दुनिया में सबसे अधिक उदास हैं हिन्दुस्तानी लोग। वे उदास हैं, क्योंकि वे ही सबसे ज्यादा गरीब और बीमार भी हैं। परन्तु उतना ही बड़ा एक और कारण यह भी है कि उनकी प्रकृति में एक विचित्र झुकाव आ गया है, ख़ास करके उनके इधर के इतिहासकाल में बात तो निर्लिप्तता के दर्शन की करते हैं जो तर्क में और विशेषतः अंतर्दृष्टि में निर्मल है, पर व्यवहार में वे भद्दे ढंग से लिप्त रहते हैं। उन्हें प्राणों का इतना मोह है कि किसी बड़े प्रयत्न करने की जोखिम उठाने के बजाय वे दरिद्रता के निम्नतम स्तर पर जीना ही पसंद करते हैं, और उनके पैसे और सता के लालच का क्या कहना कि दुनिया के और कोई लोग उस लालच का इतना बड़ा प्रदर्शन नहीं करते।

आत्मा के इस पतन के लिए, मुझे यकीन है, जाति और औरत के दोनों कटघरे मुख्यतः जिम्मेदार हैं। इन कटघरों में इतनी शक्ति है कि साहसिकता और आनंद की समूची क्षमता को ये ख़त्म कर देते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि आधुनिक अर्थतंत्र के द्वारा गरीबी मिटाने के साथ ही साथ ये कटघरे अपने-आप ख़त्म हो जायेंगे, बड़ी भारी भूल करते हैं। गरीबी और ये दो कटघरे एक-दुसरे के कीटाणुओं पर पनपते हैं। जब तक, साथ ही साथ, इन दो कटघरों को ख़त्म करने का सचेत और निरंतर प्रयत्न नहीं किया जाता तब तक गरीबी मिटाने का प्रयत्न छल-कपट है।

भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति ने पुण्य नगरी बनारस में सार्वजनिक रूप से दो सौ ब्राह्मणों के पैर धोए। सार्वजनिक रूप से किसी के पैर धोना अश्लीलता है, इस अश्लील काम को ब्राह्मण जाती तक सीमित करना दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए, इसे विशेषाधिकार प्राप्त जाती में अधिकांशतः ऐसों को सम्मिलित करना जिनमें न योग्यता हो न ही चरित्र, विवेक-बुद्धि का पूरा परित्याग है, जो कि जाति-प्रथा और पागलपन का अवश्यंभावी अंग है। राष्ट्रपति इस अश्लीलता का प्रदर्शन कर सके, यह मुझ जैसे लोगों पर बड़ा अभियोग है जो कि सिर्फ नपुंसक गुस्से में ही उबल सकते हैं।

मैं यह बतला दूँ कि इस घिनौने काम का पूरा किस्सा मुझे एक ब्राह्मण ने ही बतलाया। उसे उन दो सौ में सम्मिलित किया गया था। वही अकेला था जो अपने देश के राष्ट्रपति द्वारा पैर धुलवाने के नीच कर्म का अपराधी बनने के पहले ही येन मौके पर ग्लानी से भरकर अलग हो गया। उसकी जगह फ़ौरन ही दुसरे आदमी को दे दी गई। संस्कृत के इस गरीब अध्यापक को मैं हमेशा श्रद्धा से याद रखूँगा। इस भयंकर राक्षसी नाटक में वही तो एक मात्र मनुष्य था। ऐसे ही नर और नारियां, जो हालाँकि जन्म से ब्राह्मण हैं, दक्षिण के विकृत ब्राह्मण विरोध से समूचे देश को डूबने से बचा रहे हैं।

बनारस और दूसरी जगहों के ऐसे ब्राह्मणों को मैं चेतावनी देना चाहता हूँ, जो मानवी आत्मा और भारतीय गणतंत्र के इस पतन से फुले नहीं समाते। बुरे कर्मों और उनमें मजे लुटने से पलटकर थप्पड़ लगती है। इस आधार पर कि कोई ब्राह्मण है, उसके पैर धोने का मतलब होता है जाति-प्रथा, गरीबी और दुःख-दर्द को बनाये रखने कि गरंटी करना। वह आत्मा, जिससे कि ऐसे बुरे कर्म उपजते हैं, कभी भी न तो देश के कल्याण की योजना बना सकती हैं न ही ख़ुशी से जोखिम उठा सकती है। वह हमेशा लाखों-करोड़ों को दबे और पिछड़े बनाए रखेगी। जितना वह उन्हें आध्यात्मिक समानता से वंचित रखती है, उतना ही वह उन्हें सामाजिक और आर्थिक समानता से वंचित रखेगी।

वह देश की खेती या कारखाने नहीं सुधार सकती, क्योंकि वह कूड़े के ढेर और गंदे तालाबों की मामी-मौसी है, जहाँ कीड़े और मच्छर पैदा होते हैं, भले ही वह ऊँची जाति के बड़े लोगों के घरों के चारों तरफ ‘डी.डी.टी’ का इस्तेमाल करे। खटमल, मच्छर, अकाल और सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धोना एक-दुसरे के पोषक हैं। वे मन में भी एक प्रकार के व्यभिचार का पोषण करते हैं, विचार-क्षेत्र में एक प्रकार का अंतर्जन होता है, क्योंकि अलग-अलग धंधों में लगे और विभिन्न स्तरों पर जन्में लोगों के बीच खुलकर बातचीत करने की बात ख़त्म हो जाती है। उस देश में जिसका राष्ट्रपति ब्राह्मणों के पैर धोता है, एक भयंकर उदासी छा जाती है, क्योंकि वहां कोई नवीनता नहीं होती, पुजारिन और मोची, अध्यापक और धोबिन के बीच खुलकर बातचीत नहीं हो पाती है।

कोई अपने राष्ट्रपति से मतभेद रख सकता है या उसके तरीकों को विचित्र समझ सकता है, पर वह उनका सम्मान करना चाहेगा, पर इस तरह के सम्मान का अधिकारी बनने के लिए राष्ट्रपति को सभ्य आचरण के मूलभूत नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। नर और नारी के बीच सामाजिक संबंधों के बारे में राष्ट्रपति के विचारों पर एक अप्रकाशित आलोचना लिखने का इससे पहले भी मुझे अवसर मिला था, किन्तु तब वे पूरी तौर पर मेरे आदर से वंचित नहीं हुए थे। भाई भाई को मारने वाले इस अकाट्य काम से वे अब मेरे आदर से वंचित हो गए हैं, क्योंकि जिसके हाथ सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धो सकते हैं, उसके पैर शुद्र और हरिजन को ठोकर भी तो मार सकते हैं। श्री राजेंद्र प्रसाद भले ही आज इसकी चिंता न करें कि मेरे जैसे लोगों का उन्हें आदर प्राप्त है या नहीं, क्योंकि अगर समाजवाद और जनतंत्र तक आज हिन्दुस्तान में इतना नपुंसक न होता जितना कि है, तो बनारस के युवजन अपने समूचे अस्तित्व में इस चोट से तड़प उठते और इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करते कि ऐसी अश्लीलता करना असंभव हो जाता।

राष्ट्रपति के सार्वजनिक रूप से इस तरह अपने-आप को गिरने की इजाजत देने के लिए मैं प्रधानमन्त्री और उनकी सरकार को दोषी नहीं ठहराऊंगा।  उन पर तो मेरा आरोप और भी बड़ा है। वह आदमी, जो जाती-प्रथा की समस्या पर अपनी छाप चालाकी से छिपा सकता है, वह और अधिक घातक है। यह बात तो लिखी हुई मौजूद है कि पंडित नेहरु ने ‘ब्राह्मणों की सेवा-भावना’ की तारीफ़ की है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जो कुछ अपने काम से करना चाहते हैं पंडित नेहरु उसे कुछ न करके हासिल कर लेते हैं। एक बहुत ही मामूली कसौटी पर उसे परखा जा सकता है। जिस दिन प्रशासन और फौज में भर्ती के लिए, और बातों के साथ-साथ, शुद्र और द्विज के बीच विवाह को योग्यता और सहभोज के लिए इंकार करने पर अयोग्यता मानी जायेगी, उस दिन जाति पर सही मायने में हमला शुरू होगा। वह दिन अभी आना है। मैं यह साफ़ कर दूँ कि शुद्र और द्विज के बीच विवाह को बनिए और ब्राह्मण इत्यादि के बीच विवाह नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि ऐसे विवाह काफी आसानी से हो जाते हैं और जाति-प्रथा के अंग ही हैं। नागरिक अधिकारों के ऐसे हनन पर पवित्र विरोध का झूठा हल्ला मचाया जा सकता है, जैसे कि पैदायशी समूहों से आदमी को चुनने के इस गंदे रिवाज से नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होता। सरकारी नौकरी के लिए अंतर्विवाह को एक योग्यता बनाने का मजाक भी उड़ाया जा सकता है।

अपनी सुरक्षा और एकता के लिए प्रयत्न करने का और उस भयंकर उदासी को, जिनमें नवीनता रह ही नहीं गई है, दूर करने का अधिकार प्रत्येक राज्य को है। यहाँ आदमी से औरत के अलगाव की बात आ गई। जाति और योनि के ये दो कटघरे परस्पर सम्बंधित हैं और एक-दुसरे को पालते-पोसते हैं। बातचीत और जीवन में से सारी ताजगी ख़त्म हो जाती है और प्राणवान रस-संचार खुलकर नहीं होता। कॉफ़ी हाउस में बैठकर बातें करने वालों में एक दिन मैं भी बैठा था जब किसी ने कहा कि कॉफ़ी के प्यालों पर होने वाली ऐसी बातचीत ने ही फ्रांस की क्रांति को जन्म दिया था। मैं गुस्से में उबल पड़ा। हमारे बीच एक भी शुद्र नहीं था। हमारे बीच एक भी औरत न थी। हम सब ढीले-ढाले, चुके हुए और निस्तेज लोग थे, कल के खाए चारे की जुगाली करते हुए ढोर की तरह।

इस व्याख्यान का शेष भाग कल

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