बाबा रामदेव ने इस वर्ष दिए गए “भारत रत्न” सम्मानों पर सवाल खड़ा कर दिया है। कर्नाटक के नेताओं ने भी, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं, कर्नाटक के सन्त शिवकुमार स्वामी को ‘भारत रत्न” न दिए जाने पर अप्रसन्नता प्रकट की है। डॉ. लोहिया, के.एन. नारायणन, बीजू पटनायक और कांशीराम को नजरअंदाज किये जाने की भी विभिन्न क्षेत्रों में आलोचना हो रही है।

यह स्पष्ट है कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और गायक एवं संगीतकार भूपेन हजारिका को “भारत रत्न” सम्मान सिर्फ राजनीतिक कारणों से ही दिया गया है। भूपेन हजारिका पूर्व में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्राप्त कर चुके हैं और उन्हें इस बार मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ सम्मान देकर सम्मानित किया गया है। कला के क्षेत्र में उनके योगदान पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। वे ‘भारत रत्न’ सम्मान के लिये सर्वथा योग्य चयन हैं। लेकिन उन्हें इस वर्ष सम्मानित करने के पीछे के राजनीतिक निहितार्थों पर सवाल अवश्य उठाया जा सकता है।

केंद्र सरकार पिछले चार वर्षों में भी उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित कर सकती थी। भाजपा अगले आम चुनाव में प.बंगाल और असम में बढ़त चाहती है। मुखर्जी और हजारिका को ‘भारत रत्न’ सम्मान देने से इन दोनों राज्यों में उसे सफलता मिलने की आशा रही होगी! जबकि प्रणब मुखर्जी की तो भाजपा लम्बे समय तक आलोचना करती रही है और इमरजेंसी का समर्थन करने के कारण भी उनकी भूमिका निर्विवादित नहीं थी। अब भाजपा इमरजेंसी की निंदा कैसे करेगी, जबकि उसने इमरजेंसी लगाने वालों की अग्रिम पंक्ति के एक नेता को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित कर दिया है?

जहां तक नानाजी देशमुख का सवाल है, उन्हें ‘भारत रत्न’ सिर्फ इसीलिये दिया गया है कि वे संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भाजपा के संस्थापक नेताओं में से एक रहे हैं। उनका राष्ट्र और समाज के प्रति ऐसा कोई योगदान नहीं है कि वे ‘भारत रत्न’ के हकदार होते। नानाजी देशमुख ने जीवन पर्यंत सिर्फ संघ की आनुषंगिक संस्थाओं के विस्तार का ही कार्य किया था, जिसके पीछे उनका उद्देश्य एक विशेष ‘हिन्दुत्वववादी’ विचारधारा को मजबूती प्रदान करना था। यदि केंद्र में उसी ‘हिन्दुत्वववादी’ विचारधारा की सरकार नहीं होती तो नानाजी देशमुख के नाम पर शायद ही विचार किया जाता! यह तो वैसा ही हुआ जैसे कांग्रेस के सत्ता दौर में कई ऐसे लोगों को  ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया जिनके राष्ट्र के प्रति दिये गये योगदान पर प्रश्नचिन्ह लगाये जा सकते हैं।

कुल मिलाकर पद्म सम्मानों (पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और भारत रत्न) के लिये सभी सरकारें अपनी सुविधा से नामों का चयन करती रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अभी तक दिये गये सभी पद्म सम्मान विवादास्पद ही हों। अधिकांश पद्म सम्मान उन्हीं योग्य व्यक्तियों को मिले हैं, जिनका विभिन्न क्षेत्रों में अविस्मरणीय योगदान रहा है। लेकिन योग्य व्यक्तियों की आड़ में रेवड़ियां बांटने का काम भी खूब हुआ है।

आलोचना या निंदा भी तभी होती है जब अपनों को उपकृत किया जाता है और वास्तविक योग्य व्यक्ति पीछे छूट जाते हैं। इसलिये पद्म सम्मान चुनने वाली समिति के सदस्यों का चयन भी पूरी निष्पक्षता के साथ किसी ऐसी उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा किया जाना चाहिये जिसकी निष्पक्षता सभी संदेहों से परे हो

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