसेना राजी नहीं थी। कांग्रेस नेताओं की तरफ से इस तरह का आभास दिया जा रहा था, जैसे यह मांग ‘टॉप लीडरशिप’ की तरफ से हो। इसी वजह से उद्धव ठाकरे पसोपेश में थे। ऐसे में शरद पवार का तजुर्बा काम आया। बताया जाता है कि पवार ने उद्धव को सलाह दी कि राज्य नेताओं से कोई ‘बारगेन’ करने के बजाय उन्हें सीधे सोनिया गांधी से बात करनी चाहिए। जैसे ही राज्य के कांग्रेस नेताओं को यह खबर लगी कि सोनिया से बात होने वाली है, उन्होंने अपनी मांग छोड दी। फिर पता चला कि शीर्ष नेतृत्व की इसमें कहीं कोई दखलअंदाजी थी ही नहीं, सिर्फ उसके नाम पर ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ की जा रही थी। सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि चूंकि कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच आसान नहीं है, इस वजह से उसका फायदा निचले स्तर पर तमाम नेताओं द्वारा उठाया जाता है। पार्टी के कई नेता पहले भी अलग-अलग फोरम पर यह मांग कर चुके हैं कि बदलते वक्त में कोई ऐसा तरीका निकाला जाना चाहिए कि जब चाहे, नेतृत्व से मुलाकात कर सके। इस तरह की मांगों का फिलहाल कोई असर दिखाई नहीं पड रहा है, उलटे महाराष्ट्र जैसे वाकये जरूर सामने आ रहे हैं।

जादू-टोना और राजनीति

बिहार की राजनीति में जादू-टोने की चर्चा की शुरुआत पहली जनवरी को तब हुई, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बताया कि लालू प्रसाद और राबडी देवी मुख्यमंत्री आवास से दूसरे घर मे शिफ्ट होते वक्त जादू-टोना करके गए थे, ताकि उन्हें (नीतीश कुमार को) परेशानी का सामना करना पडे। बकौल नीतीश, यह बात बाद में उन्हें खुद लालू प्रसाद यादव ने बताई थी। अब जादू-टोने की यह चर्चा झारखंड में भी होने लगी है। कहा जा रहा है कि वहां मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में कोई ‘दोष’ है। रघुबर दास की हार के पीछे इस सरकारी बंगले का ही ‘दोष’ बताया जा रहा है। अर्जुन मुंडा ने इससे बचने को काफी पूजा-पाठ भी कराया था। 2०14 में रघुबर दास जब इस बंगले में आए तो उन्हें इससे जुडे कई किस्से सुनाए गए। बताया गया कि यह अभी तक शुभ साबित नहीं हुआ है। रघुबर दास ने इस पर यकीन नहीं किया, लेकिन अब हार के बाद मानने को मजबूर हो गए हैं कि इस बंगले में रहने वाले को नुकसान उठाना ही पडता है। अभी हेमंत सोरेन इस बंगले में आ रहे हैं तो उन्हें भी उनके कई करीबी शुभचिंतकों ने सावधान किया है। चूंकि सोरेन खुद ज्योतिष के जानकार बताए जाते हैं, तो देखने वाली बात होगी कि इससे पार पाने के लिए वह क्या रास्ता निकालते हैं। पुराने अनुभव को देखते हुए वह शायद ही कोई जोखिम लेना पसंद करे, जैसे अब रघुबर दास को ‘चूक’ हो जाने पर पछतावा हो रहा है।

बॉलीवुड की अभिनेत्रियों ने दिखाया दम

हिंदी फिल्म उद्योग के सामाजिक या राजनीतिक सरोकारों का इतिहास कोई बहुत उत्साहजनक नहीं है। आमतौर पर फिल्मी सितारे या तो चुप रहते हैं या सरकार का साथ देते हैं। पर देश के मौजूदा माहौल ने उनको भी आंदोलित किया है और वे खुल कर सरकार के समर्थन या विरोध में उतरे हैं। हकीकत यह भी है कि धीरे-धीरे सरकार का समर्थन करने वाली फिल्मी हस्तियों की संख्या कम होती जा रही है। भाजपा ने नागरिकता कानून के समर्थन में पिछले सप्ताह मुंबई के एक पांच सितारा होटल में बॉलीवुड की हस्तियों को बुलाया था। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की ओर से यह आयोजन था। पर प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करने वाले बडे सितारे जैसे- कंगना रनौत, विक्की कौशल, आयुष्मान खुराना, रवीना टंडन आदि इसमें शामिल नहीं हुए। इसके अगले दिन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हुई हिसा को लेकर मुंबई में प्रदर्शन हुए तो मुख्यधारा के तमाम बडे कलाकार उसमें शामिल हुए। सबसे खास बात यह है कि सोशल मीडिया से लेकर सडक पर उतरने तक में बॉलीवुड की अभिनेत्रियां ज्यादा आगे रहीं। सोनम कपूर, आलिया भट्ट, तापसी पन्नू, स्वरा भास्कर, गुल पनाग, शबाना आजमी, रिचा चड्ढा, नंदिता दास, कोकणा सेन शर्मा आदि ने खुल कर जेएनयू के छात्रों का समर्थन किया और हिंसा के विरोध में सरकार को निशाना बनाते हुए ट्विट किए। दीपिका पादुकोन तो दिल्ली में घायल छात्रों से मिलने भी पहुंचीं। विशाल भारद्बाज, अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा, जोया अख्तर, हंसल मेहता जैसे फिल्मकार भी जेएनयू की हिंसा के विरोध में आंदोलन में शामिल हुए।

दिल्ली के सभी सांसद मंत्री बनने के आकांक्षी

दिल्ली विधानसभा का चुनाव भाजपा इस कदर हारी हुई मानसिकता के साथ लड रही है कि दिल्ली से भाजपा के सभी सातों सांसद मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनने के बजाय चाहते हैं कि उन्हें केंद्र में मंत्री बना दिया जाए। क्योंकि उनमें से किसी को भी यकीन नहीं है कि दिल्ली में भाजपा जीतेगी और उसकी सरकार बनेगी। आमतौर पर दिल्ली से जीते दो सांसदों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जगह मिलती है। मनमोहन सिंह की सरकार में दिल्ली से तीन मंत्री थे। नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार में भी दिल्ली के दो मंत्री होते थे- हर्षवर्धन और राजस्थान से राज्यसभा में आए विजय गोयल। इस बार सिर्फ हर्षवर्धन मंत्री हैं। बहरहाल दिल्ली से लोकसभा का चुनाव जीते सभी सांसद केंद्र में मंत्री बनने को लालायित हैं, क्योंकि सभी का मानना है कि जब सरकार बनने की संभावना ही नहीं दिख रही है तो क्यों न केंद्र में ही मंत्री बन जाएं। इस समय वैश्य समुदाय से हर्षवर्धन और सिख तथा पंजाबी समुदाय से हरदीप सिंह पुरी और स्मृति ईरानी मंत्री हैं। दिल्ली से सटे हुए हरियाणा में भाजपा ने पंजाबी मुख्यमंत्री बना रखा है। गूर्जर समुदाय से फरीदाबाद के सांसद कृष्णपाल गूर्जर मंत्री हैं। इसलिए अब ज्यादा संभावना किसी प्रवासी या जाट को मंत्री बनाए जाने की है। इस लिहाज से मनोज तिवारी और प्रवेश वर्मा उम्मीद लगाए बैठे हैं। वैसे पंजाबी समुदाय की मीनाक्षी लेखी भी मंत्री पद की पुरानी आकांक्षी हैं।

चलते-चलते

नागरिकता संशोधन कानून से संबंधित याचिका पर सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक देश में पूरी तरह शांति कायम नहीं हो जाती, तब तक न्याय नहीं मिल सकता। दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि जितनी ज्यादा हिंसा होगी, कमल उतना ही ज्यादा खिलेगा। मतलब साफ है कि जब कमल खिलता रहेगा तब तक लोगों को न्याय नहीं मिलेगा।

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