विश्व इतिहास के कई अध्याय हमें सचेत करते हैं कि हर जनादेश स्वागत के लायक नहीं होता, भले ही लोकतांत्रिक विवशताओं और मर्यादाओं के तहत आप सिर झुका कर उसे स्वीकार करें।

ऐसे जनादेश के साथ अगर ‘प्रचंड’ विशेषण जुड़ जाए तो आशंकाएं और सघन होती हैं, चिंताएं और बढ़ती हैं क्योंकि सत्ताधारी दल ने जिस वैचारिक धरातल पर यह आम चुनाव लड़ा उसमें आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े सवालों का कोई वजूद नहीं था।

भले ही आप…”यह मोदी है…घर में घुस कर मारेगा”…जैसे डायलॉग्स बोल कर चुनावी सभाओं में उन्माद का संचार करने में सफल रहे हों, खुद के व्यक्तित्व को आक्रामक नायकत्व की आभा प्रदान करने में सफल रहे हों, लोगों का ध्यान उनकी मौलिक समस्याओं से हटाने में सफल रहे हों, लेकिन जब सरकार चलाने की बारी आएगी तो जमीनी चुनौतियों से सामना करना ही पड़ेगा।

फिर…नई सरकार इन वास्तविक चुनौतियों का सामना कैसे करेगी?

इस मायने में इनका पिछला कार्यकाल कोई सही दृष्टांत पेश नहीं करता जिसमें मौलिक समस्याओं से जूझ रही वंचित जमात के दिमाग में “देश…सेना…राष्ट्र…संस्कृति…आदि” शब्दों से जुड़े मनोवैज्ञानिक प्रभावों का जम कर उपयोग किया गया और इनकी आड़ में कारपोरेट के लिये खुल कर बैटिंग करते हुए जनविरोधी राजनीति के सफल प्रयोगों का नायाब उदाहरण पेश किया गया।

खैरातों के रूप में वंचितों को कुछ देने-दिलाने के सिवा इनके पिछले कार्यकाल की उपलब्धि यही है कि आबादी के बड़े हिस्से की क्रय शक्ति में अपेक्षाओं और आश्वासनों के बावजूद कोई इज़ाफ़ा नहीं हुआ, जिसकी परिणति में देश आज आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है। देश-दुनिया के अखबारों के आर्थिक पेज इसके गवाह हैं जिन्हें उन मतदाताओं का बड़ा वर्ग बिल्कुल नहीं पढ़ता जिन्होंने “देश के लिये” इन्हें अपना वोट दिया है।

राजनीति का यह रूप बेहद खतरनाक है कि कोई सरकार अर्थव्यवस्था की गिरती हालत और अपनी विफलताओं को कृत्रिम मुद्दों से ढंकने की कोशिश करे और इसमें सफल भी हो जाए।

यकीनन, मोदी-शाह की जोड़ी की यह राजनीतिक सफलता “अद्भुत…अविश्वसनीय…अकल्पनीय” है, जिसे एक चर्चित भोंपू चैनल ने अपना हेडलाइन बनाया था। हमें मानना होगा कि उन्होंने विपक्ष की अकर्मण्यताओं और सामाजिक न्याय की राजनीति में उभरे अंतर्विरोधों का जितना राजनीतिक लाभ उठाया उससे भी अधिक सफलता लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा करने में हासिल की।

दरअसल, पिछले चुनाव में जीत हासिल करने के साथ ही मोदी ब्रांड पॉलिटिक्स के रणनीतिकारों ने अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। 2015 आते-आते दृश्य यह बना कि एकाध को छोड़ कर प्राइम टाइम में आप कोई भी चैनल खोलें, पाकिस्तान, कश्मीर, आतंकवाद आदि से जुड़ी खबरों से ही आपका सामना होता था। चीखते एंकर, उन्माद फैलाते हेडलाइन्स, पता नहीं किन सूत्रों के हवाले से एक से एक झूठी खबरें…।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया कि जैसे इस विशाल देश की अपार जनसंख्या के समक्ष समस्या अगर कोई है तो वह कश्मीर है, आतंकवाद है, पाकिस्तान है। खबरों के टोन को बेहद शातिराना अंदाज में इस तरह प्रस्तुत किया जाने लगा कि विदेशी आतंकियों को अपने देश के कुछ वर्गों की सहानुभूति और सहयोग प्राप्त है। कुछेक उदाहरणों को सामने ला कर किसी खास समुदाय को पूरी तरह संदेहों के घेरे में लाने का उपक्रम जितना मीडिया ने किया उतना तो नेताओं ने भी नहीं किया, विभाजनकारी मानसिकता के निर्माण में इन चैनलों ने जितनी बड़ी भूमिका निभाई उतनी तो नेता भी नहीं निभा सके।

महंगी होती शिक्षा, वंचितों के लिये दुर्लभ होती स्वास्थ्य सेवाएं, बढ़ती बेरोजगारी, हताश और मनोरोगी होते युवा, कुपोषित बच्चों-माताओं की बढ़ती संख्या आदि कोई समस्या ही नहीं रह गई।

बस…उन्माद। बढ़ता उन्माद…मारो…पकड़ो…ये पकड़ा…वो मारा। एक मसूद अजहर को इन चैनलों ने इतनी बार मारा कि अब गिनना भी सम्भव नहीं, उन चैनलों के लिये भी नहीं… कि मसूद अजहर को कितनी बार मारा जा चुका है।

135 करोड़ की जनसँख्या, दर्जनों राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों वाले इस देश में कश्मीर भी एक समस्या है, बड़ी समस्या है, आतंकवाद तो देश ही नहीं, दुनिया की बड़ी समस्या है। किंतु, समस्याएं और भी हैं, चुनौतियां और भी हैं।

भाजपा के थिंक टैंक ने सफलतापूर्वक यह सुनिश्चित किया कि देश की सामूहिक चेतना सिर्फ कश्मीर, पाकिस्तान आदि समस्याओं में उलझ कर रह जाए और जीवन से जुड़े जरूरी मामले गौण रह जाएं।

और फिर…पुलवामा की वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना, जिसके बारे में देश को अभी तक पता नहीं कि वह कौन से ‘सिक्युरिटी लैप्सेज’ थे जो इसके लिये जिम्मेवार थे। पता नहीं, जांच की क्या स्थिति है।

उसके बाद…बालाकोट। इस एयर स्ट्राइक में कोई चैनल 350 आतंकियों को मार रहा था, कोई 300, कोई मसूद अजहर के भाई, भतीजों, बहनोइयों के मारे जाने की खबरें चला रहा था। सत्य से कोई वास्ता नहीं, सुनियोजित झूठ फैलाना ही एकमात्र लक्ष्य बन गया। यहां तक कि अमित शाह ने भी चुनावी रैलियों में 250 आतंकियों के मारे जाने की बातें की।

अधिकाधिक हाथों में पहुंच चुके सस्ते स्मार्टफोन और फ्री डाटा की भूमिका यहीं से निर्णायक होने लगती है। डेली हंट टाइप कोई भी न्यूज एप खोलिये… एक से एक भ्रामक, झूठी खबरें। स्रोतों की विश्वसनीयता से कोई मतलब नहीं।

“घुस कर मारा…मोदी है तो मुमकिन है…पाकिस्तान को उसकी औकात दिखा दी…फलां आतंकी कैम्प ध्वस्त कर दिया…आतंकियों की कमर तोड़ दी…इमरान खान गिड़गिड़ा रहा है…चीन डर कर पाकिस्तान से भाग रहा है…।”

‘नमो अगेन’ की सस्ती टीशर्ट पहने बेरोजगार, कुपोषित युवाओं की जमात स्मार्टफोन की स्क्रीन पर छद्म खबरों, भ्रामक वीडियोज आदि देख-देख कर उन्माद से भरती गई और नतीजे में ईवीएम पर नमो अगेन का बटन दबा कर आ गई।

जातियों की सीमाएं टूट गईं, वर्गों की दीवारें धराशायी हो गईं।

लखनऊ की सड़कों पर पेंशन के लिये लड़ते सरकारी कर्मचारियों का समूह हो या पटना की सड़कों पर अपने हक और सम्मान के लिये लड़ते नियोजित शिक्षकों की जमात हो, आउटसोर्सिंग के अमानुषिक शोषण का शिकार होते कर्मी हों या कर्ज से दबे किसान हों, सरकारी वैकेंसी के इंतजार में उम्र गंवाते पढ़े-लिखे बेरोजगार हों या बेहद अल्प वेतन पर 12-15-16 घण्टे की ड्यूटी करते असमय बूढ़े और बीमार होते सिक्युरिटी गार्ड, सेल्स मैन और डिलीवरी ब्वायज हों…सबने “देश के लिये” वोट किया और उस “मजबूत नेता” को फिर से सत्ता सौंपने में अपनी भूमिका निभाई जिसके प्रायोजित महानायकत्व के सामने विपक्ष का हर नेता बौना था।

अपने देश, अपनी मातृभूमि के प्रति करोड़ों वंचितों, शोषितों की भावनाओं का इस तरह सुनियोजित दोहन कर उन्हीं का खून चूसने वाली व्यवस्था के निर्माण की यह अनोखी गाथा है जिसके नायक नरेंद्र भाई मोदी हैं और स्क्रिप्ट राइटर अमित भाई शाह हैं

बाकी… वंचितों के शोषण में व्यवस्था के साथ सक्रिय भागीदारी निभाते और ‘नेशन फर्स्ट’ का राग अलापते इलीट क्लास के लोगों के लिये तो मोदी अपरिहार्य थे ही, क्योंकि मोदी भी उनके लिये ही हैं।

नरेंद्र मोदी को बधाई दीजिये क्योंकि वे इसके हकदार हैं, लेकिन यह उम्मीद मत पालिये कि इस दूसरे कार्यकाल में उनका हृदय परिवर्त्तन होगा और वे वंचितों की शिक्षा, चिकित्सा के लिये, उनके जीवन के मौलिक संदर्भों के लिये कुछ ठोस और सकारात्मक करेंगे। नहीं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते क्योंकि इसके लिये वे हैं ही नहीं। वे उन नवउदारवादी शक्तियों के राजनीतिक ध्वज वाहक हैं जिन्हें दुनिया के अनेक ज़िंदा देशों में अब वैचारिक चुनौतियों का सामना है लेकिन भारत में जिनके लिये मैदान खुला है।

संस्कृतिवाद, धर्मवाद के साथ राष्ट्रवाद का सुविचारित, सुनियोजित घालमेल किस तरह जनविरोधी शक्तियों का हथियार बन सकता है, संवैधानिक संस्थाएं किस तरह किसी नेता के राजनीतिक हितों की खातिर दंडवत हो सकती हैं, ज़िन्दगी से जूझते लोग किस तरह सम्मोहन का शिकार हो खुद अपने ही बालबच्चों के लिये खंदक खोद सकते हैं, नरेंद्र मोदी की राजनीतिक सफलताओं में इसे समझा जा सकता है।

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