सादगी में भी एक अपूर्व सौंदर्य होता है। जरूरी होती है, उस सौंदर्य को पहचानने वाली दृष्टि। कभी एक अकेले मिट्टी के नन्हे दीए को जलते हुए देखो, उसके आत्मविश्वास में कभी थिर तो कभी कांपते गर्वीले आलोक को देखो तो उसका सौंदर्य द्विगुणित होता लगेगा। समस्त आकाशगंगाएं जगमगाते तारों ग्रहों और नक्षत्रों से भरी हुई हैं और हमारे लिए सूरज और चांद से बढकर कोई बडा दीया नहीं है। सृष्टि के इन दीयों से हमारी पृथ्वी और इसका जीवन हर पल आलोकित होता रहता है लेकिन मिट्टी का नन्हा दीया मनुष्य का एक प्राचीनतम आविष्कार है जिसका परिष्कार होता चला गया है। आज तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे आदिम मनुष्य ने गुफाओं से बाहर आकर जब पहले पहल मिट्टी के बर्तन बनाए होंगे और फिर दीए का आविष्कार किया होगा तो उसे कैसी अपार खुशी हुई होगी। मिट्टी से बनाया गया, मिट्टी में उगाए गए कपास की बत्ती और मिट्टी में ही उगाए गए सरसों या अन्य तिलहनों के तेल से भरे नन्हे दीए को गौर से देखो तो उसमें मानवीय श्रम, प्रतिभा और सौंदर्य के दर्शन होंगे। यह अकेला स्नेह भरा दीप प्रख्यात कवि अज्ञेय के शब्दों में कहें तो मदमाता दीप है जो पुकार-पुकारकर कह रहा है कि मुझे पंक्ति को दे दो।

मैं दीप अकेला

स्नेह भरा मदमाता पर

मुझको भी पंक्ति को दे दो

पंक्ति में पहुंचने की दीप की चाह वास्तव में एक अकेले मनुष्य की समाज से जुडने की चाह है। जैसे समाज से जुडकर मनुष्य सार्थकता पाता है, वैसे ही दूसरे दीयों की पांत में पहुंचकर ही अज्ञेय का दीया भी सार्थकता पाना चाहता है। अकेले आलोकित होने के बजाय सामूहिक रूप से आलोकित होना। अपने मदमाते अहं को समूची सामाजिक अस्मिता में तिरोहित करने की चाह। खुद दीया भी तो किसी एक आदमी की प्रतिभा और श्रम का परिणाम नहीं है। किसी एक ने मिट्टी खोदी है, किसी दूसरे ने उसे चाक पर चढाकर बनाया है, किसी तीसरे ने रूई उगाई है और बाती बनाई है जबकि चौथे ने सरसों के बीजों से तेल निकाला है और किसी पांचवें ने दीए में तेल और बाती डालकर उसे जलाया होगा। तो कितने हाथ एक दीए के प्रकाशित होने में लगे। अज्ञेय के दीए को इसका बोध है और वह इसीलिए पंक्ति को समर्पित है। प्रकाशित होने की यह अवधारणा ही मानवीय अवधारणा है जिसमें व्यक्ति नहीं समाज के बारे में सोचा गया है।

जरा गौर कीजिए कि कितने कम साधनों से एक नन्हा दीया समाज को प्रकाशित कर सकता है। यह सादगी के सामाजिक उत्कर्ष की चाह है। मुझको भी पंक्ति को दे दो। दीप जलाना एक स्तर पर अंधकार को दूर करना है – ‘जलाओ दीए पर रहे ध्यान इतना अंधेरा धरा पर कहीं न रह जाए’ (मैथिलीशरण गुप्त) तो दूसरी तरफ यह हमारी पृथ्वी की तमाम आकाशगंगाओं को एक विनम्र चुनौती भी है। यह कि तुम तो सृष्टि के आदिम प्रकाश से प्रकाशित हो जबकि मेरा नन्हा प्रकाश विशुद्ध मानवीय प्रयत्नों और मेरे सद्गुणों का परिणाम है। कहते हैं कि प्रकाश अनंत काल तक यात्रा करता रहता है और आज भी महाविस्फोट के तत्काल बाद बने पिंडों का प्रकाश अरबों प्रकाश वर्षों की यात्रा करके पृथ्वी पर पड रहा है। अगर यह बात सही है तो पृथ्वी का प्रकाश भी यात्रा करके सुदूर अंतरिक्ष में कहीं पहुंच रहा होगा। प्रकाश हम मनुष्यों के लिए इतना जरूरी है कि इसके कई रूपक हमने बना लिए हैं।

आत्मदीपो भव। अर्थात् अपनी आत्मा को प्रकाशित करो। बुद्ध की दार्शनिक व्याख्या में न भी जाएं तो हम साधारण मनुष्यों के लिए इसका इतना अर्थ तो होना ही चाहिए कि हम खुद को सद्गुणों से प्रकाशित करें। तमसो मा ज्योतिर्गमय:। अर्थात् हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ। प्रकाश है तो जीवन है और उसकी सार्थकता है। सभी संस्कृतियों में प्रकाश की इसीलिए तो कामना की गई है। इसीलिए तो मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि इतने दीए जलाओ, जिससे इस धरा पर कहीं अंधेरा न रह जाए। अंधेरा सिर्फ अज्ञान और अशिक्षा का ही नहीं होता, वह गरीबी, भुखमरी, बीमारी, भय, भ्रष्टाचार और कुशासन का अंधेरा भी होता है। एक नन्हा दीया जलाकर आप अपने घर के अंधेरे को तो भगा सकते हैं, मगर गरीबी, भुखमरी का अंधेरा भगाने के लिए तो सामूहिक मानवीय प्रयत्न और संकल्प चाहिए। एक नन्हे दीए के आविष्कार से लेकर आज तक मनुष्य ने आशातीत प्रगति की है,  वैभव और ऐश्वर्य का अपार सामान एकत्र कर लिया है मगर फिर भी उसे संतोष नहीं है। प्रगति के साथ-साथ उसमें लालच भी बढता चला गया है।

पूंजीवादी प्रगति के लिए कभी लालच और लोभ को एक सकारात्मक प्रवृत्ति निरूपित किया गया था मगर आज अमेरिका में शेयर बाजारों के मक्का ‘वॉल स्टीट’ को ऑक्युपाइ करने का आंदोलन पश्चिमी दुनिया के अनेक शहरों में फैल गया है और लोग अपनी गरीबी और आर्थिक हालात के लिए लालच के स्तंभों पर खडे इसी पूंजीवाद को कोस रहे हैं। यह पूछा जा रहा है कि यह पूंजीवादी समृद्धि किन बहुराष्टीय निगमों और बडे-बडे बैंकों के पेटों में उतरी और आर्थिक समानता लाने के बजाय क्यों आर्थिक गैर बराबरी बढती चली गई जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक गैर बराबरी की खाई भी चौडी हो गई और असंतोष फूटने शुरू हो गए। प्रकाश को लेकर भारत की पारंपरिक सोच लालच पर नहीं बल्कि संतोष पर आधारित है। संतोष और सादगी। कहा गया है ‘गोधन, गजधन, बाजधन और रतनधन खान, जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान’ गांधी जी ने भी ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का नारा दिया था।

आज गांधी के हिन्द स्वराज को सभ्यता के दर्शन के रूप में देखा जा रहा है मगर हम पश्चिम की अंधी नकल में लगातार प्रदर्शनप्रियता, तडक-भडक, फिजूलखर्जी की तरफ बढ रहे हैं और पृथ्वी के संसाधनों को तेजी से नष्ट कर रहे हैं। जल्दी ही हम मनुष्यों की जनसंख्या 7 अरब का आंकडा पार करने वाली है। जबकि शताब्दी के अंत तक यह आंकडा 10 अरब के आसपास हो जाएगा। इतने लोगों के लिए पृथ्वी के संसाधन बहुत कम होंगे। दीपावली पर करोडों रुपए हम पटाखों में उडा देते हैं और प्रदूषण फैलाते हैं। जुआ खेलते हैं और करोडों टन मिलावटी मिठाई भकोस जाते हैं। यह पवित्र त्योहार तडक-भडक और प्रदर्शनप्रियता में तब्दील हो गया है। आज जरू रत सादगी और संतोष की है। संसाधनों के बारे में सोचने की है। अपने को ऐसे सद्गुणों से भरने की है जिनसे समाज और समस्त मानवता का भी भला हो। इसलिए इस बार प्रतीकात्मकता के तौर पर ही सही, किसी गरीब के घर को नन्हे दीए के प्रकाश से भरिए और फिर उस सादगी का अपूर्व सौंदर्य देखिए। आपका तन-मन आलोकित हो उठेगा।

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