“मैं अपने फर्स्ट टाइम वोटर्स से ‘फलाने ढिकाने’ के नाम पर वोट करने को कह सकता हूँ क्या?”
यह डायलॉग अक्सर मोदी जी चुनावी सभाओं में बोलते पाए जाते हैं।  आखिर यह फर्स्ट टाइम वोटर्स इतने महत्वपूर्ण कैसे हैं?  कैसे उन्हें प्रभावित किया गया है?  आइये इसे  समझने की कोशिश करते हैं।
2019 की 17वीं लोकसभा के गठन के लिए 90 करोड़ लोग वोट डालेंगे। इसमें 18 से 19 साल के डेढ़ करोड़ वोटर पहली बार हिस्सा लेंगे।  मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक आठ करोड़ 43 लाख नए मतदाता इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
यानी लगभग 10 प्रतिशत वोटर्स इस बार पहली वोट डालने के लिए कतारों में लगने जा रहा है। हम जानते हैं कि पहली बार वोट डालने का उत्साह अलग ही होता है।  इसलिए लगभग सभी नव-वयस्क वोट डालने जा रहे हैं।
और  यह युवा वोट किसे डालना  है इसकी जानकारी  कैसे जुटा रहे हैं ? सभी जानते है कि यह युवा अन्य किसी जनसंचार के माध्यम के बनिस्बत सबसे अधिक सोशल मीडिया से ही प्रभावित है। पहली बार मतदान करने वाले, मतदाता सोशल मीडिया पर बहुतायत में हैं और यह इनमें से अधिकतर युवाओं के लिये सूचना का प्राथमिक स्रोत भी है।
देश के आईटी दिग्गज टी वी मोहनदास पई का कहना है कि सोशल मीडिया के कारण इस बार आम चुनाव में 4-5 फीसदी वोट इधर-उधर हो सकता है।
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा योगदान हमारे देश की आधी आबादी (महिलाएं) एवं हमारी युवा पीढ़ी को राजनीति से जोड़ने का रहा क्योंकि इन दोनों ही वर्गों के लिए राजनीति हमेशा से ही नीरस विषय रहा है।  लेकिन आज फेसबुक और अन्य माध्यमों से यह दोनों ही वर्ग न सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं अपितु अपने विचार भी रख रहे हैं।  ऐसा पहली बार होने जा रहा है। जियो के आने के बाद से व्हाट्सएप और  फेसबुक का स्मार्टफोन में एकाउंट होना मस्ट माना जाता है।
 18 से 22 वर्ष के वोटर जो पहले अपने परिवार की परंपरा के आधार पर वोट डालते थे, आज उनकी खुद की सोच है , पसंद नापसंद है। इसलिए ट्विटर और फेसबुक के पेज शख्सियत केन्द्रित हैं,  न कि विचारधारा केन्द्रित। पार्टी ब्रांड से ज्यादा व्यक्ति पर आधारित है।  विचारधारा को समझने में अधिक मानसिक श्रम करना पड़ता है।  इसके बनिस्बत यह युवा किसी छवि से अधिक आसानी से प्रभावित होता है और उससे जुड़ाव महसूस करता है।
डाटा एनालिसिस करने वाली कंपनियां फेसबुक डाटा के जरिए यूजर्स की प्रोफाइलिंग करती हैं। सूत्र बताते हैं कि फेसबुक प्रोफाइल को डिकोड करने का एक फॉर्मैट है। इसके तहत किसी खास शख्स का प्रोफाइल लेने के बाद उसके 10 पोस्ट शेयर, 100 पोस्ट लाइक और 20 पोस्ट का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। साथ ही उसके नैटवर्क और ग्रुप का विश्लेषण किया जाता है। राजनीति से जुड़े पेज इन्हीं प्रोफाइल को देखकर बनाए जाते हैं और उन पर पोस्ट भी उसी अनुरूप  दिए जाते हैं। जैसे कि अगर कोई राष्ट्रवाद से प्रभावित होता है तो उसका इससे जुड़े पोस्ट से ही सामना ज्यादा से ज्यादा हो, यह तय किया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी खास नेता से प्रभावित है तो उस नेता से जुड़ी हर बात उसके टाइम लाइन तक पहुंचे, इसका भी ध्यान रखा जाता है। देश की राजनीति में प्रोफाइल विश्लेषण के लिए लगभग 500 कैचवर्ड बनाए गए हैं।  यूजर के पर्सनल डाटा को ध्यान में रखकर उसकी राजनीतिक पसंद, नापसंद को देखते हुए उससे जुड़ी हुई पोस्ट ही दिखाती हैं। लंबे समय तक ऐसी पोस्ट देखने से व्यक्ति का झुकाव किसी भी राजनीतिक पार्टी की तरफ हो जाता है।
यह सब तो फिर भी ठीक है लेकिन जब ऐसे व्यक्ति विशेष के पेज का इस्तेमाल अफवाहों ओर झूठी बातों और आधे अधूरे तथ्यों को सर्कुलेट करने में किया जाता है तो यह युवा सिर्फ इनके बनाए आधे अधूरे तथ्यों को लेकर बनाए गए मीम को, फेक कंटेंट को सर्कुलेट करने का एजेंट बनकर रह जाता है।
अपनी किताब ‘आई एम ए ट्रोल’ में स्वाति चतुर्वेदी भाजपा के सोशल मीडिया कंट्रोल रूम के बारे में बताती हैं कि बॉलीवुड अभिनेता आमिर ख़ान को ट्रोल करने, फ़िल्म दिलवाले के बहिष्कार की अपील करने, कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ ट्वीट करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया था।
इसी साल मार्च की शुरुआत में भारत के व्हाट्सऐप पर ढेरों ग्रुप राष्ट्रवादी जोश से ओत-प्रोत हो गए, जब पाकिस्तानी सीमा में भारतीय वायुसेना के हमले के सबूत का दावा करने वाली तस्वीरों की बाढ़ देखने को मिली थी।  पुलवामा अटैक एक ट्रिगर पॉइंट था।  सेना का शौर्य वोट मांगने का अब नया हथियार बन गया।  इस बाढ़ में पिछले 5 सालो के कामकाज की समीक्षा बह गयी हैं।  मीडिया को भी पिछले 5 सालों से देश की मूलभूत समस्याओं से ध्यान डाइवर्ट करने के काम पर लगा रखा है।
हमे यह मान ही लेना चाहिए कि खासकर हिंदी हार्ट लेंड में बीजेपी का यह अभियान फर्स्ट टाइम वोटर्स को बहकाने में कामयाब रहा है। उम्मीद अब सिर्फ बचे हुए मतदाताओं से ही है।

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