उपचुनाव के लिए भाजपा को टीपू का आसरा!

कर्नाटक में अगले महीने 17 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होना हैं। इस सिलसिले में चुनावी माहौल बनने लगा है, मुद्दे उठने लगे हैं और सभी पार्टियों की तैयारियां शुरू हो गई हैं। कांग्रेस और जनता दल एस का गठबंधन टूट गया है और दोनों पार्टियां अलग अलग चुनाव लडने जा रही हैं। इसी बीच विधायको की तोड-फोड से जुडा मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का एक ऑडियो टेप सामने आया है, जिसे लेकर राज्य की राजनीति गरमाई है। इस बीच भाजपा ने अपना जो चुनावी एजेंडा जाहिर किया है उसके मुताबिक वह मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के चेहरे या राज्य और केंद्र सरकार के कामकाज की बजाय टीपू सुल्तान के सांप्रदायिक मुद्दे पर चुनाव लडेगी। चुनाव से ठीक पहले येदियुरप्पा ने ऐलान किया कि उनकी सरकार टीपू जयंती नही मनाएगी। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी ऐलान किया कि स्कूल, कॉलेजों की किताबों में से टीपू सुल्तान संबंधी सामग्री हटाई जाएगी। यानी सरकार इतिहास की किताबें बदलेगी। गौरतलब है कि भाजपा हमेशा टीपू सुल्तान को हिंदू विरोधी बता कर उनकी जयंती मनाने का विरोध करती रही हैं। चुनाव से पहले उसी विरोध को और तेज किया जाएगा।

महामहिम से परेशान ममता

गृह मंत्री अमित शाह के लिए पश्चिम बंगाल में बतौर राज्यपाल जगदीप धनखड का चयन सही साबित हुआ। शाह के भरोसे पर खरा उतरते हुए धनखड लगातार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। ममता उनसे खीझ रही हैं और उनका खीझना यह साबित करता है कि वे महामहिम से परेशान हैं। इससे पहले मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में शुमार किए जाने वाले पूर्व विधानसभा स्पीकर केशरीनाथ त्रिपाठी को राज्यपाल बनाया था। उस समय राजनाथ सिंह गृह मंत्री हुआ करते थे जो खुद भी उत्तर प्रदेश से हैं। केशरीनाथ त्रिपाठी को राजनाथ सिंह की ही पसंद का माना जाता था, लेकिन उनका कार्यकाल बहुत ही ठंडा-ठंडा रहा। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया कि ममता के साथ टकराव के हालात बने। बतौर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी उनसे ऐसी कोई अपेक्षा नहीं रखी थी। मोदी सरकार-2 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने पर केशरी की जगह राज्यपाल बनाए गए। अब वे शाह की अपेक्षा के अनुरू प काम कर रहे हैं। उनकी अति सक्रियता ने ‘दीदी’ का ब्लड प्रेशर बढा रखा है। गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष के रूप में अमित शाह को और क्या चाहिए!

पीयूष गोयल की खराब ग्रह-दशा

पता नहीं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के ग्रह-नक्षत्रों की चाल बिगडी हुई है या ज्यादा बोलने की बीमारी उन पर भारी पड रही है! आजकल से वे जिस भी मामले में बोल रहे हैं, अपना मजाक बनवा रहे हैं। ताजा मामला क्षेत्रीय समग्र आर्थिक संधि यानी आरसीईपी का है। प्रधानमंत्री मोदी इस संधि पर हस्ताक्षर के लिए जब बैंकॉक जा रहे थे, तब वाणिज्य मंत्री की हैसियत से गोयल ने इस संधि का बचाव करते हुए इसे भारत के हित में बताया था। उन्होंने इसका विरोध करने के लिए कांग्रेस पर जमकर हमला किया। मगर गोयल की यह कवायद बेकार साबित हुई। प्रधानमंत्री ने इस संधि को भारत के हित में नहीं बताते हुए इस पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। इस वाकये के कुछ दिनों पहले गोयल ने नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी को वामपंथी बताकर उनकी खिल्ली उडाई थी। लेकिन दो दिन बाद जब बनर्जी की प्रधानमंत्री मोदी से हुई तो मोदी ने उनकी जमकर तारीफ की। इससे भी पहले गोयल ने एक प्रेस कांफ्रेन्स में आर्थिक मंदी पर बोलते हुए लोगों को नसीहत दी थी कि वे गणित के चक्कर में न पडे, अगर आइंस्टीन गणित के चक्कर में पडे होते तो गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज नहीं कर पाते। न्यूटन की खोज को आइंस्टीन के नाम कर देने वाले इस बयान पर भी उनकी खूब फजीहत हुई थी। कहने वाले कह रहे हैं कि उम्मीद के मुताबिक वित्त मंत्रालय न मिल पाने की वजह से ही गोयल की गाडी पटरी से उतर गई है।

चुनाव आयुक्त लवासा का क्या होगा?

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा को कुछ न कुछ सजा तो जरूर मिलेगी! लोकसभा के चुनाव के समय उन्होंने आचार संहिता के उल्लंघन के हर मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देने के कारण पूछे थे और अपनी असहमति आधिकारिक रूप से दर्ज करने की अपील की थी। लेह की कलेक्टर उनकी बेटी अन्वी लवासा ने भी मतदान के समय कुछ भाजपा नेताओं की गडबडियां पकडी थी और कार्रवाई भी की थी। इसीलिए चुनाव खत्म होते ही अशोक लवासा के लिए मुश्किलें पैदा होने लगीं। पिछले दिनों उनके परिवार के कई सदस्यों को आय कर विभाग के नोटिस मिले थे। अब खबर है कि सरकार अशोक लवासा की जांच करा रही है। लवासा 2007 से लेकर 2013 तक ऊर्जा मंत्रालय में रहे थे। उस दौरान की फाइलें खंगाली जा रही हैं। गौरतलब है कि लवासा की पत्नी कई कंपनियों में सलाहकार की हैसियत से काम करती हैं। बताया जा रहा है कि ऊर्जा और नवीनीकृत ऊर्जा के एक सौ से ज्यादा ठेके दिए जाने की बारीकी से जांच करने को कहा गया है। अब जब सरकार इतने पुराने मामले खुलवा कर जांच करा रही है तो सरकार कुछ न कुछ तो निकाल ही लेगी। तब लवासा का क्या होगा? अभी तो वे संवैधानिक पद पर हैं लेकिन यह भी संभव है कि उनको समय से पहले हटना पडे।

मोदी की मंत्रिपरिषद में कई चेहरे बदलेंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निकट भविष्य में अपनी मंत्रिपरिषद में फेरबदल करने वाले हैं। इस फेरबदल में सिर्फ भाजपा के चेहरे ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि उसके सहयोगी दलों के चेहरों में भी फेरबदल होगा। अभी तक वंचित रहे सहयोगी दलों को भी सरकार में जगह मिलेगी। बिहार में भाजपा का सहयोगी जनता दल (यू) पहली बार मोदी सरकार में शामिल होगा। चर्चा यह भी है कि लोक जनशक्ति पार्टी की ओर से भी सरकार में नया चेहरा शामिल होगा। सेहत के आधार पर रामविलास पासवान सरकार से रिटायर हो सकते हैं। उनकी जगह उनके बेटे चिराग पासवान को मंत्री बनाया जा सकता है। इस बदलाव से पहले चिराग पासवान को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया है। असल में पासवान पहले ही चिराग को मंत्री बनाना चाहते थे पर उनको लग रहा था कि शायद प्रधानमंत्री उनको कैबिनेट मंत्री नहीं बनाएंगे। अब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष हो जाने के बाद संभव है कि वे कैबिनेट मंत्री बन जाएं। पिछली बार केंद्र सरकार में मंत्री रही अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल भी इस बार मंत्री नहीं बन पाई हैं। संभव है कि अगली फेरबदल में उनको भी सरकार में जगह मिले। अगर शिवसेना के साथ जारी भाजपा की खटपट खत्म हो जाती है तो उसे भी अतिरिक्त मंत्री पद मिल सकता है।

नक्शे मे पाक, चीन के कब्जे वाला इलाका भी

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जो हिस्से लंबे समय से पाकिस्तान और चीन के कब्जे में हैं, उन्हें फिर से हासिल कर लेना फिलहाल तो संभव नहीं लगता, मगर भारत सरकार ने अभी उन हिस्सों को नक्शे में तो शामिल कर ही लिया। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में दो अलग केंद्र शासित राज्य बनने के बाद भारत सरकार ने इन दोनों राज्यों का जो नया नक्शा जारी किया है, उसमें केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के कब्जे वाले मुजफ्फराबाद को भी भारत का क्षेत्र दिखाया गया है। इसी तरह केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के नक्शे में चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन के इलाके को भी दिखाया है। इसके लेह जिले की सीमा गिलगित और अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित वकहान कॉरीडोर तक है। इस नक्शे के मुताबिक अब लद्दाख देश का सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। हालांकि आबादी के लिहाज से लद्दाख सबसे पीछे होगा पर क्षेत्रफल के लिहाज से यह सबसे बडा केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। गौरतलब है कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत सरकार के फैसले को लेकर चीन ने आपत्ति की है पर भारत ने उसे खारिज कर दिया है। इस नए नक्शे पर भी चीन की ओर से आपत्ति तो उठेगी ही।

चलते-चलते

हर साल दीपावली पर पटाखों का जश्न पूरा होने के बाद दिल्ली वालों को हवा खराब होने की चिंता सताने लगती है। पंजाब के किसानों को कोसते हुए कहा जाता है कि उनके खेतों में पराली जलाने से धुंआ दिल्ली में आता है। ऐसी दलील देने में सरकार भी पीछे नहीं रहती। सोशल मीडिया पर सवाल पूछा जा रहा है कि आधे से ज्यादा पंजाब तो पाकिस्तान में है, लिहाजा वहां तो हालात और ज्यादा खराब होने चाहिए! उधर पाकिस्तान कह रहा है कि हमारे यहां तो ऐसी कोई समस्या नहीं है, तुम्हारी तुम जानो।

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