प्रधानमंत्री जी ,
सम्पूर्ण देश के साथ मैं भी घर में दुबका हुआ कोरोना -व्याधि के खिलाफ जंग लड़ रहा हूँ . यह मेरा अनुशासन भी है और अपने प्रधानमंत्री के आवश्यक अनुदेशों का पालन भी ,जिसे एक नागरिक के तौर पर हर किसी को करना चाहिए . मैं पूरी तरह इस नतीजे पर हूँ कि इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है ,इस व्याधि से जूझने का . उम्मीद करता हूँ कि रोग पर काबू पाने में हम जल्दी ही सफल होंगे . यह भी उम्मीद है कि हमारे मुल्क और दुनिया के काबिल वैज्ञानिक जल्दी ही इसके उन्मूलन केलिए कोई कारगर दवा ढूँढ निकालेंगे .
  लेकिन यहीं पर आपसे कुछ बातें कहनी थी . कल यानि 24 मार्च को  जब आप मुल्क को सम्बोधित कर रहे थे ,तब आपने कहा कि 67 दिनों में इस व्याधि से एक लाख लोग ग्रसित हुए , अगले ग्यारह रोज में और एक लाख लोग हो गए ,उससे अगले केवल चार रोज में ही और एक लाख लोग हो गए . इन पंक्तियों के लिखे जाने तक WHO के मुताबिक  आक्रांत लोगों की संख्या चार लाख से ऊपर हो गयी है . मतलब पिछले चौबीस घंटों में ही और एक लाख लोग मरीज हो गए . बढ़ोत्तरी की दर बहुत खतरनाक है . यहीं आपसे पूछना चाहूंगा कि आपको तो सब पता था . WHO ने आपको ससमय सूचनाएँ दी होंगी . आपकी अपनी एजेंसियां काम कर रही हैं . इस जीवाणु- युद्ध से मुकाबिले में आप इतने पिछड़ कैसे गए ? अनेक देश जिसमे चीन सबसे आगे है ,ने चुस्ती दिखला कर इस व्याधि पर काबू पा लिया है . आपकी लापरवाही की सजा पूरा देश भुगत रहा है . जब आपको सूचनाएँ मिली तब आप कर क्या रहे थे ? आप तो मार्च के दूसरे हप्ते में जागे . तब तक पानी बहुत ऊपर आ चुका था . आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील की और उसे प्रहसन बनाने केलिए ताली और थाली पिटवाने की व्यवस्था भी कर दी . . आपके भक्तों ने तबियत से यह किया भी . आपने कहा कि यह डाक्टरों का हौसला बढ़ाने केलिए किया जा रहा था . प्रधानमंत्रीजी , किसे उल्लू बनाते हो आप ! आप खुद अपना मजाक उड़ा रहे हो . आपको जो समय मिला था ,उसमे आपको अपने अस्पतालों को चुस्त -दुरुस्त करना था . चीन में दस रोज में हज़ार बिस्तरों के अस्पताल बन जाते हैं . हमारे यहां भी महीना भर में कई अस्पताल  बन जाते . आपने ध्यान नहीं दिया . जिस वक़्त आप नागरिकता संशोधन कानून और राम मंदिर में देश भर को उलझाए हुए थे ,वही वक़्त इस बीमारी के फैलने का था . अलगाव  कैंप तो दर असल उन लोगों केलिए बनना चाहिए था ,जो विदेशों से  इस बीच लौट रहे थे . आपको सीमायें सील करनी थी और तमाम हवाईअड्डों पर सघन जांच कैंप बनवाने थे . कुछ हज़ार या लाख लोग विदेशों से लौटे होंगे . उन सबको यदि एक महीने सुरक्षित शिविरों  में रख कर ही बाहर आने की  अनुमति होती तो खतरा होता ही नहीं . क्योंकि यह बीमारी बाहर से आये हुए लोगों द्वारा ही फैली है . अब तक कोई मरीज ऐसा नहीं मिला है , जो भारत से बाहर  नहीं गया हो और जिसे यह बीमारी हुई हो .हाँ ,अब संभव है क्योंकि जीवाणु -संक्रमण हो चुका है .
लेकिन आप इस बीच राजनीति करते रहे . आज भी  आप वही कर रहे हैं . हवाई जहाज तब तक बंद नहीं किये गए जब तक आपका मध्यप्रदेश ऑपरेशन  हो नहीं गया . इसलिए कि आपको विधायकों की हवाई ढुलाई करवानी थी . डाक्टरों केलिए तालियां और घंटे बजा कर आप के लोग वैज्ञानिकों और चिकित्सकों  की हौसला -आफजाई नहीं  करा रहे थे ,वे मनोरंजन और एक भावी करवाई का जश्न मना  रहे थे . अगले रोज आपका फ़ौज -फाटा एक तरफ दिल्ली के  शाहीनबाग को उजाड़ कर उनके इश्तेहार मिटा रहा था तो दूसरी तरफ  आपके उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रामलला की मूर्तियां  ‘ वाजिब ‘ जगह पर रखवा  रहे थे . मध्यप्रदेश में राजतिलक का जश्न मनाने में कर्फ्यू बाधक नहीं बना ,लेकिन लाखों दिहाड़ी मजदूर और आमजन पुलिसिया ज़ुल्म केशिकार हुए . प्रधानमंत्रीजी हमने तो अपने को काबू में किया ,लेकिन आप तो दूध का शाइन -बोर्ड  लगाकर ताड़ी बेचते रहे . कौन है देशभक्त  और  कौन है देशद्रोही ? आप ही बताइये  .
  यह इक्कीस दिनों (यदि और लम्बा नहीं  खिंचा तो  ) का संकट बस आपके कारण है . ऐसा लगता है आप को खून का चस्का लग  चुका  है . कश्मीर को महीनों कैदखाने में बदलकर आपको लगा होगा ,पूरे देश  को एक दफा इस दशा में ले आओ . यह एक मनोदशा होती है . परपीड़न का सुख इसे ही कहते हैं . पूरे मुल्क को घरों में बंद कर आप रामलला की मूर्ती सजाने , शाहीनबाग के इश्तेहार मिटाने और मध्यप्रदेश में सरकार पलटने में लगे रहे . देश को लेकर यदि यही आपकी संजीदगी है तब किसी को कुछ कहने का कोई मतलब भी है क्या ?
प्रधानमंत्रीजी , आज के ज़माने में कोई देश -समाज वैज्ञानिक नजरिये और तकनीक के विस्तार से ही मजबूत होगा . रामजी और रहीमजी देश को मजबूत नहीं करेंगे . आपको लगता है ताली पीटने वाले लोग आपके मित्र  हैं और मेरे जैसे लोग शत्रु . आप ही कहते हो चाय बेचने वाले परिवार से आता हूँ . यदि यह सच है ,तो उनलोगों की पीड़ा समझो ,जो मिहनतक़श हैं ,दिहाड़ी मजदूर हैं ,किसान हैं . वे सब अपने मुल्क से अपनी माटी से प्यार करते हैं . आपकेलिए  ताली बजाने वाले लोग अपना स्वार्थ साधते हैं . आपको उल्लू बनाते हैं . इन साधु -जोगियों के कब्जे से बाहर आओ प्रधानमंत्रीजी . देश और दुनिया खतरे में है . मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में है . मतभेदों को भूल कर ,तंग नजरिये को त्याग कर हमे आगे बढ़ना होगा . पूरी दुनिया की  आर्थिक स्थिति चरमरा चुकी है . अपने देश की तो और भी . हमें समग्रता में सोच कर काम करना होगा .
भवदीय ,
प्रेमकुमार मणि

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