जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। लद्दाख को उससे अलग कर दिया गया है। इसके विरोध में कोई ठोस विचार या तर्क नहीं है। इसीलिए प्रतिपक्षी दलों के स्वर मे दम नहीं है। कांग्रेस की स्थिति पहले ही से दुबले ऊपर से दो आषाढ जैसी हो गई है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को सोनिया गांधी द्बारा जिस तरह से रोका और टोका गया, वह देशकाल परिस्थिति के अनुसार पार्टी में बदलाव नहीं लाने की दुष्परिणति है। ज्योतिरादित्य सिधिया, मिलिद देवड़ा आदि ने अपनी डूबती पार्टी से किनारा कर मोदी लहर में तैरने का कितना प्रयास किया है, यह तो आने वाला कल बतायेगा। लेकिन पार्टी का नुकसान अवश्य किया है। वे अपनी असहमति को पार्टी के अन्दर रखकर भी सही रणनीति बनवाने की दिशा मे प्रयास कर सकते थे।

एक देश में दो संविधान कैसे चल सकते है? कश्मीर मे कोई प्रापर्टी नहीं खरीद सकता है। कश्मीर की लड़की की शादी कश्मीर के बाहर होते ही उसकी नागरिकता और पैतृक संपत्ति में अधिकार खत्म हो जाता है। आजादी के बाद से ही ऐसी आवाजे उठ रही थी, जिनका कोई उत्तर नहीं था। प्रगतिशीलता की बात करने वाले समाजवादी-साम्यवादी नेताओं को यह कैसे समझ में नहीं आया? उनका नर-नारी समता और दलित पिछडों के आरक्षण का स्वर कहाँ खो गया था? कश्मीर में दलितों और पिछड़ो का जो आरक्षण अभी तक लागू नहीं था, वह अब शुरु हो गया है। सत्ता की राजनीति करते-करते कांग्रेस की राजनीतिक चेतना कितनी शून्य हो गई है कि वह लोकसभा में यह भी नहीं कह सकी कि जिन नेहरु पर आप लगातार दोषारोपण कर रहे वे आजादी की लड़ाई मे 11 साल 9 माह जेल में रहे थे। कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए ही उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35-ए प्रावधान संविधान में करवाए थे।

पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों असम, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल, नगालैंड, मिजोरम के अलावा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, तथा छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, झारखंड के आदिवासी इलाकों में भी कोई बाहरी व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकता। कश्मीर सहित इन सभी जगहों का इस तरह के कानून से विकास अवद्ध हुआ। रोटी रोजगार के अवसर बन ही नही पाए। यहां के रहवासी पहले से ही कमजोर थे और वंचित बन गए। कश्मीर को छोड़कर भारत के अन्य पहाडी राज्यों और आदिवासी इलाकों में बाहरी लोगों की घुसपैठ और जमीन की खरीदारी के नए रास्ते निकल गए जिससे इन क्षेत्रों में सर्व समावेशी विकास तो नहीं हुआ मगर वहां शुरू हुई विकास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार और वहां के स्थानीय लोगों के श्रम का शोषण खूब बढा।

देश को और खासतौर पर मोदी-शाह भक्तो का उनके द्बारा किए गए इस काम की तारीफ करने का हक है। उस पर खुश होने का, इतराने का भी हक है। लेकिन इसका अतिरेक और वह भी सांम्प्रदायिकता के चुभते हुए तीरो से करना देश को कमजोर करता है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर कश्मीरियों और खासकर कश्मीरी लडकियों को लेकर वाट्सएप यूनिवर्सिटी से निकले जो संदेश, फोटो, कार्टून आदि प्रसारित किए जा रहे हैं, वे किसी भी सभ्य व्यक्ति को शर्मसार ही करेंगे। इस तरह के लोग भारत के हर हिस्से में हैं और हर वर्ग मे है। ऐसे लोगो को कश्मीर का हर मुसलमान बुरा लगता है। ये अपने अतिरेक में सबको आतंकवादी कहते हैं।

कश्मीरी पंडित के साथ जो अन्याय हुआ वो एक दाग है। इसके बदले मे पिछले 20-25 वर्षों से हर कश्मीरी को गुनहगार बताया जा रहा है। मीडिया भी इसमें इस तरह शामिल है कि वह सर्वोच्च अदालत की तरह फैसले सुना रहा है। इनसे सवाल होना चाहिए कि 1984 में दिल्ली में तो एक ही रात में 3000 सिक्खों का कत्ल कर दिया गया था तो क्या पूरे दिल्ली शहर के लोगों को खूनी माना था? इन्दौर सहित उत्तर और पश्चिम भारत के कई शहरों में भी सैंकडों की संख्या में सिक्खों को जिंदा जलाकर मार दिया गया था और उनके मकानों-दुकानों में आग लगा दी गई थी। इन शहरों में रहने वाले कई सिक्ख परिवार बाद में पंजाब जाकर बस गए लेकिन इस आधार उन शहरों को ही वहशी नहीं माना जा सकता।

कश्मीर को सुर्ख और सांप्रदायिक नजरों से देखने वाले अक्सर प्रश्न करते हैं कि कश्मीर का मुख्यमंत्री सिर्फ मुसलमान ही क्यों बनता है? ऐसे लोगों से क्या यह प्रतिप्रश्न नहीं किया जाना चाहिए कि पंजाब के बंटवारे के बाद वहां का मुख्यमंत्री कब कोई गैर सिक्ख बन पाया? क्या महाराष्ट्र में कभी कोई गैर मराठीभाषी या दशकों से वहां रह रहा कोई उत्तर भारतीय या गुजराती मुख्यमंत्री बन सका है या बन सकता है? महाराष्ट्र में तो उत्तरप्रदेश और बिहार के कामगारों को शिवसेना के लोगों के कई बार खुलेआम पीटा है, उन्हें मुम्बई छोड़ कर जाने के लिए विवश किया है। राष्ट्र से बडा महाराष्ट्र बना दिया गया है। इसके बाद भी वह शिवसेना देशभक्त है, क्योंकि वह लंबे समय से भाजपा की सहयोगी है और सत्ता में साझेदार है।

कश्मीर में देश का हजारों करोड रुपए खर्चा हुआ है और हो रहा है, कश्मीर के नेताओं के परिवार कश्मीर के करोडों रुपए खा गए, इस तरह कि एक अलग ही ‘राष्ट्रीय धुन’ बजाई जाती है। यह सारी बातें बगैर किसी सिर-पैर के कही जाती है। सवाल है कि मध्य प्रदेश के झाबुआ, शहडोल, सरगुजा और झारखंड, छत्तीसगढ में जो पैसा आजादी के बाद से आ रहा है, वह कश्मीर से कम तो नही है, फिर उसे कौन खा गया? उन खाने वालों और उनके अन्याय के शिकार वंचित-शोषित आदिवासी पर इनकी नजर क्यों नहीं जाती? हकीकत मे कश्मीर का हो या झाबुआ का आम नागरिक तो चीथड़ो में लिपटा है और रोजी-रोटी से मोहताज है। शहरो मे आकर ये आदिवासी मजदूर बन गए है। सांप्रदायिक दिमाग अपने संकीर्ण सोच के कारण देशहित के नाम पर देश का कितना अहित करती है, इसे वह कब समझा जाएगा?

कश्मीर के नेताओं के बच्चे तो विदेशों में पढ़ते हैं, यह कहकर उनके प्रति पूरे देश मे नफरत का लावा तैयार किया जाता है। इस देश के बाकी नेताओं के बच्चे कहां पढ रहे हैं, जरा खोज करिए। आप पाएंगे कि भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी और संघ के नेताओं के बच्चे भी कश्मीरी नेताओं के बच्चों की तरह ही देश-विदेश के महंगे स्कूल-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढते मिल जाएंगे।

कश्मीर को धरती का स्वर्ग ऐसे ही नहीं कहा गया है। धरती पर उससे खूबसूरत कुछ भी नही है। स्वर्ग तो स्वीट्जरलैड भी है, लेकिन वहां की जनता सम्पन्न है। कश्मीर पूरी तरह विपन्न या मुफलिस है। वहां पर्यटन को उजाड़ा गया है। दूसरे धंधे-उद्योग भी वहां नहीं लग सके हैं। इस स्थिति के लिए धारा 370 और 35-ए भी बहुत बड़े कारण रहे है। भारत के राजनेताओं की, चाहे वे प्रगतिशील वामपंथी हो या दक्षिणपंथी पुरातनपंथी हो उनकी दृष्टि सिर्फ सत्ता तक सीमित रही है।

साल 2014 के आम चुनाव और उसके एक साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में कश्मीर की जनता ने 60 से 65 प्रतिशत तक मतदान कर भारत के संविधान में यकीन जताया था। पाकिस्तानी सेना की शह पर आतंकवादियों धमकी और बहिष्कार के आव्हान को ठुकरा कर अपने साहसी हौंसलों का प्रदर्शन करते हुए चुनाव में शिरकत की थी। भाजपा ने पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनके बाद उनकी बेटी महबूबा को मुख्यमंत्री मानकर उनके साथ चार साल तक गठबंधन सरकार चलाई थी। उस सरकार के साथ केंद्र में भी भाजपा की सरकार थी। दोनों सरकारों के रहते ही पिछले पांच वर्षों में कश्मीर के हालात बद से बदतर हुए हैं। इसलिए भाजपा सारा दोष महबूबा पर डालकर खुद को जिम्मेदारी से बरी नहीं कर सकती।

सच तो यह है कि कश्मीर के गुनहगार सभी थे और है। जो बेगुनाह है, वह तो वहां की जनता है, जो सजा पा रही है। देश उम्मीद करे और सपना देखे कि कश्मीर फिर धरती का स्वर्ग बने, उसके पहले आहत कश्मीर के जख्मों पर मलहम लगाना होगा। कश्मीरियों को गुनहगार न समझते हुए उन पर हुए जुल्म-अन्याय को समझना होगा। उनकी बदनसीबी और सेना की शहादत को सही अर्थों मे समझना होगा। तभी अलगाव और आतंकवाद खत्म होगा। आम लोगों और सेना के जवानों के असमय मरने का सिलसिला थमेगा, पर्यटन बढ़ेगा, जनता खुशहाल होगी और कश्मीर भारत का ही नही दुनिया का स्वर्ग बनेगा। जब जागो, तब सबेरा है, बशर्ते आंखे खोलने की नीयत हो।

 

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