मंदी की ओर तेजी से बढती जा रही अर्थव्यवस्था को बचाने के उपायों की चर्चा आज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बहस है। भारत जैसे मुल्क के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां की बड़ी आबादी के पास कोई जमा पूंजी नहीं है जिसके सहारे वह अपना जीवन चला ले। अपने देश में सामाजिक सुरक्षा की भी इतनी ख्राब हालत है कि बेरोजगार और अशक्त लोगों को संभालना मुश्किल है। इसे हम किसानों की आत्महत्या से समझ सकते हैं। बैंक उन्हें कर्ज दे देता है, लेकिन उसके डूब जाने की हालत मे ंउसकी जान बचाने का कोई सामाजिक उपाय हमारे पास नहीं है।
विकल्प का अभाव सिर्फ खेती के क्षेत्र में नहीं है। पूरी अर्थव्यवस्था इस संकट से जूझ रही है। मौजूदा अर्थव्यवस्था के अपने उपाय फेल हो गए हैं। अर्थव्यवस्था को आगे चलाने के लिए जिस धक्के की जरूरत है, उसे लेकर काफी तीखे मतभेद हैं। सरकारी सोच में निवेश बढाने के लिए टैक्स में छूट तथा अन्य रियायतें महत्वपूर्ण हैं। इसके उलट, बाजार में खरीद करने वालों की जेब में पैसा डालने यानि उनकी खरीदने की ताकत बढाने को महत्वपूर्ण मानने वालों की बड़ी संख्या है। उनकी राय में बाजार में ज्यादा माल है और खरीददार नहीं है। वे मानते हैं कि निवेश बढाने से मामला हल नहीं होगा। मंदी का सबसे बुरा नतीजा बेरोजगारी के रूप में सामने आ रहा है। निवेश बढने से रोजगार बढने की संभावना कम ही है।
ऐसे में एक ऐसी सोच की ओर लोगों का ध्यान जाना जरूरी है जो बेरोजगारी की बीमारी से बचने का बात करती है। प्रसन्ना इसी की बात करते हैं। लंबे समय से ग्राम सेवा संघ के जरिए गांधी जी के सपनों का ग्राम स्वराज हासिल करने के काम में लगे रंगकर्मी रोजगार को ही प्रमुख मानते हैं और हस्तकला के सामान बनाने को प्रोत्साहित करना जरूरी मानते हैं। भारत समेत पूरी दुनिया जिस दिन महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रही थी और अहिंसा के मार्ग पर चलने की कसमें खा रही थीं, कर्नाटक के प्रसिद्ध रंगकर्मी प्रसन्ना गांधीवादी वाली अर्थव्यवस्था को लागू करने की मांग के लिए सत्याग्रह पर बैठ गए। उनके छह दिन के अनशन पर राष्ट्रीय मीडिया का ज्यादा ध्यान नहीं गया, लेकिन उनकी ओर से उठाए गए मुद्दों ने बेंगलुरू ही नहीं देश के कई सोचने-समझने वाले लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
प्रसन्ना का मानना है कि हम लगातार उस अर्थव्यवस्था की ओर बढ रहे हैं जो रोजगार छीनने का काम करती है। इस अर्थव्यवस्था के जरिए हम आर्थिक संकटों से नहीं लड़ सकते हैं। उनकी मांग है कि उन सामानों पर कोई टैक्स नहीं लगे जिनके उत्पादन के लिए 60 प्रतिशत श्रम और 40 प्रतिशत मशीन का उपयोग होता हो। इसे वह संयम की अर्थव्यवस्था या पवित्र अर्थव्यवस्था का नाम देते हैं क्योंकि यह पर्यावरण की सुरक्षा भी करता है। उनका नारा है कि ‘हमें रोजगार दो’, ‘हमें पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए काम दो’। वह प्रकृति को हरा-भरा रखने वाले रोजगार की मांग करते हैं।
पवित्र अर्थव्यवस्था का यह नारा हमारे लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह गांधी जी की उन परिचित अवधारणाओं से जुड़ा है जिसके क्रांतिकारी परिणामों से हम परिचित हैं। जब अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर डाला था और इसके पुनर्जीवन का कोई उपाय नहीं था तो स्वदेशी को खादी और चरखा के साथ जोड़ कर गांधी जी ने न भारतीयों को अंग्रेजों पर आश्रित जीवन से मुक्त कराया था। अपने श्रम और संसाधन पर जिंदा रहने की इसी कोशिश ने आजादी के आंदोलन को नई ताकत दी और हम आजाद हुए।
पवित्र अर्थव्यवस्था का मूल स्वर संरक्षण का है। ‘‘ पवित्र अर्थव्यवस्था हमारे यहां अभी भी जिंदा है। इसकी हत्या मत करो। कड़ी मेहनत, प्राकृतिक खेती, हाट में सब्जी बेचना जैसी चीजें अभी भी जिंदा हैं, इसकी हत्या मत करो। छोटे व्यापारियों, छोटे उत्पादकों और छोटा काम करने वालों को मारो। देसी दवाओं, देसी भाषाओं, आदिवासी, दलितों को मत मारो’’, प्रसन्ना कहते हैं।
वह असंगठित क्षेत्र के रोजगार की रक्षा की मांग करते हैं। वह गांव और शहरों के श्रमिकों तथा महिलाओं का रोजगार बचाने की मांग करते हैं।
लेकिन उनकी मांगें सूखी आर्थिक मांगें नहीं हैं। इन मांगों में प्रकृति और जीवन का दर्शन भी दिखाई देता है। प्रसन्ना थिएटर के मशहूर नाम रहे हैं। वह प्रकृति-विनाश को साहित्यिक अभिव्यक्ति देते हैं। वह कहते हैं, ‘‘ प्रकृति माता गुस्से में हैं। वनों की आग, नदियां, ग्लेशियर और मानसून गुस्से में हैं।…… अगर आप उनकी हत्या करोगे तो आप भी मारे जाओगे।’’
पवित्र अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने के लिए गांधी जी के ग्राम स्वराज्य की कल्पना को सामने रखा गया है। इसमें कहा गया है कि गांवों को आर्थिक रूप से स्वालंबी करना जरूरी है। वही रोजगार दे सकता है और वही अर्थव्यवस्था को बार-बार के संकट से उबार सकता है।
‘‘हमने पिछले तीन महीनों में सबसे ज्यादा रोजगार खोए हैं। कारपोरेट टैक्स माफ करना इसका हल नहीं है। हमें संयम की अर्थव्यवस्था की ओर बढना होगा, ’’ प्रसन्ना कहते हैं। हमारी मांग है कि खेती, हैंडलूम, हस्तकला, गारमेंट उद्योग, ठेला लगाने, छोटे दुकानदारों शिक्षण, प्रशिक्षण और नर्सिंग को टैक्समुक्त किया जाए क्योंकि ये रोजगार देते हैं,’’ ग्राम सेवा संघ के सत्याग्रहियों का कहना है।
वे ग्रेटा थनबर्ग की उक्ति दोहराते हैं, ‘‘आपने अपने खोखले आश्वासनों से हमारे सपने, हमारा बचपन और हमारी दुनिया छीन ली है।’’ सत्याग्रही कहते हैं जो प्रकृति-विनाश के जिम्मेदार हैं, वही रोजगार छीनने के लिए जिम्मेदार हैं।
विकास-दर, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और समृद्धि के रोज आ रहे नए मंत्रों के बीच गांधी जी के ग्राम स्वराज और संयम वाली पवित्र अर्थव्यवस्था की आवाज कितना असरकारी है,यह कहना मुश्किल है। लेकिन प्रकृति-विनाश के इस भयानक संकट में यह पवित्र अवश्य लगती है क्योंकि यह उन लोगों की बात करती है जो असंगठित हैं और समृद्धि के दायरे से बाहर हैं। विषमता, भुखमरी और पर्यावरण विनाश वाली अर्थव्यवस्था को बदलने का काम वे ही कर सकते हैं।
समाप्त

Comments