सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मायने में जरूर ऐतिहासिक है कि उस कानूनी विवाद के अंत की औपचारिक घोषणा हुई है जिसकी जड़ें उस काल तक जाती हैं जब हमने अंग्रेजों से अपनी आजादी की पहली जंग लड़ी थी। लेकिन क्या यह औपनिवेशिक शासन की ओर से बोए गए दुश्मनी के पेड़ पर कोई प्रहार कर पाया है?
भारत ही एक ऐसा देश है जहां धर्म के कठोर सिद्धांत भी लोगों को आपस में मिल-जुल कर रहने से कभी रोक नहीं पाए। एक दूसरे से घुल-मिल जाने की धारा इतनी ताकतवर रही है कि एक ही परिसर में मंदिर और मस्जिद के कई उदाहरण मिलते हैं। अयोध्या में भी अंग्रेजों के आने के पहले किसी विवाद का उल्लेख नहीं है। भारत की जनता कट्टरपंथियों की कोशिशों को फेल  करती रही है। इसी मुल्क में इस्लाम में आस्था रखने वाले कवियों ने कृष्ण और राम के भजन गाए हैं और हिंदू दरगाह पर मत्थे टेकते हैं। ऐसे मुल्क में हमलावर बाबर के कमांडर मीर बाकी की ओर से खड़ी की गई मस्जिद के साथ भगवान राम के पूजा-स्थल का होना कोई अचंभे की बात नहीं थी, भले ही उसने अपनी कट्टरपंथी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यह मस्जिद बनाई हो। एक-दूसरे को अपने-अपने पूजा-स्थलों तक पहुंचाने में वे एक-दूसरे की मदद करते ही आए हैं।
अयोध्या-फैसले को औपनिवेशिक भारत में पनपी सांप्रदायिक राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। भारत में हिंदुओं और मुसलमानों की अलग पहचान खड़ी करने तथा उन्हें एक अलग कौम बनाने की अंग्रेजों की साजिश के बारे में कौन नही जानता? किसे नहीं पता है कि अंग्रेजो ने इसके जरिए देश के दो टुकड़े करा दिए ? यह भी सभी को पता है कि अलग पहचान की बात करने वाले संगठनों, हिंदू महासभा-आरएसएस और मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों का साथ दिया। उन्हें आजादी की लड़ाई लड़ने वालों से ही दुश्मनी थी। पहचान की वही राजनीति अभी तक जारी है। अंग्रेजों के समय में यह राजनीति नवाबों-जमींदारों तथा पूंजीपतियों के लिए काम करती थी, आज यह अडानी-अंबानी तथा देशी-विदेशी कपंनियों के लिए काम करती है। मोदी सरकार के साढे-पांच सालों में हम देख चुके हैं कि किस तरह राजनीति हिंदुस्तान-पाकिस्तान, सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 और तीन तलाक के मुद्दों के इर्दगिर्द घूमती रही है और बेरोजगारी पिछले 45 सालों का रिकार्ड पार कर गई है। राम मंदिर का मुद्दा उसी राजनीति की तरकश का एक तीर है। सवाल उठता है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय ने इस जहरबुझे तीर को बेअसर किया है या उसके हाथ में एक और औजार थमा दिया है?
हमें इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि न्यायालय ने इतिहास को लेकर हिंदुत्व के नैरेटिव को खारिज किया है। उसने इस दावे को खारिज कर दिया है कि मीर बाकी ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई थी। कई लोग इसे एक संतुलन बनाने की कोशिश समझते हों कि उसने यह मानने से उसने इसे भी नहीं माना है कि मस्जिद किसी समतल स्थल पर खड़ी की गई थी। लेकिन यह पुरातत्व की एक सच्चाई है कि एक ही स्थल पर इतिहास की कई परतें दफन होती हैं।
न्यायालय ने 1949 में मस्जिद में मूर्ति रखने तथा 1992 में मस्जिद ढहाने को गैर-कानूनी करार दिया है। 1949 के अपराधी भाजपा-आरएसएस से जुड़े थे और 1992 में तो इसके दिग्गजों ने मस्जिद ढहाने के आपराधिक काम में हिस्सा लिया। लोकतंत्र और संविधान में उनकी आस्था कमजोर है, इसलिए इसे लेकर उन्हें कोई ग्लानि नहीं महसूस हो रही है और मस्जिद ढहाने के अपराधी नेता बयान भी दे रहे हैं। उन्हें इसके लिए तो राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए कि उन्होंने देश के कानून और संविधान की शपथ लेकर इसकी धज्जियां उड़ाई। सत्ता के सामने लेटा मीडिया इसे कोई मुददा ही नही मान रहा है। आज से कुछ साल पहले तक न्यायालय की एक प्रतिकूल टिप्पणी पार्टी या नेताओें को किस तरह परेशान कर देती थी, यह लोगों को याद होगा। किसी मीडिया वाले ने यह सवाल नहीं पूछा कि जिसे हिंदुत्ववादी शौर्य बताते रहे हैं उसे न्यायालय ने अपराध माना  है।
यह सच है कि कोई पक्का सबूत नहीं सौंपने पर भी विवादित जमीन हिंदुओं को सौंप दी गई। जाहिर है कि देश में हिंदुत्व के बढते असर से न्यायालय अपने को मुक्त नहीं कर पाया। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस दबाव में राजनीतिक पार्टियां भी हैं अन्यथा वे अयोध्या-फैसले पर असंतोष जरूर जाहिर करतीं।
अयोध्या-फैसले पर विचार करते समय हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि विवाद का हल निकालने में सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं तमाम सेकुलर जमात  फेल हुई है। इसे हम इसी से समझ सकते हैं कि मुसलमानों की ओर से जवाब देने के लिए ओवैसी जैसे नेता सामने हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की मदद करते आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सीमाओं के भीतर ऐसे मुद्दे का हल निकाला है जिसका हल राजनीति के जरिए होना था।  अगर राजनीति हल  देता तो न कोई मस्जिद गिरा पाता और न ही राममंदिर आंदोलन के जरिए साधु-महात्मा भजन-कीर्तन छोड़ कर संसद-विधान सभा में बैठे होते है और शासन चलाते। पिछड़ेपन और जहालत में नंबर वन उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री राज्य के विकास के बदले अयोध्या में लाखों दीप जलाने का काम करता है और कोई कुछ नहीं कर पाता। लोग इस पाखंड को सहते हैं।  अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट से ऐसे फैसले की उम्मीद करना गलत था कि वह ऐसा फैसला देता जो सांप्रदायिक राजनीति को रोक लेता।   यह जरूर है कि भारतीय लोकतंत्र पर धब्बे के रूप मौजूद बाबरी मस्जिद को ढहाने और दंगों में सैंकड़ों की जान लेने के दोषियों को सजा देकर ही देश की न्यायपालिका अपनी निष्पक्षता सिद्ध कर पाएगी। सुप्रीम कोर्ट को राममंदिर निर्माण के लिए बनाए जा रहे ट्रस्ट के गठन और कामकाज की मानिटरिंग करनी चाहिए ताकि इसमें दोषियों को जगह नहीं मिले और जनता के पैसे का दुरूपयोग न हो। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि मुसलमानों को पांच एकड़ जमीन सही जगह पर मिले।

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