रात के अँधेरे में सत्ता हड़पने की साजिशों को नाकाम करने के बाद अनगिनत बाधाओं को पार करते हुए शिवसेना–एनसीपी–कांग्रेस का महाविकास अघाडी (गठबंधन) भारतीय जनता पार्टी के हाथों से सत्ता छीनने में आखिरकार कामयाब रहा. लेकिन शपथ-ग्रहण समारोह से पहले ही उसकी स्थिरता पर सवाल उठाए जाने लगे हैं. उसे एक ऐसे बेमेल विवाह की संज्ञा दी जा रही है जिसका तलाक अवश्यम्भावी है. शिवसेना के ‘सेक्युलर चोला पहनने’ और कांग्रेस के ‘हिंदुत्व की बगलगीर होने‘ को लेकर चुटकुलों का दौर जारी है.

ऐसे माहौल में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बनी बनाई सरकारों को साम-दाम-दंड-भेद के हथकंडों द्वारा अपदस्थ कर कुर्सी पर कब्जा करने की कला में माहिर मोदी-शाह की जोड़ी के सामने महाराष्ट्र की यह गठबंधन सरकार क्या बगैर हिचकोले खाए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी? क्या सेना और कांग्रेस ने अपनी–अपनी विचारधाराओं को तिलांजलि दे दी है? शिवसेना सेक्यूलर हो गई है या कांग्रेस ने हिदुत्व का हाथ थाम लिया है?

दो विपरीत विचारधाराओं के इस संगम के पीछे मौजूद कारणों का यदि विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष निकलता है कि विचारधारा बेमेल होने के बावजूद यह गठबंधन कड़ी मशक्कत के बाद मिली सत्ता को यूँ ही हाथ से जाने नहीं देगा.

उद्धव ठाकरे जानते हैं कि माटीपुत्र का नारा सेना के परंपरागत वोटरों के बीच अब अपनी अपील खोता रहा है और हिंदुत्व बहुत तेजी से उस खाली स्पेस को हथिया रहा है. 2019 के आम चुनावों के बाद भाजपा के असाधारण रूप से बढ़ते हुए जनाधार का आकलन करने के बाद शिवसेना को यह बात अच्छी तरह समझ आ गई कि अब हिंदुत्व भाजपा की बपौती बन चुका है और क्षेत्रीय जनाधार वाली उनकी पार्टी को हिन्दूराष्ट्र का रेला कभी भी बहाकर ले जा सकता है.

यूँ भी तीन दशक पूर्व शिवसेना की अंगुली पकड़कर महाराष्ट्र की राजनीति में उतरने वाली भाजपा आज सेना को पीछे धकेलकर राज्य विधानसभा में सर्वाधिक सीटें कब्जाए बैठी है. सेना के गढ़ बीएमसी में सेंध लगाने से भी भाजपा पीछे नहीं रही. पिछले पांच बरसों में सरकार में रहते हुए भी दोनों के बीच रिश्तों में कडुवाहट लगातार बनी रही. सेना के मंत्रियों को शिकायत थी कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ओएसडी के ज़रिए उन पर हर वक्त निगरानी रखते हैं.

कहा यह भी जाता है कि मोदी-शाह के हाथ में भाजपा की कमान आने के बाद मराठी-गुजराती की पुरानी प्रतिस्पर्धा ने फिर से सिर उठाना शुरू कर दिया था. इसके अलावा तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना और केरल के उदाहरणों से भी सेना को यह बात समझ आई कि हिंदुत्व के अलावा भी राजनीतिक जीवन हो सकता है. अत: ताज़ा विधानसभा चुनावों के बाद सामने आए नतीजों के समीकरणों से सेना को यह भरोसा हो गया कि यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो हिंदुत्व का अस्तबल छोड़ने का यह सही मौक़ा है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उल्हास पवार कहते हैं, “शिवसेना बहुत पहले से सकारात्मक संकेत भेज रही थी लेकिन कोंग्रेस ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया. मगर इस बार  पृथ्वीराज चौहान और हुसैन दलवाई ने इस पर काम करने में देरी नहीं लगाई.” याद कीजिए 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव नतीजों के अगले दिन सेना के मुखपत्र ‘सामना’ की हेडलाइन थी ‘भाऊ तु जिंकलं’ (भाई तू जीत गया). सम्पादकीय में राहुल गांधी के चुनाव-प्रचार की भूरि-भूरि प्रशंसा और राहुल के खिलाफ़ भाजपा के व्यक्तिगत दुष्प्रचार की जमकर आलोचना की थी.

शिवसेना और कांग्रेस का अलग-अलग वैचारिक धरातल जरूर रहा है मगर दोनों के रिश्ते कडुवाहट भरे कभी नहीं रहे. छिटपुट छींटाकशी के अलावा एक दूसरे के खिलाफ जहर नहीं उगला. शिवसेना का इतिहास बताता है कि बाल ठाकरे ने इंदिरा गाँधी द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण और आपातकाल लगाए जाने का समर्थन किया था. स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश का भी समर्थन किया. वह हमेशा इंदिरा गाँधी को एक साहसी महिला और देश की सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री बताते थे. 1977 में मुंबई के मेयर पद के लिए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुरली देवड़ा का समर्थन किया.

एक दौर वह भी आया जब कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों वसन्तदादा पाटिल और वसंतराव नाइक के साथ मधुर रिश्तों की वजह से शिवसेना को ‘वसंत सेना’ कहा जाने लगा था. बाल ठाकरे ने राजीव गांधी की टीवी एवं कम्प्यूटर क्रांति की भी तारीफ़ की. राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने यूपीए के प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी और प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया. ताज़ा गठबंधन के बाद उद्धव ने कहा ‘‘जिनके साथ 30 साल काम किया उन्होंने मेरे ऊपर भरोसा नहीं किया लेकिन जिनके खिलाफ हम 30 साल से लड़ रहे हैं उन्होंने मुझ में विश्वास जताया है.” यह बयान सेना की सोच में आए 360 डिग्री बदलाव का स्पष्ट सूचक है.

निश्चय ही सेना यदि कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना चाहती है तो वह उग्र हिंदुत्व के एजेंडे पर कायम नहीं रह सकती. अतीत में भी सेना समय की जरूरत के हिसाब से अपने रुख में बदलाव करती रही है. अत: सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद अपनी प्रस्तावित अयोध्या यात्रा कैंसिल कर दी. यह आदित्य ठाकरे की सोच का ही नतीजा है कि सेना ने वैलेंटाइन डे पर युवा जोड़ो के साथ अभद्र व्यवहार और मारपीट करना बंद कर दिया. युवाओं की सोच के साथ कदम मिलाते हुए मुम्बई में नाईट लाइफ और शारीरिक चुस्ती–दुरुस्ती के जिम कल्चर को और ज्यादा प्रोत्साहन देने की दिशा में कदम उठाए. मुंबई में मेट्रो रेल के लिए आरे कॉलोनी के पेड़ों को काटने का विरोध करने वालों में आदित्य ठाकरे सबसे आगे थे.

उग्र हिंदुत्व से नाल काटकर सेना अब अधर में है. शायद अब तक सेना को यह जरुरत न पड़ी हो कि वह आत्मविश्लेषण कर अपनी नीतियों में बदलाव लाए मगर अब समय आ गया है कि वह अपनी राजनीति की शैली में बदलाव लाए. उसे अब अपने सहयोगियों के हितों के साथ सामंजस्य बैठाना होगा. वह एक क्षेत्रवादी, भाषाई पार्टी से आगे एक आधुनिक सोच वाली पार्टी के रूप में राष्ट्रीय फलक पर उभर सकती है. उसे चाहिए कि अब वह विकासवादी पार्टी के एक नए अवतार में जनता के सामने आए.

यह समझ लेना भी जरूरी है कि महाराष्ट्र में भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण मुख्यतया शिवसेना और काफी हद तक एनसीपी और कांग्रेस अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. ऐसे में सत्ता एक संजीवनी की तरह आई है जो तीनों के उखड़ते पैरों को वापस जमा सकती है. कांग्रेस को सॉफ्ट हिंदुत्व से गुरेज़ नहीं है, सेना कट्टर हिंदुत्व से पल्ला झाड चुकी है, भाजपा तीनों दलों का एक कॉमन शत्रु है. अघाड़ी के लिए इससे बेहतर रेसिपी और क्या हो सकती है! तीनों को हर वक्त भाजपा का भूत सामने खडा दिखाई देगा जो जरा सी भी चूक होते ही महायुति का तख्तापलट कर सकता है. जाहिर है तीनों में से कोई भी यह गलती नहीं करेगा कि उसकी वजह से सरकार अस्थिर हो जाए और भाजपा मौके का फायदा उठा ले .

शरद पवार सरीखे राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी के रणकौशल और राजनीतिक चातुर्य ने इस महागठबंधन को आकार देने में महती भूमिका निभाई है. आगे भी पवार शिवसेना के ‘पल में रत्ती, पल में माशा’ स्वभाव पर अंकुश रखेंगे और शिवसैनिकों की ऊर्जा का इस्तेमाल गठबंधन की कार्यक्षमता बढाने में करेंगे, ऐसी उम्मीद राजनीतिक पंडितों को है.

यदि भाजपा अपनी कुटिल चालों से बाज नहीं आती है और राज्य सरकार को अस्थिर करने का कुत्सित प्रयास करती है तो सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने वाला सेना का काडर भाजपा की चालों को नाकाम कर देगा. शिवसैनिकों के सड़कों पर संघर्ष करने का ही वह जज़्बा है जिससे भाजपा के कर्णधार खौफ़ खाते हैं वरना आईटी, ईडी और सीबीआई के सक्रिय सहयोग से राज्य में अपनी सरकार बना लेना उनके लिए कोई मुश्किल काम न था.

कुल मिलाकर यह नए परिवर्तन शुभ संकेत है और सभी सेक्युलर पार्टियों को चाहिए कि सर्वसमावेशी विचारधारा की तरफ शिव सेना के बढ़ते हुए कदमों का स्वागत करें ताकि उसका यह अहसास पुख्ता हो कि हिंदुत्व की चारदीवारी  के बाहर भी राजनीति का मैदान खुला है.

Comments