‘लुटेरो’ से तालमेल नहीं करने की गारंटी नहीं!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड में जिन दलों को राज्य लूटने वाला बता रहे है, चुनाव के बाद भाजपा सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन नहीं लेगी, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। मोदी ने जम्मू कश्मीर मे मुफ्ती पिता-पुत्री के लिए कहा था कि ये लोग राज्य लूटने के लिए सत्ता में आते हैं। भाजपा की ओर से मुफ्ती परिवार की पार्टी पीडीपी को देशद्रोही और आतंकवादियों का हमदर्द भी कहा गया था। मगर चुनाव के बाद उनके साथ सरकार बनाने में कोई संकोच नहीं किया। बिहार में नीतीश कुमार और हरियाणा में चौटाला के उदाहरण भी सबके सामने हैं। ताजा मामला महाराष्ट्र का रहा, जहां भाजपा ने अजित पवार को 72 हजार करोड रुपए के सिचाई घोटाले का आरोपी बता कर जेल भेजने का वादा किया था लेकिन चुनाव बाद उनके समर्थन से सरकार बना कर उनको उप मुख्यमंत्री बना दिया और उन्हें घोटाले के आरोप से बरी भी कर दिया। यह अलग बात है कि सरकार महज दो दिन ही चल पाई। इसलिए झारखंड में जब प्रधानमंत्री ने कहा कि यह चुनाव राज्य को लूटने वाले और इसकी सेवा करने वालों के बीच है तो किसी विपक्षी पार्टी ने इसे गंभीरता से नही लिया होगा। वहां भाजपा के विरोध में लडने वाली आजसू, लोजपा, जद (यू), जेएमएम आदि कई पार्टियां भाजपा के साथ रह चुकी हैं या अब भी साथ हैं। चुनाव बाद अगर त्रिशंकु विधानसभा बनती है तो भाजपा को सरकार बनाने के लिए इनमें से ही किसी की मदद लेनी होगी।

आधी रात के फैसले

केंद्र में जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह आमतौर पर रात में ही काम करती है और सारे महत्वपूर्ण फैसले भी रात में ही लेती है। कांग्रेस या यूपीए की सरकार के समय कांग्रेस मुख्यालय रात में गुलजार हुआ करता था और भाजपा के दफ्तर में शाम होते ही उल्लू बोलने लगते थे। अब पूरा रुटीन उलटा हो गया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कार्यकाल में भाजपा रात भर काम करती है और सरकार में भी कई बडे फैसले आधी रात को होते हैं। महाराष्ट्र में सरकार बनाने से जुडे सारे काम आधी रात या उसके बाद हुए। राज्यपाल ने एक बजे रात को राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश भेजी। उसी समय प्रधानमंत्री ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इसे मंजूर किया और अपनी अनुशंसा राष्ट्रपति को भेजी और रात दो बजे से तडके पांच बजे के बीच किसी समय राष्ट्रपति ने इसे मंजूर किया। ये सो काम वैसे तो कानून सम्मत रहे मगर हडबडी की वजह से तौर तरीकों पर सवाल उठना लाजिमी था। इसी तरह सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को हटा कर उनकी जगह नागेश्वर राव को कार्यकारी निदेशक बनाने का काम भी आधी रात को हुआ था। आधी रात को प्रधानमंत्री की मंजूरी के बाद सीआरपीएफ के जवानों ने सीबीआई मुख्यालय को घेर लिया था, दफ्तरों की तलाशी ली गई थी, उन्हें सील किया गया था और नागेश्वर राव ने दो बजे रात को कामकाज संभाला था। इससे कुछ समय पहले सरकार ने आधी रात को संसद का विशेष सत्र बुलाकर जीएसटी कानून लागू किया था।

उलटा पड गया पासवान का पैंतरा

राजनीतिक मौसम विज्ञानी के रूप में मशर रामविलास पासवान के लिए कहा जाता है कि वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह को खुश करने का कोई मौका नहीं छोडते। उनकी सोशल मीडिया टीम को भी स्थायी आदेश है कि मोदी और शाह के ट्वीट्स को रीट्वीट करना जरूर याद रखे। पासवान की ‘भक्ति’ असर भी रखती है। कई मौकों पर देखा गया है कि मोदी और शाह की तरफ से उन्हें खासी तवज्जो भी मिली। कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल पर हमलावर करने के पीछे उनकी सोच थी कि इससे मोदी और शाह की नजर मे नंबर और बढ जाएंगे, लेकिन यह दांव उलटा पड गया। भाजपा को डर सताने लगा कि इस चक्कर में बैठे-बिठाए मुश्किल न बढ जाए तो फौरन पासवान को हिदायत भेजी गई कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से ज्यादा उलझने की जरूरत नहीं है। दरअसल पासवान को लग रहा था कि दिल्ली में चुनाव नजदीक है, लिहाजा अगर वे दिल्ली के प्रदूषित पानी का मुद्दा उठा देंगे तो यह भाजपा के पक्ष में जाएगा। लेकिन केजरीवाल ठहरे ‘प्योर एक्टिविस्ट’। उन्होंने पलटवार करते हुए पासवान का हित एक निजी कंपनी से ऐसा जोडा कि पासवान के लिए सफाई देना मुश्किल हो गया। जब उसकी आंच भाजपा की तरफ बढने लगी तो शीर्ष नेताओं को खतरे का अहसास हुआ। फौरन पासवान को संदेश भेजा गया कि दिल्ली संवेदनशील है और केजरीवाल उससे भी कहीं ज्यादा संवेदनशील है। इसलिए आगे से दिल्ली और केजरीवाल पर कुछ बोलने में सावधानी बरती जाए।

झारखंड को लेकर नाउम्मीद हैं मोदी?

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के नतीजे आने के बाद पता चला कि ऊ परी तौर पर भाजपा की जो ‘हवा’ महसूस की जा रही थी, वह मतदाताओं को ‘कमल’ का बटन दबाने वाला नहीं बना सकी। नतीजा यह हुआ कि हरियाणा में किसी तरह से सरकार तो बन गई, लेकिन महाराष्ट्र में जो हुआ, सबके सामने है। ऐसे में भाजपा के लिए झारखंड जीतना बेहद अहम हो गया है। लेकिन भाजपा से जुडे सूत्र बताते हैं कि यह पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें प्रधानमंत्री अपनी ताकत बहुत ज्यादा झोंकने के मूड में नहीं है। राज्य में पांच चरण में मतदान होना है। वहां पार्टी मोदी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की पक्षधर है, लेकिन मोदी ने झारखंड में पांच दिन ही देने का फैसला किया है। इससे अधिक दिन देने की मांग उन्होंने खारिज कर दी है। यानी पांच दिन में उनकी 10 सभाएं कराने की तैयारी है। उधर महाराष्ट्र का मुद्दा लंबा खिच जाने की वजह से पहले चरण के लिए अमित शाह भी ज्यादा समय नहीं दे पाए। महाराष्ट्र के घटनाक्रम को लेकर अमित शाह की व्यस्तता का आलम यह रहा कि पिछले दिनों उनसे मुलाकात के लिए हरियाणा के मुख्यमंत्री को पांच दिन इंतजार करना पड़ा। यह मुलाकात राज्य मंत्रिमंडल के विस्तार पर अंतिम मुहर लगवाने के लिए थी।

चंद्रबाबू फिर थामेंगे भाजपा का हाथ

ऐसा लग रहा है कि आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के नेता चंद्गबाबू नायडू का विपक्षी राजनीति से मोहभंग हो गया है और वे फिर से एनडीए में लौटने की राह बनाने में लगे हैं। यही वजह है कि मई में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद उन्होंने एक बार भी विपक्षी पार्टियों की राजनीति में हिस्सा नहीं लिया है। वे दिल्ली का दौरा भी नहीं कर रहे हैं और विपक्षी एकता की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। हालांकि भाजपा ने उनकी पार्टी तोड दी और चार राज्यसभा सदस्यों को अपने में मिला लिया, इसके बावजूद वे भाजपा के प्रति सद्भाव दिखा रहे है। पिछले दिनों प्रदेश के नक्शे में अमरावती को लेकर कुछ गडबडी हुई तो उन्होंने इसे ठीक कराने की अपील सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कर दी। जब नक्शा ठीक हो गया तो नायडू ने ट्विट करके अमित शाह को धन्यवाद दिया। असल में नायडू को लग रहा है कि मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी से अकेले लडना आसान नहीं है। एक तरफ जगन उनकी पार्टी तोड रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा तोड रही है। दूसरे, उनको यह भी लग रहा है कि एक साथ राज्य और केंद्र की सरकार से पंगा लेना ठीक नहीं है। जगन मोहन की राजनीति से भाजपा को भी मुश्किल हो रही है। इसलिए अगर दोनों पार्टियां जल्द ही एक साथ आ जाएं तो हैरानी नही होनी चाहिए।

उद्धव चुनाव नहीं लडेंगे!

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अभी विधायक नहीं है। उन्हें छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन का सदस्य बनना होगा। लेकिन इस बात की संभावना कम है कि वे विधानसभा का चुनाव लडेंगे। महाराष्ट्र में विधानमंडल के दोनों सदन यानी विधानसभा भी है और विधान परिषद भी। इसलिए कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे विधान परिषद के जरिए विधायक बनेंगे। बिहार और उत्तर प्रदेश में तो लंबे समय से मुख्यमंत्री विधान परिषद के ही सदस्य होते आए हैं। नीतीश कुमार लंबे समय से एमएलसी और उनके उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी भी एमएलसी ही हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पिछले तीन मुख्यमंत्री विधान परिषद के रास्ते ही विधायिका में पहुंचे। पिछले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधानसभा का चुनाव नही लडा था और मायावती भी नही लडती थी। इसलिए अगर उद्धव ठाकरे चुनाव नहीं लडते हैं और विधान परिषद के सदस्य बन जाते है तो यह कोई अनोखी बात नहीं होगी। हालांकि पार्टी में एक खेमा ऐसा है, जो चाह रहा है कि उद्धव को आदित्य ठाकरे वाली वरली सीट से उद्धव को चुनाव लडना चाहिए। लेकिन शिवसेना के सूत्रों का कहना है कि आदित्य से इस्तीफा नहीं कराया जाएगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि वैसे भी उद्धव को बहुत लंबी राजनीति नहीं करनी है। उनको अपनी विरासत आदित्य को ही सौंपनी है। इसलिए जरूरी है कि वे विधायक बन रहे और विधायिका व कार्यपालिका दोनों के काम करीब से देखे।

चलते-चलते

भाजपा सांसद और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘रिसेट: रिगैनिंग इंडियाज इकॉनोमिक लीगेसी’ में कहा है, ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पृष्ठभूमि पढाई-लिखाई वाली न होने की वजह से वे अपने दोस्तों और सलाहकारों पर निर्भर रहते हैं, जो उन्हें अर्थव्यवस्था का कडवा सच नहीं बताते हैं। वे लोग वही कहते हैं जो मोदी सुनना चाहते हैं।’’

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