देश में उन्मादी भीड की दलित, मुस्लिम और अन्य कमजोर तबके के लोगों पर अकारण हिंसा यानी मॉब लिंचिंग की बढती घटनाएं जिस तरह तेजी से बढती जा रही हैं, वह बेहद चिंतित करने वाली हैं। ये घटनाएं देश में एक तरह से गृहयुद्ध का वातावरण बना रही हैं और देश की एकता के गंभीर संकट पैदा कर रही हैं। शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तरह की घटनाओं के प्रति उदासीन बनी केंद्र और संबंधित राज्यों की सरकारों से जवाब तलब किया है। देश की सबसे बडी अदालत ने इन सरकारों को नोटिस जारी कर पूछा है कि मॉब लिंचिंग की बढती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए पिछले एक साल में क्या-क्या कदम उठाए हैं।

देश में उन्मादी भीड की दलित, मुस्लिम अन्य कमजोर वर्गों पर हिंसा यानी मॉब लिंचिंग की बढती घटनाओं के सिलसिले में पिछले साहित्य, कला और अन्य क्षेत्रों से जुडी देश की 49 प्रतिष्ठित हस्तियों ने चिंता जताते हुए प्रधानमंत्रियों को पत्र लिखकर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने का अनुरोध किया था। इस पत्र पर प्रधानमंत्री ने तो कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई मगर फिल्म उद्योग और कला जगत से जुडे 62 लोग एक तरह से सरकार के समर्थन में आगे आए और उन्होंने एक खुला पत्र लिखकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाले लोगों की मंशा पर सवाल उठाए गए। पत्र में उन्हें देश का ‘स्वयंभू गार्जियन’ बताते हुए उन्हें कश्मीरी अलगाववादियों और नक्सलियों का समर्थक तक करार दिया गया। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह कवायद परोक्ष रूप से सरकार की शह पर मॉब लिंचिंग की घटनाओं की गंभीरता को कम करने का प्रयास था।

इस पत्राचार के महज 48 घंटे बाद ही उत्त्र प्रदेश के अमेठी जिले में सेना के एक रिटायर्ड कैप्टन अमानउल्लाह को कुछ लोगों ने घर में घुसकर मार डाला। इस मॉब लिंचिंग की खबर अभी बासी भी नहीं हुई थीं कि उत्तर प्रदेश के ही चंदौली जिले के सैयद राजा बाजार से हिंदुत्व के नशे धुत्त कुछ आदमखोरों द्वारा एक और शिकार किए जाने की खबर आ गई। हिंदुत्व के बर्बर ध्वजाधारकों ने कक्षा 9 में पढने वाले बच्चे खालिक अंसारी को घेरकर उसे जय श्रीराम का नारा लगाने को बाध्य किया और फिर कैरोसिन उंडेलकर उसे जला दिया। 70-80 फीसद जल चुके बच्चा फिलहाल जिले के ही एक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है।

कलाकारों और साहित्यकारों के दो अलग-अलग विचारधारा वाले समूहों द्वारा मॉब लिंचिग को लेकर लिखे गए पत्रों की खबर मीडिया की सुर्खियों में रही। टीवी चैनलों ने खूब चटखारे ले लेकर खबरें पेश की और मॉब लिंचिंग की घटनाओं से चिंतित बुद्धिजीवियों की एक तरह से खिल्ली भी उडाई। लेकिन उत्तर प्रदेश की इन दो घटनाओं का जिक्र उसने बेहद सतही अंदाज में सामान्य आपराधिक घटनाओं की तरह किया।

मॉब लिंचिंग की ये दो घटनाएं तो बिल्कुल ताजा हैं लेकिन धार्मिक अलपसंख्यकों, दलितों और दूसरे कमजोर तबकों को अलगाव के अंधेरे में धकेलने का काम देश के विभिन्न इलाकों खासकर उत्तर और पश्चिमी भारत तथा कर्नाटक में जोर-शोर से जारी है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर केंद् और संबंधित राज्यों तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से अपने सवा साल पुराने आदेश पर अमल के बारे में जवाब तलब करना पडा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने करीब सवा साल पहले केंद्र और राज्य सरकारों से मॉब लिंचिंग के खिलाफ कानून बनाने को कहा था। लेकिन इस दिशा में अब तक कुछ नहीं हुआ है। राज्यों ने तो कोई कानून बनाया ही नहीं और केंद्र सरकार ने भी इस सिलसिले में कोई पहल नहीं की।

कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने तो साफ कह दिया था मॉब लिंचिंग की घटनाओं से निबटने के लिए वह कोई कानून नहीं बनाएगी, क्योंकि राज्यों के पास पर्याप्त शक्तियां और अधिकार हैं, लिहाजा वे ही इससे निबटने के उपाय करें और कानून बनाए। लेकिन अभी तक किसी भी राज्य ने इस संबंध में ठोस कदम उठाया हो या कोई कानून बनाया हो, ऐसा देखने में नहीं आया है। इससे तो यही जाहिर हो रहा है कि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को जरा भी तवज्जो नहीं दे रही हैं।

ऐसा नहीं कि मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। लेकिन केंद्र और राज्यों का रवैया इस मामले में बेहद निराशाजनक रहा है। जाहिर है कि सरकारों के स्तर पर ऐसी घटनाओं को जरा भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। वरना यह बिल्कुल भी संभव नहीं कि प्रशासन चाहे और ऐसी घटनाएं न रुकें। सवाल यह भी है कि उन्मादियों की हिंसा पर लगाम लगाने के लिए सरकारों ने कौन से उल्लेखनीय कदम उठाए जिनसे ऐसे बर्बर कृत्यों को अंजाम देने वालों में भय पैदा होता हो। शीर्ष अदालत ने पिछले साल जो निर्देश दिए थे, वे अपने आप में पर्याप्त हैं। अगर उन पर अमल होता तो निश्चित रूप से ‘भीड के न्याय’ पर लगाम लगती।

अदालत ने सभी राज्यों से हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करने, खुफिया सूचनाएं जुटाने के लिए स्पेशल टॉस्क फोर्स गठित करने, पुलिस तंत्र को दुरुस्त करने और पुलिस की गश्त बढाने जैसे कदम उठाने को कहा था। इसके अलावा उन्मादी भीड की हिंसा के खिलाफ लोगों को जागरुक बनाने के लिए इलेक्ट्रानिक, प्रिंट और सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान चलाने को भी कहा गया था। लेकिन जिस तेजी से मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ रही हैं, उससे जाहिर है कि सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाए, बल्कि ऐसी घटनाओं को सामान्य आपराधिक घटनाएं मानकर ही कार्रवाई की जा रही है या ऐसी घटनाओं में लिप्त लोगों को राजनीतिक दबाव के चलते बचाया जा रहा है। जबकि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि मॉब लिंचिंग की घटनाओं को सामान्य अपराधों से अलग रखा जाए। लेकिन सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्देश पर अमल नहीं किया।

सवाल है कि अगर इस तरह के संवेदनशील मामलों में भी सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लेंगी तो इस संकट से देश को कैसे निजात मिलेगी? सवाल यह भी है कि सरकारें इन घटनाओं को नजरअंदाज कर क्या देश को गृहयुद्ध में धकेलने का अपराध नहीं कर रही हैं? अभी जो कुछ चल रहा है वह एकतरफा है लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती। जिस दिन पीडित तबकों की ओर पलटवार शुरू हो जाएगा, तब कैसा भ्यावह परिदृश्य बनेगा, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।

 

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