मध्यप्रदेश सहित तीन राज्यों में 11 दिसम्बर कांग्रेस की सरकार बनते ही 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा में निराशा और कांग्रेस में आशा का संचार हुआ था। दो सप्ताह गुजरे हैं,, मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने जनता में निराशा का संचार शुरू कर दिया है। चुनाव हारने पर किसी भी सरकार और उसके मुखिया की जो फजीहत होती है, भाजपा उससे मुक्त है।

शिवराज के जाने से जनता दुखी हो रो रही है, यह टीवी पर दिखाया जा रहा है। शिवराज शहीद की मुद्रा में हैं। कांग्रेस उनके डंपर और व्यापम को पहले ही नहीं उठा पाई थी, तो अब उससे आशा करना बेमानी है। वो तो अच्छा हुआ किसान की कर्जमाफी का जो वादा राहुल गांधी ने किया था, वह शपथ के साथ ही पूरा हो गया। सरकार बनते ही सबसे पहले तो मुख्यमंत्री के चयन में उलझे रहे। जीत की खुशी में इसे राजनीति की एक सामान्य प्रक्रिया मान सकते हैं। लेकिन मंत्रिमंडल गठन में फुटौव्वल देख जनता हतप्रभ है।

चुनाव जीतने पर कांग्रेस से कोई बहुत बड़ी उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन लोकसभा चुनाव सामने है, इसलिए वो विकास के एजेंडे के साथ में संजीदगी से पेश आएगी, यह उम्मीद जरूर थी। लेकिन अभी तक प्रदेश की खस्ता हाल दशा में सुधार का कोई खाका सामने नहीं आया है। किसानों की बर्बादी, उद्योग व्यापार की बदहाली, भ्रष्टाचार, लचर कानून व्यवस्था, सहकारी मशीनरी पर लगाम कसकर जनता को राहत दिलवाना जैसे तमाम मामले दरकिनार हैं। सरकार प्रेमी हर दल की सरकार बनते ही सक्रिय हो जाते हैं। उन्हें ऐसा लिखना गवारा नहीं लगेगा। लेकिन सच यही है कि किसी भी सरकार का कर्म आचरण उसके चुनने के एक-दो माह में, उसके नीति-कार्यक्रम की घोषणा के साथ उसके क्रियान्वयन में दिख जाता है। बाद में तो वो सरकारी तंत्र के माध्यम से राजशाही के मार्ग पर चलने लगती है। इस पर कुछ भी बोलने और लिखने को शंका भरी नजरों से देखने लगते हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अपनी सारी विकास योजनाएं भुला दी थीं। वे आज तक भी चर्चा में नहीं आ सकी हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने के 9 माह बाद हमने ‘रविवार डाइजेस्ट’ में लिखा था ‘‘मोदीजी विदेशों से लौट आईये, हनीमून पीरियड खत्म हो गया है। जनता किए गए वादों का इंतजार कर रही है।’’ इस पर मोदी समर्थकों को बुरा लगा था।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता की बंटरबाट में लग गई है। बंटरबाट इसलिए लिखना पड़ रहा है, क्योंकि जब आप कहीं पर खाना खाने जाते हैं, तो आपको खाना एक तमीज और तह़जीब से खाना होता है। कपड़े गंदे कर, मुंह चुपड़कर जूठा नहीं छोड़ते हैं। खाने से आशय सरकार में आकर खाने से नहीं है। वरन् जो सत्ता प्राप्त हुई है, उसको एक औजार की तरह उपयोग करने से है। जिससे जनता की जिन्दगी में आ रही समस्त कठिनाइयों को हटाया जा सके। इस तरह की बंदरबाट से कठिनाइयां तो दूर नहीं होती है, सत्ता के उसी औजार से जनता कटने लगती है। कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही गठबंधन की राजनीति नहीं आती है। दोनों ही जहां बड़ी होती हैं, वहां छोटों को दूर भगाती हैं। जहां खुद छोटी हैं, वहां पर वहां की बड़ी पार्टी उसे जो स्थान देती है, उसे भुल जाती है।

केन्द्र में चल रही भाजपा सरकार के गठबंधन की सहयोगी पार्टियां इसलिए उसे छोड़कर जा रही हैं। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की सरकार कभी 35 वर्षों तक चली थी। उसे दो तिहाई बहुमत था। वहां 25 वर्षों तक ज्योति बसु और 10 वर्षों तक बुद्धदेब भट्टाचार्य ने  वाम मोर्चा सरकार का नेतृत्व किया। माकपा का फावरर्ड ब्लॉक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और सीपीआई से गठबंधन था। इन दलों की 4,8 और 10 तक सीटें थीं। माकपा ने अपने स्पष्ट बहुत के बाद भी कभी दल-बदल करवाकर या चुनाव में सीट हडपकर इन दलों को खत्म करने का काम नहीं किया।

मध्यप्रदेश में जब सारी रात सीटों की गिनती 105 से लेकर 115 तक चल रही थी, तब चार निर्दलीय, दो बसपा और एक सपा विधायक कांग्रेस को खुदा दिख रहे थे। अब सरकार बनने पर खुदा तो ठीक उसके बंदे भी नजर नहीं आ रहे। कांग्रेस के चार बागी विधायक जो निर्दलीय जीते हैं, उनमें से एक को मंत्रिपद दिया गया है, तीन नाराज हैं। उनकी नाराजगी को सत्ता की भूख बताया जा रहा है, तो बाकी की ताजपोशी को क्या कहा जाएगा? हकीकत यह है कि ये निर्दलीय कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता हैं। पार्टी ऐसे ही लोगों की अनदेखी कर अपना और जनता का नुकसान करती आई है।

कांग्रेस की चल रही यह कवायद भविष्य की मध्यप्रदेश सरकार और उसको चलाने के लिए चुनाव से प्राप्त अच्छे संकेतों को बुरों में बदलने की तैयारी है। इसी से दुखी होकर अखिलेश यादव का भी तल्ख बयान आया है। 2019 मई के लिए अखिलेश और उत्तरप्रदेश ही नहीं बाकी के प्रदेशों में भी कांग्रेस को बड़प्पन दिखाना होगा। देश की जनता अब इतनी परिपक्व है कि वो पूत के पांव पालने में ही देख लेती है। मोदी से नाराज जनता को मोदी से बदतर नहीं, बेहतर विकल्प की तलाश है।

 

 

Comments