#MeToo को लेकर भारत के सोशल मीडिया पर चल रही बहस में कई अलग-अलग किस्म के मुद्दे गड्मगड हो गए हैं. मसलन-  दोषी को सज़ा देने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए या  सोशल मीडिया के ज़रिए ट्रायल किया जाना चाहिए? क्या लुभाने की कोशिश और ज़बरदस्ती करना एक ही बात है? क्या बलात्कार और आपसी सहमति से बनाए गए सम्बन्ध, ये दोनों ही यौन– उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं? क्या निरर्थक प्रलाप और अभिव्यक्ति की आज़ादी एक ही बात है? नि:संदेह ‘मी टू’ बहस से सम्बंधित ऐसे मुद्दों की सूची बहुत लम्बी है. मगर यह बात स्वीकार करने से गुरेज़ नहीं कि इस अभियान के बहाने महिलाओं को लेकर पितृसत्तावादी समाज और उसकी सड़ी–गली संस्कृति की धज्जियाँ उड़ गई है. ‘मी टू‘ के ज़रिए सरेआम छिछालेदारी का भय भविष्य में यौन शोषण और उत्पीडन की घटनाओं पर काफी हद तक लगाम लगाने में मददगार अवश्य साबित होगा.

साथ ही कडुवी सच्चाई यह भी है कि ‘मी टू‘ अभियान हमारे ध्वस्त हो चुके न्यायतंत्र से उपजी निराशा का परिणाम है जिसमें कानून के बजाए सोशल मीडिया के ज़रिए आरोपियों का ट्रायल किया जा रहा है. विशाखा गाइडलाइन्स और त्वरित न्याय प्रक्रिया के प्रावधान के बावजूद यौन अत्याचारों के मुकदमों में एक महिला को कैसी–कैसी दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

हालांकि महिलाओं के यौन शोषण की जड़ें वित्त, खेल, कला, राजनीति और पत्रकारिता जगत तक फैली हुई हैं मगर आश्चर्यजनक रूप से मीडिया फिल्म जगत की खबरों को कुछ ज्यादा ही चटकारे लेकर सुनाता है. यह लेख लिखे जाने तक न्याय, पत्रकारिता और कला जगत से जुड़े कई नामचीन चेहरे आरोपों के घेरे में आ चुके हैं और बाक़ी बचे हुए सांस रोके बैठे हैं न जाने कब अतीत अपने मैले दांत निपोरता हुआ दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाए.

‘’यदि आप भी यौन शोषण या उत्पीड़न का शिकार हुई हैं तो ‘me too‘ लिखकर मेरी इस ट्वीट का जवाब दें‘’ जब अक्टूबर 2017 में हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने अभिनेता हार्वे वेंस्टीन को निशाना बनाते हुए यह ट्वीट किया था तो उन्हें इस बात का ज़रा भी भान नहीं था कि वह एक दशक पूर्व अश्वेत महिला एक्टिविस्ट तराना बर्क द्वारा इज़ाद किए गए उस  वाक्यांश का प्रयोग अपने ट्वीट में कर रही हैं जो उन्होंने यौन उत्पीडन की शिकार महिलाओं के साथ समानुभूति प्रदर्शित करने के लिए लिखा था. यह बात और है कि तब यौन शोषण की शिकार महिलाओं के साथ समानुभूति प्रदर्शित करने का एक दशक पुराना वह तरीका महिलाओं को ‘बेचारी’ साबित करने के बजाए अब सोशल मीडिया के कंधे पर चढ़कर ‘महिला सशक्तिकरण’ के एक विश्वव्यापी आन्दोलन का रूप ले चुका है. यहाँ तक कि ऑस्कर और बाफ्टा समारोहों में भी इस अभियान को पुरजोर समर्थन मिला. ‘मी टू’ के ज़रिए आरोपों के घेरे में आई नामीगिरामी हस्तियों के चेहरे जैसे–जैसे सोशल मीडिया ट्रायल की कालिमा से कलंकित होते गए वैसे–वैसे ‘मी टू’ अभियान को नई ऊर्जा मिलती गई. कई हस्तियों का फलता–फूलता करियर अचानक काल– कवलित हो गया.

इसके बावजूद  ‘मी टू’ अभियान की उग्रता से असहमति रखने वाले स्वरों की कमी नहीं है. इस अभियान को क्रांतिकारी बताने वाले स्लोवेनिया के दार्शनिक ज़िज़ेक ने भी माना कि ‘मी टू‘ केवल एक ख़ास तबके की महिलाओं के यौन शोषण पर केन्द्रित है जिसकी आम औरतों के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है, और न ही यह अभियान उनके जीवन में कोई गुणात्मक बदलाव ला सकता है.

फ्रांस में 100 विख्यात महिलाओं ने एक खुली चिठ्ठी लिखकर ‘मी टू‘ को विच हंट का नाम देकर आफत मोल ले ली थी. उन्हें तुरंत ‘बुरी औरतें‘ की पदवी से नवाज़ दिया गया और इस प्रकार स्त्रीवाद को दो खेमों में बाँट दिया गया- ‘मी टू’  की समर्थक ‘अच्छी औरतें‘ और असहमत ‘बुरी औरतें‘!

‘मी टू‘ को लेकर बॉलीवुड में मचे हाहाकार पर सफल अभिनेत्रियों की चुप्पी वाकई हैरान करने वाली है. ‘कास्टिंग काउच‘ की रवायत वाले फिल्म उद्योग में ये सफल अभिनेत्रियाँ महज़ अपनी क़ाबिलियत के बल पर शोहरत की बुलंदियां छू गईं हों, यह बात गले नहीं उतरती.

विश्वसुन्दरी का ताज पहन चुकी एक खूबसूरत अदाकारा हाल ही में ‘मी टू‘ के समर्थन में उतरीं मगर बड़ी चतुराई से यह राज़ छिपा गई कि किस प्रकार फिल्मों में फ्लॉप हो चुके अपने करियर को परवान चढाने के लिए फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर शोमैन के साथ मुंबई के मढ आयलैंड के एक बंगले में तीन महीने तक अपनी खूबसूरती का सौदा किया तब कहीं जाकर सुर और ताल मिल पाए.

जब उनका करियर बुलंदी पर था तब टॉयलेट बाबा की हर फिल्म की तारिका उनके साथ रात गुजारने के बाद ही फिल्म के सेट तक पहुँच सकती थी. जाहिर है इंडस्ट्री की अनेक सफल तारिकाओं ने उनकी रातें रंगीन की होंगीं. हैरत है कि  ‘मी टू‘ को लेकर उन सभी तारिकाओं के मुंह में दही जमा हुआ है.
भले ही आप शोभा डे के उपन्यास ‘द स्टारी नाइट्स‘ को लुगदी साहित्य बताकर दरकिनार कर दें मगर हिंदी फिल्म जगत की रग–रग से वाकिफ़ रही शोभा डे का यह उपन्यास बहुत विस्तार से बयान करता है कि सिनेप्रेमियों की ‘उमराव जान‘ और ‘ड्रीमगर्ल’ क्या–क्या ‘समझौते’ करके सितारों की दुनिया की मल्लिका बनी रहीं. मगर दोनों ही आज आश्चर्यजनक रूप से इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए बैठी हैं.

यह आलेख लिखे जाने तक देश के विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर, जो पेशे से पत्रकार रहे हैं, पर अब तक नौ महिला पत्रकार यौन शोषण का आरोप लगा चुकी हैं मगर मजाल है कि ‘बेटी पढाओ, बेटी  बचाओ‘ का नारा बुलंद करने वाली मौजूदा केंद्र सरकार के कान पर जूं रेंगी हो. आरोपों से घिरे मंत्री महोदय यदि किसी अन्य राजनीतिक दल से होते तो अब तक अपने धर्मसूचक नाम की वजह से ही मॉब लिंचिंग का शिकार हो गए होते.

सोशल मीडिया पर चल रहे इस अभियान की गलत व्याख्या करने एवं स्त्री–विरोधी होने का तमगा चस्पां किए जाने की कीमत पर भी मैं यही कहूँगी ‘मी टू‘ का नारा बुलंद करने का नैतिक अधिकार केवल उन महिलाओं को है जिन्होंने यौन शोषण या यौन शोषण की मांग के सामने घुटने टेकने से इनकार करते हुए अपने करियर की बलि दे दी हो. फिल्मकार विनता नंदा को ‘मी टू‘ का नैतिक अधिकार इसलिए नहीं दिया सकता कि वह तथाकथित ‘संस्कारी‘ अभिनेता द्वारा एक बार बलात्कार का दंश झेलने के बावजूद बार–बार लौटकर उसी अत्याचारी के पास जाती रहीं. उनका यह बार-बार जाना बलात्कार नहीं सहमति से यौन सम्बन्ध की श्रेणी में आता है.

इस बात से इनकार नहीं कि ‘मी टू‘ अभियान का हिस्सा बनना पीड़ितों की वेदना में सहभागी होने की आत्मिक संतुष्टि देता है मगर साथ ही यह भी जरूरी है कि आपसी सहमति से बनाए गए यौन सम्बन्ध और यौन शोषण/उत्पीड़न को तराजू के एक पलड़े में रखने की गलती से बचा जाए.

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