झाबुआ उपचुनाव से साबित हो गया कि भाजपा यहाँ कभी सीधे मुकाबले में कांग्रेस से चुनाव नहीं जीत सकती। दस महीने पहले भाजपा इसलिए जीती थी कि कांग्रेस के एक पूर्व विधायक जेवियर मेढा ने बगावत कर दी थी! इस उपचुनाव में जेवियर कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के साथ खड़े रहे! जबकि, भाजपा ने कृष्णमुरारी मोघे जैसे चुके और थके हुए नेता को चुनाव का दायित्व सौंपा! वे खुद बरसों से चुनाव नहीं जीत सके, तो बाहरी सीट पर कैसे चुनाव प्रबंधन करेंगे, ये समझा जा सकता है! संभागीय संगठन मंत्री जयपाल चावड़ा ने भी यहाँ स्थानीय स्तर पर गंभीरता नहीं दिखाई! इस उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के जो भी कारण खोजे जाएं, पर सच यही है कि झाबुआ के मतदाताओं को ये मंजूर नहीं था कि उनका प्रतिनिधि विपक्ष में बैठे! कांतिलाल भूरिया की जीत सिर्फ कांग्रेस उम्मीदवार की जीत नहीं है, बल्कि कमलनाथ सरकार के 10 महीने के कार्यकाल का मूल्यांकन भी है।
संयोग ही है पिछले लोकसभा चुनाव के बाद सांसद दिलीपसिंह भूरिया के निधन से झाबुआ सीट खाली हो गई थी! तब भी यहाँ उपचुनाव हुए थे और कॉंग्रेस के इन्हीं कांतिलाल भूरिया दर्ज की थी! उस उपचुनाव मे भी यही सब हुआ था। इस बार भी वही कहानी दोहराई गई। भाजपा के लिए परेशानी की बात ये रही कि पूरा दम लगाने के बाद भी मतदाताओं ने भाजपा के वादों पर भरोसा नहीं किया। बार-बार कमलनाथ सरकार गिराने और किसानों की कर्ज माफी न होने का विलाप करने के बावजूद भाजपा की दाल नहीं गली। जबकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह से लगाकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान तक ने अपना प्रभाव दिखाने की भरपूर कोशिश की! पर, खामोश मतदाताओं ने सबक सिखा दिया! वे जानते हैं कि धारा-370, पुलवामा हमला, पाकिस्तान और राष्ट्रवाद के सामने स्थानीय मुद्दे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा नेताओं ने मतदाताओं को ये दर्शाकर प्रभावित करने की भी कोशिश की, कि कमलनाथ सरकार कभी भी गिर सकती है! बेभरोसे के भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी को सामने लाकर भी अपनी बात को वजन देने के प्रयास किए गए! लेकिन, इस सबका आदिवासी मतदाता पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा! भाजपा के साथ परेशानी ये है कि वो आदिवासी मतदाताओं को अनपढ़ और नासमझ समझता है! जबकि, वास्तविकता ये है कि शहरी से ज्यादा आदिवासी मतदाता जागरूक है!
पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विक्रांत भूरिया को भाजपा उम्मीदवार गुमानसिंह डामोर ने करीब 10 हजार वोट से मात दी थी। लेकिन, उसके बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को झाबुआ लोकसभा सीट पर 90 हजार वोटों से हार के बावजूद झाबुआ विधानसभा सीट पर 7 हजार 298 वोटों की बढ़त मिली! यही कारण था कि डामोर के सांसद बनने के बाद खाली हुई झाबुआ विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया पर ही दांव खेला है। जबकि, भाजपा ने बेहद कमजोर भानु भूरिया को मैदान में उतारा। दोनों पार्टियों ने झाबुआ में इस बार जीत के लिए जितना दम लगाया, उतनी ताकत पहले कभी दिखाई नही दी।
भाजपा की करारी हार के पीछे कारणों को खोजा जाए तो कुछ कारण इतने स्पष्ट हैं कि यदि पार्टी उन बातों का ध्यान रखती तो नतीजे को बदला जा सकता था। पहला कारण है, गुमानसिंह डामोर को विधायक पद से इस्तीफ़ा दिलाना! यदि विधानसभा चुनाव में झाबुआ से भाजपा के टिकट पर डामोर जीत गए थे, तो उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया जाना था! स्थिति ऐसी भी नहीं थी कि भाजपा के पास सही उम्मीदवार का अकाल था! लेकिन, एक ही उम्मीदवार को दोनों चुनाव नहीं लड़वाए जाना थे! यदि ऐसा हुआ भी, तो उन्हें लोकसभा की सीट से इस्तीफ़ा दिलवाना था, न कि विधानसभा से! लोकसभा में तो भाजपा के पास प्रचंड बहुमत है, वहां एक सांसद कम भी हो जाता तो फर्क नहीं पड़ता, पर जहाँ विधानसभा में एक-एक विधायक का महत्व है, तो फिर ये रिस्क नहीं ली जाना थी! प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने से मतदाता का मानस उस पार्टी की तरफ झुकना स्वाभाविक है, वही हुआ भी!
दूसरा कारण है, भाजपा उम्मीदवारी के चयन में स्थानीय समीकरणों का ध्यान नहीं रखा गया। कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के सामने भाजपा ने बहुत कमजोर उम्मीदवार भानु भूरिया को मैदान में उतारा! जबकि, उससे कहीं बेहतर नेता मौजूद थे। भानु भूरिया और उनके पिता बालू भूरिया की छवि झाबुआ क्षेत्र में कैसी है, ये बात किसी से छुपी नहीं! ये जानते हुए भी उसे टिकट दिया गया! यही कारण था कि भाजपा उम्मीदवार अपने गाँव के सभी बूथ से भी जीत नहीं सके! ये भी सुनने में ये भी आया है कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं ने टिकट को लेकर खुले आम सौदेबाजी भी की थी! ऐसे में जिसने मांग पूरी कर दी, उसे टिकट दे दिया गया! इन नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं!
तीसरा कारण है, स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा! पिछले लोकसभा उपचुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार निर्मला भूरिया अनुकूल माहौल और सारे संसाधनों के मुहैया होने के बावजूद चुनाव हार गई थी! उस चुनाव के दौरान भी भाजपा के कई बड़े नेताओं और उनके मुंहलगे कार्यकर्ताओं ने झाबुआ को हाईजेक कर लिया था। इससे स्थानीय नेता और कार्यकर्ता उपेक्षित हो गए थे! वही सब इस बार भी हुआ! भाजपा के संभागीय संगठन मंत्री जयपाल चावड़ा ने पूरे विधानसभा क्षेत्र के हर सेक्टर का प्रभारी बाहरी कार्यकर्ता को बनाया! उन्होंने ही चुनाव की रणनीति बनाई और स्थानीय कार्यकर्ताओं निर्देश दिए, जो उन्हें रास नहीं आए! चुनावी सभाओं के मंच पर भी बाहरी लोगों का कब्ज़ा हुआ! पार्टी ने सोशल मीडिया के शौक़ीन कई कार्यकर्ताओं को इंदौर से झाबुआ भेज दिया, जिन्होंने कई ऐसी बातें उजागर कर दी, जो नहीं की जाना थी! इससे कांग्रेस को मौके पर अपनी रणनीति बदलने का मौका मिल गया!
चौथा कारण है, ऐसे स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जाना जिन्हें पार्टी का प्रदेश नेतृत्व उनके पदों से हटा चुका था! मनोहर सेठिया और शैलेश दुबे दोनों को भाजपा संगठन ने अध्यक्ष पद से हटाया था! ये दोनों ही नेता लम्बे समय से हाशिये पर थे, लेकिन चुनाव प्रबंधन करने वालों ने इन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी! ये भी एक कारण था कि स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हुए और उन्होंने बेमन से काम किया! कल्याणपुरा इलाका जिसे हमेशा से भाजपा का गढ़ माना जाता है, वो भी इस बार ढह गया! यदि भाजपा ये चुनाव स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के भरोसे लड़ती, तो संभव है कि नतीजा इसके उलट होता! हार का एक बड़ा कारण ये भी बताया जा रहा है कि हमेशा बूथ प्रबंधन चुनाव लड़ने वाली भाजपा ने यहाँ फलियों (आदिवासी गाँव में अलग-अलग बिखरे घर) पर फोकस किया! इससे भी कार्यकर्ता भ्रमित हुआ!
इस चुनाव में कांग्रेस की चुनावी रणनीति पूरी तरह कारगर रही! बाहर से आए कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने स्थानीय कार्यकर्ताओं से आगे निकलने की कोशिश नहीं की और न उनकी बातों को अनसुना किया। बल्कि, कुछ मामलों में भाजपा के कई स्थानीय पदाधिकारियों को भी कांग्रेस की रणनीति ने फंसा लिया। कांग्रेस ने व्यापारी प्रकोष्ठ की एक बैठक बुलाई थी, उसमें कई भाजपा पदाधिकारी भी आए और उन दानों को चुगा, जो डाले गए थे! इन सारे हालात देखकर कहा जा सकता है कि भाजपा को उसके ख़राब चुनाव प्रबंधन, नेताओं के बड़बोले बोल, अतिआत्मविश्वास और बाहर से झाबुआ पहुंचे नेताओं और कार्यकर्ताओं की मनमानी हरवाया!

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