संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह कतई जरुरी नहीं कि चुनाव में हमेशा ही किसी न किसी पार्टी को बहुमत हासिल हो। कई बार अल्पमत की सरकारें भी बाहरी समर्थन से चलती है और मिली-जुली सरकारें भी बनती हैं। कई बार तो अल्पमत वाली या मिली-जुली सरकारें कामकाज के लिहाज से पूर्ण बहुमत वाली सरकारों से भी बेहतर साबित होती है। वैसे किसी भी चुनाव के नतीजों में जब त्रिशंकु सदन की स्थिति उभरती है और मिली-जुली सरकारें बनती हैं तो राजनीतिक स्थिरता पैदा होने का अंदेशा भी हमेशा बना रहता है। ऐसी स्थिति में सरकार चलाना राजनीतिक प्रबंधन और चतुराई पर निर्भर करता है।

लेकिन ऐसी सरकारों को बनाने, बचाने और गिराने के खेल में अक्सर राजनीति अपने निकृष्टतम रूप में सामने आती है। ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सदन भंग होने या राष्ट्रपति शासन लागू होने तक जारी रहती है। ऐसा कई बार हुआ है और अभी भी हो रहा है। इस समय देश के कई राज्यों में मिली-जुली सरकारें चल रही है, जिन पर अस्थिरता की तलवार लटक रही है। मध्य प्रदेश भी ऐसे राज्यों में शुमार हैं, जहां कांग्रेस की सरकार कुछ छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है, और जिसे गिराने की कोशिशों में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा शुरू दिन से जुटी हुई है और इस समय उसने अपनी कवायदें तेज कर दी हैं।

एक फिल्मी गीत की तर्ज पर कहा जाए तो मध्य प्रदेश में ‘यह तो होना ही था!’ लगातार 15 सालों तक सत्ता में रही भाजपा की ओर से जिस तरह पांच महीने पुरानी कांग्रेस की सरकार के अल्पमत में होने दावा करते हुए उसकी विदाई का गीत गुनगुनाया जा रहा है, वह जरा भी हैरान करने वाला नहीं है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने में अभी दो दिन का वक्त बाकी है लेकिन एग्जिट पोल्स के अनुमानों को ही वास्तविक नतीजे मानकर चल रही भाजपा एक बार फिर कांग्रेस सरकार के अल्पमत में होने का दावा करते हुए राज्यपाल से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने और मुख्यमंत्री को अपना बहुमत साबित करने का निर्देश देने की मांग कर रही है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा की इस मांग की खिल्ली उडाते हुए कहा है कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है और भाजपा नेताओं को किसी भी तरह के सपने देखने का हक है।

दरअसल, मध्य प्रदेश की पांच महीने पुरानी कांग्रेस सरकार पर खतरे के बादल उसी दिन से मंडराना शुरू हो गए थे, जिस दिन कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 114 सीटें हासिल हुई थीं जो बहुमत के आंकडे से दो कम थी। दूसरी ओर भाजपा को 109 सीटें मिली थीं। चुनाव नतीजे आते ही बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और चार निर्दलीय विधायकों ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया था। इस प्रकार कांग्रेस कुल 121 विधायकों के समर्थन के बूते सरकार बनाने में कामयाब रही थी।

ऐसा नहीं है कि भाजपा ने अपना बहुमत न होते हुए भी उस वक्त सरकार बनाने की कोशिश न की हो। उसकी ओर से न सिर्फ निर्दलीय विधायकों को साधने की कोशिशें की गई थीं बल्कि कांग्रेस के भी कुछ विधायकों से संपर्क किया गया था। योजना यह थी कि निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल कर और कांग्रेस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा कर विधानसभा की कुल प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर अपने बहुमत का इंतजाम कर लिया जाए। उस समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भोपाल यात्रा को भी इसी सिलसिले में देखा गया था। लेकिन भाजपा के रणनीतिकार अपनी किसी भी हिकमत को अमली जामा नहीं पहना सके थे।

प्रदेश में अपनी सरकार बनाने की योजना में नाकाम रहने के बाद भी भाजपा नेता चुप नहीं बैठे। चार महीने पहले जनवरी में जब कर्नाटक में चल रही जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस की साझा सरकार को गिराने की कवायदें जोरों पर थीं, उस वक्त भी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था- ‘जिस दिन भी बॉस का इशारा मिल जाएगा, हम एक सप्ताह में सरकार गिरा देंगे।’

प्रदेश में ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के तहत भी विजयवर्गीय का बयान आया है कि कमलनाथ सरकार की उम्र अब ज्यादा लंबी नहीं बची है और वह 22 दिन भी नहीं रह पाएगी। उनका यह बयान मुख्यमंत्री कमलनाथ के उस बयान के जवाब में आया है, जिसमें कमलनाथ ने राज्य की 29 में से 22 लोकसभा सीटें जीतने का दावा किया है। यही नहीं, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने तो विजयवर्गीय से भी एक कदम आगे बढते हुए दावा किया है कि कई कांग्रेसी अन्य विधायक हमारे संपर्क में हैं और हम जब चाहेंगे, तब सरकार गिरा देंगे।

सरकार के बहुमत का परीक्षण करने के लिए विधानसभा का सत्र बुलाने की मांग करते हुए राज्यपाल को पत्र लिख चुके नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने तो और भी साफ शब्दों में कहा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने और केंद्र में दोबारा भाजपा की सरकार बनते ही कमलनाथ सरकार की विदाई हो जाएगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि भाजपा नेताओं के इन सारे बयानों को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सहमति प्राप्त है। क्योंकि खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी एक से अधिक बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक की सरकारें किसी भी दिन गिर जाएगी।

बहरहाल, भाजपा नेताओं के ताजा गतिविधियों और बयानों को लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ बेफिक्र हैं। उनका कहना है वे पांच महीने के भीतर दो मौकों पर विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर चुके हैं और नियम तथा प्रक्रिया के तहत आगे जब भी जरुरत होगी, वे अपना बहुमत साबित कर देंगे। कमलनाथ के इस आत्मविश्वास भरे बयान को थोडा स्पष्ट स्वर देते हुए राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी का कहना है कि जहां भाजपा की सोच खत्म होती है, वहां से कमलनाथ की सोच शुरू होती है, लिहाजा भाजपा नेता किसी तरह की गलतफहमी में न रहें।

दरअसल, कमलनाथ सरकार को गिराने की जिस योजना पर भाजपा नेता काम कर रहे हैं, उसी से मिलती-जुलती योजना के तहत अपनी सरकार को बचाए रखने की तैयारी कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पहले ही कर चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक करीब भाजपा के करीब 7-8 विधायक दोनों नेताओं के संपर्क में हैं, जो मौका आने पर विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का खेल बिगाड सकते हैं। इसके अलावा कमलनाथ ने भाजपा सरकार के दौरान हुए कुछ ऐसे कथित घोटालों की जांच की तैयारी भी कर रखी है, जो सीधे-सीधे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों से संबंधित हैं।

बहरहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी पार्टी के अन्य नेता और मंत्री अपनी सरकार को लेकर चाहे जितना आश्वस्त हों, मगर 23 मई को चुनाव नतीजे अगर एग्जिट पोल्स के अनुमानों के मुताबिक आए तो उनकी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल और ज्यादा गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में मणिपुर और गोवा की मिसाले याद रखी जाना चाहिए। इन दोनों राज्यों में भाजपा नीत सरकार बनाने के लिए जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों और मान्य परंपराओं की अनदेखी देखी हुई, विधायकों की कथित तौर पर खरीद-फरोख्त की गई और राज्यपालों ने जिस तरह की भूमिका निभाई, उस सबको देखते हुए कुछ भी होना मुमकिन है।

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