मी-टू आंदोलन ने सामने बड़ी-बड़ी बाधाएं खड़ी करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। अपनी व्यथा-कथा लेकर सामने आई औरतों से तरह-तरह के सवाल होने लगे हैं। इन कथाओं की आंच जबतक सिनेमा और मीडिया के क्षेत्र तक सीमित थी, तब तक सत्ता में बैठे लोग इसे तमाशे के रूप मेें ले रहे थे। लेकिन विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का नाम आने के बाद चीजें तेजी से बदलने लगीं। चार रिटायर्ड जजों की कमेटी बनाने का फैसला भी इसी का नतीजा है। कहा गया है कि कमेटी इन शिकायतों से उठे मुद्दों पर विचार करने और काम करने की जगह पर होने वाले यौन उत्पीड़नों के रोकने की वर्तमान व्यवस्था को दुरूस्त करने के उपाय भी सुझाएगी। कमेटी कुछ शिकायतों की सुनवाई भी  करेगी।
समाजवादी विचारक डा राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जोर-जबर्दस्ती और वादा-खिलाफी यानि रिश्ते में फरेब को छोड़ कर औरत-मर्द रिश्ते में सब कुछ जायज है। मी-टू आंदोलन के तहत आ रही शिकायतों को जांचने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता है। डा लोहिया जाति भेद और लिंग-भेद को भारत में गैर-बराबरी का सबसे बड़ा आाधार मानते थे। इस आंदोलन से औरतों  को कितनी बराबरी मिलेगी, यह कहना मुश्किल है। लेकिन उनकी मुक्ति का ऐसा दरवाजा इसने जरूर खोला है जो उन्हें देखने का हमारा नजरिया बदल देगा।

एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन किस तरह चालाकियों का शिकार हो जाता है, यह यहां भी देखने को मिल रहा है। सरकार ने कमेटी बना कर इसे काम की जगह पर होने वाली बदसलूकी का मामला भर बना दिया है। मी-टू इससे बहुत आगे का आंदोलन है।  हमें यह देखना चाहिए कि नारीवादी आंदोलन की लंबी मुहिम के बाद भी औरतें यौन अत्याचार को सामने लाने में हिचकती थीं। कानून भी उनकी पहचान बाहर लाने के खिलाफ था। समाज से मुंह चुराने का यह रवैया ऐसा है जो पीड़ित और अत्याचारी दोनों को अपराधी बना देता है। पीड़ित को लगता है कि वह गलत हो गई। मी-टू ने एक झटके में हजारों साल की गांठ को खोल दिया है। औरतें बिना किसी अपराध-भाव के सामने आ रही हैं। वे अपना नाम बता रही हैं। सारे किस्से बता रही हैं। उनके मन पर गलत हो जाने का जो दाग चिपका हुआ था, वह मी-टू की खूबसूरत बारिश में धुलने लगा है।
बलात्कार औरतों के मन को दहशत और आत्महीनता में डुबो देता है। यह भावना उम्र भर पीड़ित के साथ बनी रहती है। मी-टू ने अचानक एक ऐसी खिड़की खोल दी है जिससे इज्जत खोने का डर बाहर भाग रहा है। 
यह दिलचस्प है कि अकबर के मामले में सरकार की ओर से सिर्फ एक महिला मंत्री ही बोली हैं। स्मृति ईरानी ने कहा कि अकबर को खुद सफाई देनी चाहिए। महिला और बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी मी-टू आंदोलन ने पहले ही समर्थन कर दिया था। जाहिर है सरकार ने उन्हें आगे कर दिया और उन्होंने ही कमेटी की घोषणा भी की है। मोदी सरकार के  बाकी मंत्रियों ने अजब सी खामोशी अख्तियार कर ली। सुषमा स्वराज और रविशंकर प्रसाद पत्रकारों के सामने से आगे बढ गए जैसे कह रहे हों कि  मेरे से मत पूछ, भाई ….इस बारे में प्रधानमंत्री ही बताएंगे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जरूर बता दिया कि आरोपांे को देखेंगे कि गलत हैं या सही।
धीरे-धीरे ही सही, इस आंदोलन के बारे में राजनीतिक पार्टियोें की राय भी आ गई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आंदोलन को खुला समर्थन दिया और कहा कि सच को जोर से कहना चाहिए और स्पष्ट कहना चाहिए। ‘‘यह समय को लेकर है कि लोग औरतों के सम्मान और गरिमा के साथ बर्ताव करें,’’ राहुल ने कहा। सीपीएम ने वरिष्ठ नेता वृंदा करात को इस आंदोलन के प़क्ष में बोलने के लिए सामने कर दिया हैं। यह एक सही कदम है। वह अकबर के लगातार इस्तीफे की मांग भी कर रही हैं।
देश की राजनीति का दूसरे महत्वपूर्ण खेमा-हिंदुत्व खेमा ने भी अपनी राय जाहिर कर दी है। आरएसएस के वरिष्ठ कार्यकर्ता इंदे्रश कुमार ने शिकायतों के देरी से उठाए जाने पर सवाल किए हैं। इसीतरह मध्य प्रदेश भाजपा की महिला शाखा की अध्यक्ष लता केतकर ने भी कह दिया है कि अकबर के खिलाफ बदसलूकी का आरोप लगाने वाली पत्रकारों को वह मासूम नहीं समझती हैं। वैसे उन्होंने मी-टू आंदोलन का समर्थन किया है कि इसने महिलाओं को अपने साथ की गई बदसलूकियोें को सामने लाने का मौका दिया है।
जहां तक सवाल भारतीय राजनीति का है, यह पतित और पाख्ंाडी है। यह समाज के किसी भी तबके को उनकी तकलीफों से छुटकारा दिलाने की मुहिम से बहुत दूर है। यह कमजोर के खिलाफ है चाहे वह गरीब हों, पिछड़े हों, दलित हों, मुसलमान या औरत।
नेताओं की ऐय्याशी के किस्से आम हैं।  पहले तो ये लोक कथाओं की शक्ल में बाहर आते थे, लेकिन अब ये आडियो और वीडियो रिकार्डिंग के रूप में उपलब्ध हैं। हमारा समाज इतना पुरूषवादी है कि इसे पौरूष के कारनामे के रूप में ही देखता रहा है।  मी-टू एक आंदोलन ने इस खोखले पौरूष की हवा ही निकाल दी है। यह कितना मजेदार है कि औरत चुनौती दे रही है कि अभागे, तूने मेरी स़्त्रीत्व को जबरन लांघा है …तू अपराधी है । वह कह रही है कि वह कुलटा नहीं है। और,  लोग उसकी पीड़ा की कहानी धैर्य से सुन रहे हैं। यह सभ्यता के बदलने का क्षण है। कमेटी को काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की जांच सौंपे जाने का फैसला कर  मी-टू के भारतीय संस्करण की हवा निकाली जा रही है। औरतों को रूकना नहीं चाहिए। उन्हें दिल में जमे मवाद को बारिश में धुलने देना चाहिए। बाकी आगे देखा जाएगा।

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