केजरीवाल के मुकाबले मोदी मामूली बात नहीं

दिल्ली में भाजपा के चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने दावा किया है कि दिल्ली में भाजपा पूर्ण बहुमत हासिल करेगी। जानकार सूत्रों के मुताबिक पार्टी नेताओं से कहा गया है कि वे मीडिया के सामने या सोशल मीडिया में भी यह नहीं कहें कि दिल्ली में कांटे की टक्कर है या भाजपा पिछली बार से अच्छा प्रदर्शन करेगी। सबसे कहा गया है कि वे पूर्ण बहुमत का दावा करें। सवाल है कि यह दावा भाजपा की किस रणनीति का हिस्सा है? ध्यान रहे चुनाव की घोषणा होने के दिन एक पहले एबीपी न्यूज-सी वोटर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण जारी हुआ था। इस सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 59, भाजपा को आठ और कांग्रेस के तीन सीट मिलेगी। पर भाजपा के नेता पूर्ण बहुमत का दावा कर रहे हैं। यह आप के लिए चिता की बात होनी चाहिए। इसका मतलब है कि भाजपा की कोई न कोई ऐसी रणनीति है जो दिखाई नहीं दे रही है। साजिश की थ्योरी में विश्वास करने वालों का इशारा ईवीएम फिक्स होने ओर है तो जस्टिस मार्कण्डेय काटजू को अंदेशा है कि कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा हो सकता है। सोशल मीडिया में तो यह आशंका भी जताई रही है कि जम्मू कश्मीर में दो खूंखार आतंकवादियों के साथ पकड़ा गया डीएसपी देवेंदर सिह दिल्ली चुनाव से पहले दिल्ली में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने वाला था। जो भी हो सामान्य राजनीतिक समझ से तो दिल्ली में भाजपा जीतती नहीं दिख रही है पर मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल के मुकाबले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दांव पर लगाना भी मामूली बात नहीं है।

मंत्रियों के कामकाज का गोलमाल

पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार के मंत्रियों के कामकाज को लेकर कमाल का गोलमाल हो रहा है। जिस मंत्री को जो काम करना है उसे छोड़ कर वह बाकी दूसरे काम कर रहा है। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट से पहले उद्योगपतियों से चर्चा की और फिर देश के जाने माने अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक की। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी दोनों शामिल हुए, पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस बैठक से नदारद रहीं। इसी तरह जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ मारपीट का विवाद हुआ और पूरे देश में हंगामा मचा तो पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए। ऐसे ही जेएनयू में नकाबपोश गुंडों के हमले में घायल हुई लड़कियों का हालचाल जानने में महिला व बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कोई रूचि नहीं दिखाई पर लगातार दो दिन उन्होंने इस बात पर बयान दिया कि दीपिका पदुकोण जेएनयू में क्यों गई थीं। उन्होंने यह भी पूछा कि दीपिका बताएं कि उनका राजनीतिक रूझान क्या है। रेलवे के निजीकरण को लेकर पिछले कुछ दिन से विवाद चल रहा है पर रेल मंत्री पीयूष गोयल की जो हाल में खबर आई थी वह ये थी कि उन्होंने मुंबई में फिल्म जगत से जुड़ी हस्तियों को एक पांच सितारा होटल में इकट्ठा किया था और नागरिकता कानून पर उनका समर्थन हासिल करने का प्रयास किया। ऐसे ही कॉल ड्रॉप मंत्रालय के नाम से मशहूर संचार मंत्रालय के मंत्री रविशंकर प्रसाद संचार को छोड़ कर बाकी सभी मसलों पर बोलते हैं।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में सैन्य अधिकारी

लेफ्टिनेंट कर्नल युवराज मलिक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानी एनबीटी का नया निदेशक बनाया गया है। निदेशक का पद पिछले कुछ दिन से खाली था और कार्यकारी निदेशक से काम चलाया जा रहा था। अगस्त 2019 से पहले रीता चौधरी एनबीटी की निदेशक थीं। उनको साहित्य में योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका था। उन्हीं रीता चौधरी की जगह लेफ्टिनेंट कर्नल युवराज मलिक को निदेशक बनाया गया है। उनकी योग्यता यह है कि वे जम्मू कश्मीर के राजभवन से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मिशन में अफ्रीका तक काम कर चुके हैं। वे पंजाब, राजस्थान, सिक्किम में भी कई सैन्य अभियानों में रहे हैं। उनको सेना से प्रतिनियुक्ति पर एनबीटी में लाया गया है। पर यह हाल के दिनों में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली नियुक्ति है। आखिर क्या सरकार को साहित्य, कला, संस्कृति, लेखन, अध्यापन आदि से जुड़ा कोई व्यक्ति एनबीटी का निदेशक बनाने के लिए नहीं मिला? वैसे भी एनबीटी में पहले से ही सरकारी अधिकारियों खास कर मानव संसाधन विकास विभाग के अधिकारियों का वर्चस्व रहता है पर अब एक सैन्य अधिकारी की नियुक्ति नए सवाल खड़े कर रही है। यह सिविलियन पदों पर सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति के नए दौर की शुरुआत हो सकती है।

अब्दुल्ला परिवार राजनीति नहीं छोड़ने वाला

कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ी मुख्यमंत्री रह चुकी है। शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला तीनों मुख्यमंत्री रहे हैं। इसलिए सवाल है कि क्या नजरबंदी से रिहाई के लिए अब्दुल्ला परिवार राजनीति नहीं करने पर राजी होगा? बताया जा रहा है कि सरकार की ओर से यह शर्त रखी जा रही है कि अगर अब्दुल्ला परिवार राजनीति से किनारा करेगा तो उनको रिहा किया जा सकता है। असल में सरकार धीरे धीरे नजरबंदी में रखे गए लोगों को रिहा कर रही है। पिछले दिनों 26 लोगों के ऊपर से लोक सुरक्षा कानून (पीएसए) हटाया गया। फारूक और उमर अब्दुल्ला को भी अंदाजा है कि सरकार अब ज्यादा समय तक उनको नजरबंदी में नहीं रख सकती। इंटरनेट बहाल करने और पाबंदियों की समीक्षा करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनको रिहाई की उम्मीद बढ़ गई है। दूसरे, अगले कुछ दिनों में सरकार को चुनाव भी कराना ही है, इसलिए वे राजनीति छोड़ने की शर्त पर रिहाई की बात स्वीकार नहीं करने वाले हैं।

जगदीश कुमार की बलि अभी नहीं!

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के कुलपति एम जगदीश कुमार के पीछे आखिर किसकी ताकत है? ऐसा है क्या है, जिसकी वजह से यह धारणा बनी है कि चाहे कुछ भी हो जाए उनको कुलपति पद से नहीं हटाया जाएगा? उनके चक्कर में उच्च शिक्षा विभाग के दो दो सचिव बदल गए पर उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। भाजपा के बड़े और सम्मानित नेताओं में से एक डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने भी जगदीश कुमार को हटाने की मांग की है। इसके बावजूद कहा जा रहा है कि जगदीश कुमार न तो इस्तीफा देने वाले हैं और न उनको हटाया जाना है। बताया जा रहा है कि आईआईटी दिल्ली में रहते ही उन्होंने दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े तमाम ऐसे लोगों से संबंध रखे, जो वैचारिक रूप से उस लाइन पर सोचते हैं, जिस लाइन पर जगदीश कुमार जेएनयू को चला रहे हैं। इसमें संघ से जुड़े लोग और भाजपा के भी नेता हैं। बताया जा रहा है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं उसे सैद्धांतिक सहमति बहुत ऊपर से मिली हुई है। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि वे जो कर रहे हैं उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल रहा है। इसलिए अभी उनको हटाने का मतलब नहीं बनता है। हां, अगर वे बोझ बनने लगेंगे तब अलग बात है। तब उनकी बलि ली जा सकती है।

प्रियंका को मिली पहली जीत

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी को काम करते एक साल होने जा रहा है। पिछले साल अप्रैल-मई के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले प्रियंका को पार्टी का महासचिव बना कर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब उनके साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का काम देखने के लिए ज्योतिरादित्य सिधिया को नियुक्त किया गया था। पर प्रियंका और सिधिया की जोड़ी बुरी तरह से फ़ेल रही थी। प्रियंका की कमान के बावजूद राहुल गांधी अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव हार गए। इसके बावजूद प्रियंका ने हार नहीं मानी और वे उत्तर प्रदेश में मेहनत करती रहीं। लोकसभा चुनाव के बाद 11 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस कोई सीट नहीं जीत सकी। पर अब प्रियंका गांधी की कमान में कांग्रेस को पहली जीत मिली है। हालांकि यह कोई बड़ी जीत नहीं है पर मौजूदा हालात को देखते हुए इसका बड़ा मतलब निकाला जा रहा है। देश भर के विश्वविद्यालयों में चल रहे आंदोलन और युवाओं-छात्रों की नाराजगी की खबरों के बीच कांग्रेस पार्टी का छात्र संगठन वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का चुनाव जीत गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को हरा कर कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने सारी सीटों पर जीत दर्ज की है। इस जीत के एक दिन बाद ही प्रियंका वाराणसी के दौरे पर भी गईं। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है और जीत संस्कृत विश्वविद्यालय में मिली है।

चलते-चलते

न्यू इंडिया में देश के प्रधानमंत्री की इज्जत करने के लिए अदालत लोगों को निर्देशित कर रही है और खूंखार आतंकवादी पुलिस अधिकारियों के साथ उनकी ही गाडी में घूम रहे हैं। इससे अच्छे दिन और क्या आएंगे!

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