सोनिया के बनने से बगावत रुकी

सोनिया गांधी के कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष चुने जाने की यह कह कर आलोचना हो रही है कि नेतृत्व के लिए यह पार्टी गांधी परिवार के बाहर झांक ही नहीं सकती। आलोचना का बडा आधार यह है कि इस्तीफा देते वक्त खुद राहुल गांधी ने कहा था कि नया अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा। कांग्रेस के तमाम दिग्गज इस तरह की आलोचना से बेफिक्र हैं। उनका मानना है कि अगर हम ऐसी आलोचनाओं की परवाह करते तो पार्टी की और ज्यादा फजीहत हो जाती। अध्यक्ष के लिए दो-तीन नाम आगे आए थे लेकिन किसी पर भी सहमति नहीं बनी और यह साफ हो गया कि अगर अभी गांधी परिवार के बाहर से कोई नया अध्यक्ष बना तो पूरी पार्टी बिखर जाएगी। नया अध्यक्ष चुनने के लिए हुई बैठक में कुछ नेताओं ने साफ कह दिया था कि अगर कोई अध्यक्ष थोपा गया तो वे पार्टी में नहीं रहेंगे। जिन राज्यों अभी विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां के कुछ वरिष्ठ नेता तो बैठक में अपना इस्तीफा लिखकर इस तैयारी के साथ पहुंचे थे कि अगर उनके मिजाज के विपरीत फैसले हुए तो वे वहीं पार्टी छोडने का ऐलान कर देंगे। ऐसे में पार्टी के सामने आलोचना से ज्यादा बगावत से बचने की चुनौती थी। अतंत: सोनिया को चुनकर कांग्रेस ने बगावत रोक ली।

मोदी के नहले पर शर्मिष्ठा मुखर्जी का देहला

कुछ दिनों पहले तक यह चर्चा बहुत जोरों पर थी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा भाजपा में शामिल हो सकती हैं। इस चर्चा का आधार वह फोटो था जिसमें शर्मिष्ठा और कोलकाता से आए उनके दो रिश्तेदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खडे हैं। फोटो तब की है जब मोदी पूर्व राष्ट्रपति से मिलने उनके आवास पर गए थे। फोटो को शर्मिष्ठा ने खुद ट्विट किया था। हाल ही में जब प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया तो मोदी ने उनकी तारीफ में एक ट्विट किया और लिखा कि प्रणब मुखर्जी ने अपना सारा जीवन देश की सेवा मे लगाया और उनकी सेवाओं से देश समृद्ध हुआ। मोदी के इस ट्विट को रिट्विट करते हुए शर्मिष्ठा मुखर्जी ने लिखा- ‘मेरे पिता ने राष्ट्रपति के तौर पर पांच साल को छोड कर अपना सारा जीवन कांग्रेस की सेवा में लगाया। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है तो इसका मतलब है कि कांग्रेस ने बहुत अच्छा काम किया है।’ शर्मिष्ठा ने आगे लिखा कि इस तरह प्रधानमंत्री मोदी स्वीकार कर रहे हैं कि कांग्रेस ने देश के विकास में बहुत अच्छा योगदान किया है। उनके इस ट्विट से कांग्रेस के नेता तो खुश हुए लेकिन भाजपा नेताओं और खुद प्रधानमंत्री मोदी पर क्या बीती होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

भाजपा के हौसलें सातवें आसमान पर

जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य दर्जा खत्म कर उसे दो हिस्सों में बांटने के केंद्र सरकार के फैसले से भाजपा नेताओं के हौंसलें सातवें आसमान पर हैं। उन्हें यह भी भरोसा है कि तीन तलाक और कश्मीर के बाद अब राम मंदिर का मुद्दा भी अंतिम चरण में प्रवेश कर गया है। साल के अंत तक उसका भी फैसला हो जाएगा, जिसके बाद अयोध्या में मंदिर बनेगा। इसी भरोसे के बूते पार्टी के नेता अब घर बैठे हर चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं और राज्यों में अपने पुराने सहयोगी दलों को आंखें दिखा रहे हैं। इस सिलसिले में महाराष्ट्र में शिवसेना को और बिहार जनता दल (यू) को उनकी औकात याद दिलाई जा रही है। महाराष्ट्र में पार्टी के नेताओं को लग रहा है कि कश्मीर के असर में वे फिर 2014 की तरह चुनाव जीत सकते हैं। ऐसा ही भरोसा भाजपा को बिहार को लेकर भी है। हालांकि 2014 की मोदी लहर के बावजूद एक साल बाद ही बिहार में भाजपा बुरी तरह हारी थी। लेकिन इस बार फिर उसके नेता अकेले लडने का दम भर रहे हैं। झारखंड में भी भाजपा अपनी सहयोगी ऑल झारखंड स्टुडेंट्स यूनियन को कम से कम सीट देने की बात कर रही है। हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में तो पार्टी पहले भी अकेले लडी थी और इस बार भी अकेले ही लडेगी। हालांकि पार्टी के ही कुछ नेताओं का मानना है कि यह अति आत्मविश्वास पार्टी के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है।

बेखबर का भी दावा है खबरदार होने का

नोटबंदी का ऐलान हो या बालाकोट में एअर स्ट्राइक या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अचानक पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की मुबारकबाद देना हो या गरीब सवण्रों को दस फीसदी आरक्षण का ऐलान, मोदी सरकार के हर बडे फैसले में सरप्राइज फैक्टर अहम रहा है। सरकार के अहम फैसलों की जानकारी सरकार के बाहर तो क्या सरकार में शामिल लोगों में भी बहुत कम को होती है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने के फैसले की भनक भी तब तक किसी को नहीं लगी, जब तक 5 अगस्त को राज्यसभा में अमित शाह ने इसकी घोषणा नहीं कर दी। कयास तो लगाए ही जा रहे थे कि कश्मीर मे कुछ बड़ा होने वाला है, लेकिन होने क्या वाला है, यह किसी को नहीं मालूम था। कहा गया कि इससे संबंधित घटनाक्रम के बारे में सिर्फ तीन लोगों को यानी खुद मोदी, अमित शाह और सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल को ही पहले से पता था। लेकिन फैसला होने के बाद सरकार और पार्टी के कई नेता यह बताना नहीं भूल रहे हैं कि उन्हें तो सब कुछ पहले से ही पता था कि लेकिन सीक्रेट मिशन की बात बाहर न आए, इसी कारण वे पूरी तरह चुप थे।

मनमोहन सिंह का ही चुनाव क्यों?

पिछली लोकसभा में कांग्रेस के नेता रहे मल्लिकार्जुन खडगे, पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार, पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक जैसे कांग्रेस के बडे दलित चेहरे इस समय संसद से बाहर हैं। लेकिन पार्टी ने राज्यसभा में भेजने के लिए इनमें से किसी के भी नाम पर विचार न करते हुए राजस्थान में भाजपा के एक सदस्य के निधन से खाली हुई सीट से पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को राज्यसभा में भेजा। गौरतलब है कि लगातार 27 साल तक संसद के उच्च सदन के सदस्य रह चुके मनमोहन सिंह का कार्यकाल इसी साल 28 जून को खत्म हुआ था। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री के नाते दिल्ली में बंगला मिला हुआ है। कैबिनेट मंत्री स्तर की सारी सुविधाएं भी उन्हें आजीवन मिलना है। संसद के बाहर वे जो कुछ भी बोलेंगे उसे देश दुनिया के मीडिया में जगह मिलनी ही है। इसके बावजूद उन्हें राज्यसभा में भेजने का सीधा मतलब यही है कि अर्थव्यवस्था के जानकार के तौर पर पार्टी उनकी उपस्थिति संसद में इसलिए जरुरी मानती है, क्योंकि उसे अंदाजा है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार आने वाले दिन काफी चुनौती भरे होंगे। ऐसे में विपक्ष की ओर मनमोहन सिंह की संसद में मौजूदगी सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करने के लिए जरूरी रहेगी।

भाजपा को वोट न भी मिले तो क्या!

आमतौर पर किसी भी चुनाव में हर पार्टी उम्मीदवारों के चयन का एकमात्र पैमाना होता है- उम्मीदवार के चुनाव जीतने की क्षमता। मगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने इस पैमाने को बदल दिया है। अब वह जीतने की क्षमता वाले नेता की तलाश नहीं करती है, बल्कि जीते हुए नेताओं को ही साम-दाम-दंड के बूते अपनी पार्टी में शामिल कर लेती है। ताजा मिसाल सिक्किम की है, जहां सिक्किम डेमोक्रेटिक मोर्चा एसडीएफ के 10 विधायक भाजपा में शामिल हो गए। वहां हाल में हुए विधानसभा चुनाव में 32 सीटों में से किसी पर भाजपा दूसरे स्थान पर भी नहीं रही थी। उसको 32 सीटों पर कुल 5700 वोट मिले थे। लेकिन अब उसके पास दस विधायक हैं और वह विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी है। कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी, अगर आने वाले कुछ दिनों में भाजपा वहां सरकार भी बना ले। सिक्किम की तरह ही आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी भाजपा का खाता नहीं खुला था, मगर तेलुगू देशम पार्टी के चार राज्यसभा सदस्य भाजपा में शामिल हो गए। इसी तरह 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में भाजपा तीन साल पहले 12 सीटों पर जीती थी पर अब उसके पास 27 विधायक हैं और 17 सीटों पर जीती कांग्रेस के पास सिर्फ पांच विधायक बचे हैं।

चलते-चलते

भारत के तमाम टेलीविजन न्यूज चैनलों को पाकिस्तान में बढ रही महंगाई की तो खूब खबर है। यह भी पता है कि वहां टमाटर किस भाव में मिल रहे हैं, लेकिन उन्हें बदहाल होती जा रही भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यानी देश ही नहीं बदल रहा है, भारतीय टीवी चैनलों की पत्रकारिता भी बदल रही है।

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