प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव में जीतने के बाद अपने पहले भाषण में सेक्युलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) शब्द की निंदा की है। क्या नीतीश कुमार के सहयोग से यह शब्द संविधान की प्रस्तावना से हटाने की कोशिश की जाएगी? क्या नीतीश कुमार या उनके लेफ्टिनेंट केसी त्यागी में इस पर कुछ कहने या इसका विरोध करने का साहस है? या उन्होंने संघ और प्रधानमन्त्री मोदी के समक्ष पूरी तरह समर्पण कर दिया है?

‘सेक्युलरिज्म’ सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि एक भावना और सैद्धांतिक अभिव्यक्ति है। संविधान निर्माताओं ने संविधान की प्रस्तावना में लिखा था –

“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिये दृढ़ संकल्प हो कर अपनी इस संविधान सभा में आज तारिख 26 नवम्बर 1949 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

संविधान की यह प्रस्तावना एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य (State-Nation) की अवधारणा की पुष्टि करती है। क्योंकि इसमें सभी नागरिकों के ‘विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता’ को विशेष महत्व के साथ शामिल किया गया है। इस प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता या Secularism शब्द शामिल नहीं था। अतः संविधान की प्रस्तावना को और उसमें अंतर्निहित ‘आत्मा’ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए 1976 में संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना या उद्देशिका में गणराज्य से पहले समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता या पंथ निरपेक्षता को जोड़ा गया तथा राष्ट्र की एकता के साथ अखंडता का भी स्पष्ट समावेश कर दिया गया।

संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संशोधन के माध्यम से इन तीनों शब्दों को बहुत सोच-समझ कर शामिल किया गया था। इसलिये जब आपातकाल के बाद 1977 के आमचुनाव में इंदिरा गांधी की पराजय के बाद जनता पार्टी की सरकार ने संविधान में 43वें एवं 44वें संशोधन किए लेकिन इन तीनों शब्दों को यथावत रखा गया। इसके बाद अभी तक संविधान में 124 संशोधन हो चुके हैं लेकिन किसी भी सरकार ने, जिनमें अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार भी शामिल रही है, इन शब्दों के साथ छेड़छाड़ करने की कोई कोशिश नहीं की।

संघवादी या हिंदुत्ववादी विचारधारा को शुरू से ही ‘धर्मनिरक्षता’ और ‘समाजवाद’ शब्द से आपत्ति रही है। उन्हें ‘अखंडता’ शब्द से कोई आपत्ति नहीं है। अब जब पुनः दूसरी बार संघ की भाजपा या मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ गयी है तो वे संविधान की प्रस्तावना से ‘धर्मनिरक्षता या पंथनिरपेक्षता’ तथा ‘समाजवाद’ शब्द को हटाना चाहेंगे। इसके लिये उन्हें लोकसभा और राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी। भाजपा को लोकसभा में अकेले 300 से अधिक सीटें मिली हैं। लेकिन दो तिहाई बहुमत के लिए उसे कम से कम 407 सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी जो फिलहाल सम्भव नहीं है।

इसी प्रकार अभी राज्यसभा में भी भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं है। दो तिहाई बहुमत तो दूर की बात है। इसलिये तात्कालिक रूप से ‘धर्मनिरक्षता’ और ‘समाजवाद’ शब्द को कोई खतरा नहीं है। लेकिन संघ का दूरगामी लक्ष्य तो अंततः इन दोनों शब्दों को संविधान से हटाना ही है। इसीलिए आए दिन भाजपा की दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता संविधान को बदलने की बात करते रहते हैं।

‘सेक्युलरिज़्म’ या ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द से भाजपा नेताओं को इतनी चिढ़ क्यों है, इसे समझने के लिये इस शब्द का शाब्दिक अर्थ जानना जरूरी है। ‘धर्मनिरपेक्षता’ का अर्थ है, हमारा देश धर्म के मामले में ‘निरपेक्ष’ रहेगा। राष्ट्र का अपना कोई ‘धर्म’ नहीं होगा। ‘धर्म’ सिर्फ निजी आस्था और विश्वास का विषय रहेगा। इसलिये केंद्र और राज्य की सरकारें सभी धर्मों से समान दूरी बनाते हुए सभी को अपनी निजी आस्था और विश्वास के अनुरूप आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान करेंगी।

हमारे देश हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म की जन्मस्थली भी है। इसके अलावा यहां इस्लाम, पारसी और यहूदी धर्मों के अनुयायी भी निवास करते हैं। इस्लाम धर्म के अनुयायियों की संख्या तो 20 करोड़ से भी अधिक है और भारत में यह हिन्दू धर्म के बाद दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। संघ और भाजपा का विरोध इसी धर्म से है और उसके नेता इसे छिपाते भी नहीं हैं। लेकिन क्या 20 करोड़ से भी अधिक आबादी को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाये रखने से ‘सबका साथ:सबका विकास’ और अब प्रधानमन्त्री ने उसमें जोड़ दिया है ‘सबका विश्वास’ हांसिल किया जा सकता है?

यदि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी को ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द से आपत्ति है तो वे ‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द को ‘सर्व धर्म समभाव’ के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। इसका अर्थ यही है कि सभी धर्मों के प्रति सरकार ‘समभाव’ रखेगी। किसी का ‘तुष्टिकरण’ नहीं होगा लेकिन किसी भी धर्म को विशेष महत्व भी नहीं दिया जाएगा। संविधान निर्माताओं की भावना के अनुसार देश पहले की तरह ‘सेक्युलर’ बना रहेगा। लेकिन जीत की खुमारी उतरने के बाद संघ और भाजपा के भीतर बैठे सावरकरवादी अपनी हिंदुत्व की धारणा के अनुरूप संविधान की प्रस्तावना से ‘सेक्युलरिज़्म’ और ‘सोशलिज़्म’ शब्द को हटाने की मुहिम आरम्भ करना चाहेंगे। क्योंकि उनका अंतिम लक्ष्य देश को अंततः एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाना है।

हालांकि संविधान में इस संशोधन के लिये केंद्र सरकार को कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, सपा-बसपा और कम्युनिस्टों के समर्थन की भी आवश्यकता पड़ेगी, जो कि 17वीं लोकसभा में तो सम्भव नहीं है। जब हिन्दुत्वादियों द्वारा ऐसी कोई मुहिम आरम्भ की जाएगी तब भाजपा की सहयोगी पार्टियों और भाजपा के भीतर अन्य पार्टियों से आए सांसदों की भी परीक्षा होगी जो संघ की विचारधारा में दीक्षित नहीं हैं। अतः अगले छह महीने या साल भर में यह मालूम हो जाएगा कि मोदी सरकार ”सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” की नीति पर चल रही है या इसके विपरीत सिर्फ ”हिंदुत्व का साथ, हिंदुत्व का विकास और हिंदुओं का विश्वास” की नीति पर चल रही है!

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