जहां-जहां प्रचार किया मोदी ने…!

यह दिलचस्प खबर है और अरसे बाद आई है। इससे पहले मीडिया में खबरें आती थीं कि राहुल गांधी ने जहां-जहां प्रचार किया, वहां-वहां कांग्रेस हार गई। ठीक इसके समानांतर खबर यह भी आती थी कि जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रैली की वहां भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी जीती। मगर इस बार महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजों में तस्वीर पलट गई। दोनों सूबों में राहुल गांधी ने तो बहुत कम सभाएं कीं, लिहाजा उनका विश्लेषण नहीं हुआ, मगर जहां-जहां मोदी की सभाएं हुईं उनमें से ज्यादातर जगहों पर भाजपा हार गई। उन्होंने हरियाणा में जिन सात इलाकों में सात रैलियां की उनमें से छह इलाकों में भाजपा हारी। रेवाडी में मोदी की बडी रैली हुई, जहां उन्होंने करीब 50 मिनट भाषण दिया। मगर इस सीट से लालू प्रसाद यादव के दामाद और कांग्रेस उम्मीदवार राव चिरंजीवी जीते। प्रधानमंत्री ने एलनाबाद में भी रैली की पर वहां से इंडियन नेशनल लोकदल के नेता अभय सिंह चौटाला चुनाव जीते। गोहाना, बराड और दादरी में भी मोदी की रैली हुई और इन इलाकों में भाजपा को हार का मुंह देखना पडा। महाराष्ट्र में तस्वीर थोडी अलग रही। वहां ऐसी दो सीटों के नतीजे उल्लेखनीय रहे। एक तो सतारा लोकसभा सीट पर, जहां भाजपा के उम्मीदवार उदयनराजे भोंसले को पार्टी में शामिल कराने खुद अमित शाह पहुंचे थे और मोदी ने भी उनके क्षेत्र में रैली की थी, लेकिन वे हार गए। दूसरी परली विधानसभा सीट जहां, भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा का चुनाव अभियान शुरु हुआ था अमित शाह की रैली से और खत्म हुआ मोदी की रैली से, लेकिन पंकजा हार गईं।

मनमोहन तीर्थयात्रा पर पाकिस्तान जाएंगे!

आखिरकार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पाकिस्तान जाने की घडी आ पहुंची। वहां उनका जन्म स्थान है, मगर दस साल तक प्रधानमंत्री रहते हुए कई बार न्योता मिलने पर भी वे कभी अपना जन्म स्थान देखने पाकिस्तान नहीं गए। हालांकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद ही बगैर किसी न्योते के पाकिस्तान हो आए थे, लेकिन मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद से हटने के साढे पांच साल बाद अब पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम रखेंगे। उनकी यह यात्रा एक राजनेता के तौर पर नहीं बल्कि एक तीर्थयात्री तौर पर होगी। वे एक सिक्ख श्रद्धालु के रूप में करतारपुर साहिब गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाएंगे। हालांकि पाकिस्तान ने उन्हें करतारपुर कॉरीडोर के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन उन्होंने वह निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि वे पाकिस्तान की सीमा में एक आम सिक्ख श्रद्धालु की तरह ही कदम रखेंगे। पाकिस्तान की ओर से कहा गया है कि मनमोहन सिंह आम श्रद्धालु की तरह भी आएंगे तो वह उनका स्वागत करेगा। करतारपुर कॉरीडोर का उद्घाटन भारत की ओर आठ नवंबर को और पाकिस्तान की ओर नौ नवंबर को होगा। उद्घाटन के बाद जो पहला जत्था जाएगा, उसमें मनमोहन सिंह भी शामिल होंगे। इस जत्थे में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह, केंद्रीय मंत्री व अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी शामिल रहेंगे।

तो इस तरह हुई खट्टर की दोबारा ताजपोशी

हरियाणा के नतीजों को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने चाहे जैसे दावे किए हो, लेकिन हकीकत यह है कि वह मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के कामकाज से जरा भी खुश नहीं है। माना जा रहा है कि बेहद कमजोर विपक्ष वाले सूबे में अगर पार्टी सामान्य बहुमत भी हासिल नहीं कर पाई तो मतलब साफ है कि लोग राज्य सरकार से खुश नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में पार्टी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर कामयाबी मिल गई थी। विधानसभा के चुनाव मतदाता की कसौटी पर खट्टर थे और वे नाकाम साबित हुए। नतीजे आने के बाद और सरकार बनाने से पहले शीर्ष स्तर पर विचार-विमर्श हुआ था कि खट्टर को ही रिपीट किया जाए या किसी नए को मुख्यमंत्री बनाया जाए। महसूस किया गया कि जाट मतदाताओं में भाजपा के खिलाफ एकजूट होकर मतदान किया, उसे देखते हुए गैर जाटों का पार्टी के साथ बने रहना जरुरी है। गैर जाट नेता के तौर पर खट्टर मुख्यमंत्री रहते हुए अपने कामकाज से यह संदेश भी देते रहे कि अब हरियाणा की राजनीति पर जाटों का एकाधिकार नहीं रहा। ऐसे में अगर उन्हें हटाया जाता तो गैर जाटों के बीच के बीच गलत संदेश जा सकता था। खतरा यह भी था कि किसी गैर जाट को मुख्यमंत्री बनाने से खट्टर और उनके विश्वासपात्र विधायक उसके लिए मुश्किल खडी कर सकते थे। यही सब सोचकर राजपाट दोबारा खट्टर को सौंप दिया गया।

सदमे में मायावती

उत्तर प्रदेश की कुल 12 विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव ने वहां की राजनीति की दिशा तय कर दी है। इन चुनावों ने बहुजन समाज पार्टी को गहरा सदमा पहुंचाया है। लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से ज्यादा सीट जीतने के बाद उसके साथ चल रहे गठबंधन को तोडने के फैसले पर अब उनकी पार्टी के अंदर ही सवाल उठने लगे हैं और यह पूछा जाना लगा है कि क्या किसी तरह 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच फिर गठबंधन हो सकता है। हालांकि ऐसा होना अब आसान नहीं है। दरअसल बसपा में भी कई लोगों का मानना है कि पार्टी के लिए जो मुश्किल खडी हुई है, उसकी वजह खुद मायावती का गलत आंकलन है। लोकसभा चुनाव में सपा से ज्यादा सीट जीतने पर मायावती को लगा था उन्हें अब किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन की जरुरत नहीं है। जबकि जमीनी हकीकत यह थी सपा से गठबंधन की वजह से ही मुसलमानों का भरपूर समर्थन बसपा को हासिल हुआ था। गठबंधन जैसे ही टूटा, मुस्लिम मतदाताओं ने बसपा से दूरी बना ली। नतीजा यह हुआ कि पहले एक और उसके बाद 11 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में बसपा कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं रही। जबकि सपा न सिर्फ तीन सीटें जीतने में बल्कि अपने को मुख्य विपक्षी पार्टी साबित करने में भी कामयाब रही। अब वह यह कहने की स्थिति में है कि बसपा से गठबंधन करना उसकी चूक थी।

बंगाल में दीदी के मुकाबले दादा!

जिस अंदाज में सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है, उसे देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा उनको अपना चेहरा बना सकती है। गांगुली सिर्फ दस महीने के लिए अध्यक्ष बने है। अगले साल जुलाई में उनका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के अध्यक्ष का पद बीच में छोडकर दस महीने के लिए बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने का दादा का फैसला भी अनायास नहीं लग रहा है। लगता है कि दस महीने बाद जब वे बीसीसीआई से रिटायर होंगे तो सीधे राजनीति के मैदान में उतरेंगे। वैसे गांगुली अब तक राजनीतिक रूप से हमेशा अपने अनुकूल पाले में खडे होते रहे हैं। भाजपा से लेकर लेफ्ट और तृणमूल कांग्रेस तक सब उनको अपना मानते हैं और वे भी सबके साथ होते हैं, पर बीसीसीआई का अध्यक्ष बन कर वे भाजपा और उसमें भी अमित शाह के पाले में जाकर खडे हो गए हैं। गांगुली आधुनिक समय में या यूं कहें कि पिछले कुछ दशकों से पश्चिम बंगाल में युवाओं के सबसे बडे ऑइकन हैं। उन्हें प्रिंस ऑफ कोलकाता, बंगाल टाइगर, महाराजा आदि उपाधियां अपने आप मिली हुई हैं। भाजपा को बंगाल में ममता बनर्जी से मुकाबला करने के लिए ऐसे ही चेहरे की दरकार है। भाजपा को पता है कि अपने दम पर या मौजूदा चेहरों के दम पर लडकर वह कहां तक जा सकती है।

दुष्यंत कब तक रह पाएंगे सत्ता में?

हरियाणा में भाजपा विरोध के एजेंडे पर चुनाव लडे दुष्यंत चौटाला अब भाजपा के साथ सत्ता में साझेदारी करते हुए हरियाणा सरकार के उप मुख्यमंत्री हैं। लेकिन अंदेशा जताया जा रहा है कहीं उनका हाल भी वैसा न हो जाए, जैसा गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का हुआ। गौरतलब है कि एमजीपी गोवा में भाजपा की सहयोगी पार्टी थी। मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद प्रमोद सावंत को मुख्यमंत्री बनाए जाने के समय इसका भाजपा से विवाद हुआ था। पर अंतत: दोनों में समझौता हो गया था और पार्टी के नेता सुधीन धवलीकर उप मुख्यमंत्री बने थे। थोडे दिनों बाद ही उनकी पार्टी के तीन में से दो विधायकों ने एक दिन आधी रात के बाद स्पीकर से मिल कर अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर दिया। मुख्यमंत्री ने धवलीकर को हटा दिया और उनके दो विधायकों को मंत्री बना दिया। दुष्यंत चौटाला की पार्टी को लेकर भी ऐसा ही अंदेशा जताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसा न हो कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी के दो तिहाई यानी आठ विधायक स्पीकर से मुलाकात कर पार्टी का विलय ही भाजपा में कर दे और फिर भाजपा दुष्यंत को सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दे। वैसे भी उनको दबाव में रखने के लिए ही भाजपा ने सात निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन ले रखा है। हरियाणा में भाजपा ने अपने सहयोगी अकाली दल के इकलौते विधायक को तो अपनी पार्टी में पहले ही शामिल करा लिया है। नाराज अकाली दल ने भाजपा के खिलाफ चुनाव लडा था।

चलते-चलते

कमाल की सुरक्षा व्यवस्था है! नई दिल्ली एयरपोर्ट पर दोपहर बारह बजे एक संदिग्ध बैग मिलता है। संदेह जताया जाता है कि उसमें आरडीएक्स होगा। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां शाम तक पता नहीं लगा पाती कि उस बैग में बारूद भरा है या अमचूर।

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