दिल्ली शहर किसी ज़माने में सिनेमा थियेटरों का शहर होता था। दिल्ली में देखते देखते कई सिनेमाघर बंद हो गए। वह सिनेमाघर जिनमें कई कई दिन तक हाउसफुल रहता था और कई फिल्में महीनों चलती थीं,आज उन पर ताले पड़े हुए हैं अथवा उन पर दुकानें बना कर मार्केट बना दी गई हैं।
पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में चार सिनेमाघर थे जो बंद हो गए। सबसे शुरू में मोती सिनेमा जो गौरी शंकर मंदिर के सामने था वह कुछ साल पहले तक चल रहा था, अब बंद हो गया है। वहां मैंने 1960 में बचपन में राजकपूर की फिल्म ‘ जिस देश में गंगा बहती है’ देखी थी । नवीन निश्छल और रेखा की’ सावन भादों ‘ 1970 जब मैं कॉलेज में पढ़ता था , देखी थी। राजेंद्र कुमार की ‘मेरे महबूब ‘ के अतिरिक्त न जाने कितनी फिल्में मैंने यहां देखी थी।
थोड़ा आगे चल कर लगभग 50 कदम आगे और चर्च से पहले कुमार टाकीज़ सिनेमा थियेटर था ।वहां आजकल मैकडोनल खुला है , वह भी बंद हो गया ।वहां पर दुकानें बना दी गईं। थोड़ा आगे चल कर शीश गंज गुरुद्वारे के सामने जहां फव्वारा चौक है,वहां मैजेस्टिक सिनेमा हॉल था उसे बंद कर दिया गया । अब वहां सिखों की धर्मशाला है। थोड़ा और आगे मुड़कर जो सड़क पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर जाती है ,उस पर 100 कदम आगे जुबली सिनेमा हॉल था उसे बंद कर दिया गया। इधर फतहपुरी चौक से मुड़कर, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से जो सड़क आज़ाद मार्केट की ओर जाती है वहां नॉवल्टी सिनेमा हॉल था वह भी बंद कर दिया गया। यह सब सिनेमा हॉल ऐसे थे जो लोगों से खचाखच भरे रहते थे। सस्ती टिकट होती थीं । सबसे सस्ती टिकट एक रुपए पच्चीस पैसे से शुरू होकर पांच से लेकर दस रूपए तक होती थी।धीरे धीरे समय और महंगाई की मार से टिकट महंगी होती गईं। मेरे बचपन में चांदनी चौक जाने का मतलब होता था शहर जाना। निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग के लोग चांदनी चौक घूमने और शॉपिंग करने जाते थे ।उच्च मध्य वर्गऔर संभ्रांत वर्ग के लोग कनॉट प्लेस जाते थे।
मेरे बाबू जी जब भी चांदनी चौक हमें ले जाते तो विग पूरी वाले के छोले भटूरे और और गर्मागर्म गुलाब जामुन खाने को मिलते थे ।विज पूरी वाला की बड़ी सी दुकान , जैन मंदिर और गौरी शंकर मंदिर के सामने जहां आजकल फूल वाले बैठते हैं, वहां होती थी।उसको भी हटा दिया गया। छोले भटूरे खाने और गुलाब जामुन खाने के बाद किसी न किसी थियेटर में पिक्चर देखी जाती थी।अगर हाउस फुल होता और टिकट नहीं मिलती तो मन बहुत उदास हो जाता। कभी कभी टाउन हॉल के सामने बन्टे वाली लेमन पीने को मिलती।आज भी वह छोटी सी दुकान लेमन वाली अभी भी है।
दरीबा के बाहर आज भी देसी घी की जलेबी की दुकान है जिसका आनंद अपने बचपन से लेकर आज तक लेता आ रहा हूं।
मैं बहुत छोटा था ,मुझे याद है कि चांदनी चौक में कलकत्ता की तरह ट्राम चलती थी जिसमें ड्राइवर पीतल का बड़ा घंटा बजाता हुआ चलता था । यह ट्राम फतह पुरी की तरफ जाती थी ।इसी तरह पुरानी सब्जी मण्डी और बर्फखाना पर भी ट्राम चलती हुई मैंने देखी है जिन्हें साठ के दशक में बंद कर दिया गया।
इसी तरह फिल्मिस्तान थियेटर जो पुलबंगश से आगे था , काफी लंबे समय तक चला ।उसे भी बंद कर दिया गया। रोशनारा रोड पर पैलेस सिनेमा था जो अभी बंद पड़ा है। 1951के आसपास इसकी शुरूआत हुई। इस का नवीनीकरण 1969 के आसपास हुआ और इसमें 70एमएम का सक्रीन और आधुनिक साउंड सिस्टम लगाया गया। जनवरी 1978 में जब जनता पार्टी की सरकार थी ,फिल्म फेस्टिवल हुआ था । ‘द नेट ‘फिल्म को देखने इन्दिरा गांधी इस थियेटर पर आईं थीं। फिलहाल यह सिनेमा हॉल भी बंद पड़ा है। शीला सिनेमा नई दिल्ली स्टेशन के पास है । वहां जब उसका नवीकरण हुआ तो 70एमएम सिस्टम का बड़ा स्क्रीन लगाया गया। आनंद पर्वत करोल बाग़ के पास लिबर्टी सिनेमा अभी भी है। इसी तरह दरिया गंज में गोलचा सिनेमा बंद हो गया ।आसफ अली रोड पर डिलाइट सिनेमा थिएटर आज भी हैं और चल रहा है।
कश्मीरी गेट मोटर मार्केट में मिनर्वा थियेटर था, वह बंद हो चुका है। कश्मीरी गेट के मेट्रो स्टेशन के पास रिट्ज सिनेमा हॉल था जिस में मैंने अपने बचपन में अपने दादा जी के साथ ‘ मेरा साया ‘ सुनील दत्त और साधना की फिल्म 60 के दशक में देखी । यह थियेटर कुछ साल पहले तक चल रहा था,वह भी बंद पड़ा है।
पुरानी दिल्ली में सबसे सस्ता रॉबिन टॉकिज था जो घंटाघर चौक से आगे बाज़ार में था। इसके अंदर बैंच बिछे होते थे। चार पांच आने और सवा रूपए की टिकट होती थी। लाइट चली जाती थी या फिल्म की रील कट जाती थी तो खूब शोर होता था । सीटियां बजती थीं। परिवार के साथ यहां लोग आना पसन्द नहीं करते थे। मैंने सिर्फ एक बार वहां फिल्म देखी जिसका नाम ‘ दुर्गेश नंदिनी ‘ था।
झंडेवालान में नाज़ सिनेमा हॉल था । जो दिल्ली में बहुत पुराना थियेटर था। इसके पीछे दिल्ली विश्वविद्यालय का महिलाओं का भारती कॉलेज था । इस थियेटर में विश्वविद्यालय के लड़के लड़कियां भरे रहते थे । 1994 के आसपास इसे भी बंद कर दिया गया। इमरजेंसी के बाद यहां पर ‘ आंधी ‘ फिल्म कई हफ्ते चली थी। इसी तरह पहाड़ गंज में ‘ खन्ना ‘ सिनेमा हॉल था। मुझे उसके बारे में में नहीं मालूम कि अभी है या नहीं।
यह जितने भी थियेटर थे जिन की मैंने चर्चा की है ,यह सब मेरे जन्म से पहले के चले आ रहे थे या अंग्रेज़ो के ज़माने के थे।इन पर समय की ऐसी मार पड़ी कि धीरे धीरे सब बंद हो गए।
मेरी यादाश्त में जो नए सिनेमा हॉल पुरानी दिल्ली में मेरे सामने बने उनमें घंटा घर के पास अम्बा थियेटर है ,जो 70के दशक में बना । यह अभी तक चल रहा है। उसके बाद अल्पना थियेटर मॉडल टाउन में बना।इसकी शुरुआत 1967 में हुई। मेरे घर के नजदीक होने के वजह से मैंने इसमें बहुत फिल्में देखी। मुझे याद आ रहा है कि शायद इसमें राजकुमार की फिल्म ‘ हमराज़ ‘ का प्रीमियर शो भी हुआ था और राजकुमार आए थे । उनको देखने के लिए बहुत भारी भीड़ जुटी थी। कुछ साल पहले यह थियेटर भी बंद हो गया। तीसरा अशोक विहार में दीप सिनेमा हॉल बना । यह भी खूब चलता था पर कुछ साल पहले यह भी बंद हो गया और इसमें भी दुकानें और मार्केट बना दी गईं। उत्तरी दिल्ली के मुखर्जी नगर में बत्रा सिनेमा हॉल बहुत बाद में खुला वह भी बंद हो गया। यह सारे सिनेमा हॉल ज़्यादातर हमेशा भरे रहते थे। क्योंकि यह दिल्ली विश्वविद्यालय के नजदीक थे इसलिए खूब छात्रों की भीड़ इनमें देखने को मिलती थी।
मैं नहीं जानता कि इनको किन की नज़र लगी । कनॉट प्लेस में रीगल को छोड़ कर आज भी सारे सिनेमा हॉल चल रहे हैं। कुछ समय पहले जब रीगल सिनेमा हॉल जब बंद कर दिया गया तो कई सिनेमा प्रेमी इसे देख कर भावुक हो गए।
प्लाजा,ऑडियन् ,रिवोली,रीगल के साथ मेरे बचपन की कितनी यादें जुड़ी हुई है। इन सिनेमा थियेटरों में मैंने अपने बचपन में बाबू जी के साथ कितनी ही फिल्में देखी होंगी– बंदिनी, स्त्री,गीत गाया पत्थरों ने,गाइड, ज्वे्ल थीफ। एक अजीब बात थीं कि लगभग सभी सिनेमाघरों के बाहर ब्लैक में टिकट बिकती थीं। जब कोई नई फिल्म रिलीज़ होती थी तो उसकी टिकटें एडवांस में कई दिन पहले ब्लैक में बेचने वाले बुक करा लेते थे और शो से पहले सिनेमा हॉल के बाहर बेचते हुए नजर आते थे।
समय के साथ साथ परिवर्तन आए ।आज नए नए मॉल खुल गए हैं।पी वी आर, मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल खुल गए हैं। जिनमें अलग अलग शो में अलग अलग पिक्चर्स चलती है।जिनमें दो तीन सौ से टिकट शुरू होती है ।कुछ मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल में खाने पीने के पैकेज के साथ हजार पंद्रह सौ का भी टिकट होता है।
पर पुराने सिनेमा हॉल क्यों बंद हो रहे हैं ? इसका सही उत्तर समझ नहीं आ रहा। सस्ते ज़माने में इनको बनाया गया था । आज दिल्ली में जमीनों के रेट जब आसमान छूने लगे इसलिए दुकानें और मार्केट बना कर उसे बेच देने में ज़्यादा मुनाफा इनके मालिकों को मिलने लगा ? या यह कारण है कि सरकार की नीतियों की वजह से या सुरक्षा कारणों से यह बंद होने लगे ? यह भी हो सकता है कि इनके रखरखाव और आज की तकनीक के अनुसार इतना खर्चा बढ़ गया है कि इनके मालिक उस खर्च को उठा नहीं पा रहे हैं । कह सकता हूं कि चाहे घर घर टी वी या मनोरंजन के साधन हो गए हों पर आज भी ज़्यादातर लोग थिएटर पर जाकर फिल्म देखना पसंद करते हैं। कई सिनेमा हॉल तो काफी पुराने हैं और इतिहास की दृष्टि से भी महत्त्व रखते हैं, इनके बारे में सरकार को सोचना चाहिए और प्रयत्न होना चाहिए कि इन्हे शुरू किया जा सके पर कोरोना काल के पश्चात।

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