इतना तो हो ही गया कि देश के लोगों ने मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को अपने असली रूप में देख लिया। जब तक पूर्ण बहुमत के साथ यह पार्टी सत्ता में नहीं आई थी तब तक एक कौतूहल था कि पता नहीं, ये क्या करेंगे जब ये अपने दम पर सत्ता में आएंगे।
वाजपेयी जी के नेतृत्व में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी तो जरूर, लेकिन बैसाखियों के सहारे। ऊपर से अटल जी का अपेक्षाकृत उदारवादी चेहरा। तो…समर्थकों में एक कसक सी रह गई कि काश, पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आ पाती। तब देखते कि राष्ट्रवाद क्या है, हिंदुत्व किसे कहते हैं। तटस्थ लोगों और विरोधियों की जिज्ञासा भी बनी रह गई।
लो जी, वह भी हो गया। अपने नरेंद्र भाई मोदी जी ने इतिहास रच दिया। भाजपा उनके नेतृत्व में अपने दम पर सत्ता में आ गई। एनडीए के अन्य घटक दलों की सीटें तो बोनस थीं जो बहुमत को अजेय बनाती थीं।
अब इंतजार था कि राष्ट्रवाद अपना जलवा दिखाएगा, हिंदुत्व अपना संस्कार दिखाएगा। लोगबाग गदगद…विरोधी हतप्रभ …जनमानस का कौतूहल चरम पर।
बचपन से राष्ट्रवाद का जो पाठ हमने पढा था उसमें अशफाकउल्ला खां का नाम रामप्रसाद बिस्मिल के साथ आता था, सांप्रदायिकता के थपेड़ों के बीच भी मौलाना आज़ाद की वैचारिक दृढताओं के दृष्टांत आते थे, गुलामी की जंजीरों से जूझते भारत के एक राष्ट्र के रूप में उभरने और उसमें सभी धर्मों के लोगों की भूमिकाओं के अध्याय आते थे।
उसी तरह…हिंदुत्व के संबंध में भी बचपन से जिस मानसिकता का विकास होता गया उसमें तुलसी के समन्वय की भूमिका थी, कबीर के विद्रोह का योगदान था, रैदास के वैचारिक संघर्षों की आभा थी और गांधी के उस संदेश का प्रभाव था…”वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जो पीर पराई जाणे…”।
1980 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्डिक्ट में भी हिंदुत्व को परिभाषित होते हमने देखा था कि यह शब्द किसी संस्थागत धर्म को परिभाषित नहीं करता, बल्कि एक संस्कृति, एक जीवन मूल्य को धारण करता है। निश्चय ही उस संस्कृति, उस जीवन मूल्य में समन्वय, सद्भाव और आत्मसातीकरण की भावनाएं सन्निहित थीं।
सुप्रीम कोर्ट के उस कथन का तब के संघ-भाजपा के शीर्ष लोगों ने स्वागत किया था और उसे आधार बना कर अपने पुराने फलसफे को स्वीकार्य बनाने की कोशिश की थी कि…तमाम भारत वासी हिंदुत्व की इस सांस्कृतिक छतरी के ही नीचे हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
बहरहाल, आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के भाजपाई फलसफे का राजनैतिक अभियान शुरू हुआ, जिसका एक पड़ाव कुछ वर्षों के ‘अटल राज’ के रूप में सामने आया। लेकिन, यह अधूरा था। दूसरों के खम्भों पर टिके अपने छत को आप मनमाने रंगों से नहीं रंग सकते। कसक बाकी रह गई।
उस कसक को 2014 में जाकर मुकाम मिला। कहा गया…”पृथ्वीराज चौहान के बाद 900 वर्षों के इंतजार के बाद कोई चक्रवर्त्ती हिन्दू सम्राट दिल्ली के सिंहासन पर बैठा है।” इस वक्तव्य में ही नई सत्ता के तमाम सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की झांकी मिल गई।
और फिर…सिर्फ उन्मादी ही नहीं, प्रायोजित भीड़ के द्वारा अखलाक की निर्मम हत्या के साथ इस हिंदुत्व का पहला परिचय मिला। फिर तो…गौमाता के रक्षकों के उत्पात से देश दहलने लगा।
लोग किंकर्तव्यविमूढ़ की हालत में आने लगे…”यह तो वह हिंदुत्व नहीं है जिसके बारे में हमें बचपन से बताया जाता रहा।”
इधर…शाह जी के अध्यक्ष बनने के साथ ही भाजपा पूरी तरह एक कॉकस के अधीन आ गई। जोशी, आडवाणी आदि नेपथ्य में धकेल दिए गए, राजनाथ, सुषमा आदि निस्तेज कर दिए गए।
अब हिंदुत्व और राष्ट्रवाद मोदी-शाह की जोड़ी के माध्यम से अभिव्यक्ति पाने लगा। लोगों की उत्सुकता, जिज्ञासा का समाधान मिलने का सही वक्त आ चुका था।
लेकिन…यह क्या? अब तो हिंदुत्व उन्मादियों की भीड़ का बंधक नजर आने लगा और राष्ट्रवाद…? उसकी तो और बुरी गत होने लगी। यह तो कारपोरेटवाद का हथियार बन कर हमें चौंकाने लगा। हमें सुधीजनों की वे बातें याद आने लगीं कि इस दौर में राष्ट्रवाद एक हथियार है…गरीबों, मजदूरों, करदाताओं का खून चूसने का एक जरिया।
अच्छा हुआ…लोगों का कौतूहल शांत हुआ, घूंघट में सिमटी क्रुरूपता उजागर हुई। अब हम में से अधिकतर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नारों से भ्रमित होने के लिये खुद को कोस रहे हैं।
लेकिन…वे नहीं रुक रहे। सत्ता हाथ से निकलने की आशंका मात्र से वे इतने व्यग्र और चिंतित हो उठे हैं कि सीमाएं लांघने में भी उन्हें कोई लाज नहीं। मोदी पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांगने को उतर आए तो शाह के चुनावी भाषणों का कंटेंट भारतीय राजनीति के वैचारिक पतन का ऐतिहासिक दस्तावेज बन कर लोगों के सामने आ रहा है।
अकादमिक दिवालियेपन की हकीकत यह है कि अभी कल-परसों अमित शाह ने बंगाल की एक रैली में कहा,” ममता बनर्जी राज्य के लोगों पर उर्दू थोपना चाहती हैं।”
कोलकाता की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि वहां बांग्ला या उर्दू कोई मुद्दा ही नहीं है। क्यों हो भला? दुनिया जानती है कि बंगाल के लोगों को अपनी बांग्ला भाषा से कितना प्यार है, बांग्ला साहित्य और संस्कृति से कितना लगाव है। हिन्दी पट्टी में तो इसका उदाहरण दिया जाता है।
कम से कम बांग्लादेश के जन्म का इतिहास ही पढ़ लेते शाह साहब, तो इतने बेतुके वक्तव्य नहीं देते। भाषा का मामला ही मुख्य था जिसने पूर्वी पाकिस्तान, जिसे आज बांग्लादेश बोलते हैं, के लोगों को पाकिस्तान से अलहदा अपना मुल्क बनाने को प्रेरित किया।
लेकिन, इन्हें तो भाषा के आधार पर, धर्म और संस्कृति के आधार पर विभाजन चाहिए। तभी इनकी राजनीति परवान चढ़ेगी। बंगाल विजय के लिये भी इनके पास यही रणनीति है।
कारपोरेट लूट और बेरोजगारी से त्रस्त आम लोगों की नजरों में मोदी-शाह ब्रांड राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की असलियत आ चुकी है। अब कौतूहल नहीं रहा, जिज्ञासा नहीं रही। लगातार 32 वर्षों से घोषणापत्रों में राम मंदिर का जिक्र भी यह अहसास कराने के लिये काफी है कि इन्हें कोई मंदिर-वन्दिर बनाना नहीं है, बस उन मुद्दों को ज़िंदा रखना है जो इनकी राजनीति के लिये उपयोगी हैं।
दरअसल, इनके हिंदुत्व को, इनके राष्ट्रवाद को सदैव जन उन्मादों का संबल चाहिये। लेकिन, लोग तो अब बेरोजगारी पर सवाल पूछने लगे हैं, सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़ के खेल पर सवाल पूछने लगे हैं।
मोदी और शाह की जोड़ी ने जितना अहित देश का किया है, उतना ही, बल्कि उससे ज्यादा ही भाजपा का किया है। देश तो फिर उठ खड़ा होगा समन्वय और सद्भाव की राह पर, लेकिन भाजपा को लोगों की नजरों में उठने के लिये कड़ी मेहनत करनी होगी। इस जोड़ी ने जो काई भर दी है, उसे साफ करने में भाजपा को वक्त लगेगा।
आत्मावलोकन सिर्फ व्यक्तियों को ही नहीं, राजनीतिक दलों को भी करना होता है। भाजपा को भी करना होगा। भारतीय राजनीति में सार्थक भूमिका निभाने के लिये आत्मावलोकन के सिवा इसके पास और कोई विकल्प नहीं। क्योंकि…अगर देश के लोगों में सचमुच का सांस्कृतिक जागरण हो तो भाजपा बतौर पार्टी विलुप्त हो जाएगी।

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