हाल ही में ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सांसद फायोना ओनासान्या को इस कारण संसद की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा कि उन्होंने चुनाव से पहले कभी कार चलाते वक़्त निर्धारित गतिसीमा का उल्लंघन करके जो अपराध किया था उसे न केवल मतदाताओं से छिपाया बल्कि जुर्माना भरने से बचने के लिए तरह–तरह के झूठ का सहारा भी लिया. पार्टी से निष्कासित कर दी गईं सांसद महोदया अब जेल की हवा खा रही हैं.

भारतीय नेताओं के सार्वजनिक जीवन में नैतिकता आज किस कदर हाशिए पर खड़ी है उसके लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा. एक महिला भारतीय सांसद की कार हाइवे पर एक बच्ची को कुचलती हुई आगे निकल जाती है. बच्ची की मौके पर ही मौत हो जाती है. मामला दो-चार घंटे के लिए मीडिया की सुर्खी बना. सांसद के खिलाफ किसी तरह की कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हुई. उसके बड़ा वही महिला सांसद आज बेधड़क दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं. इस हद तक कुंद हो गई हैं हमारी नैतिक संवेदनाएं!

सदन में देरी से पहुँचने पर इस्तीफा

ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी के मंत्री लार्ड बेट्स ने इस कारण अपने पद से त्यागपत्र दे दिया कि जिस दिन उन्हें अपने विभाग से सम्बंधित किसी मुद्दे पर जवाब देना था, उस दिन वह मात्र एक मिनट की देरी से सदन में पहुंचे. उनके पहुँचने से पहले सदन की कार्यवाही प्रारम्भ हो चुकी थी. मंत्री ने बिना एक क्षण की देरी किए सदन से माफ़ी मांगी और उसी वक्त अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह बात और है कि प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. इसे कहते हैं राजनीति में नैतिकता के उच्चतम मानदंडों की स्थापना!

मगर भारत में आलम यह है कि नेताओं का देरी से पहुँचना उनका ‘विशेषाधिकार’ माना जाता है. यह कहावत आम है ‘नेता और दूल्हा देरी से पहुंचे तभी उसकी इज्ज़त होती है’.हमारे यहाँ समय की पाबंदी की बात तो छोड़ ही दीजिए सदन में उपस्थिति दर्ज करवाना सदस्यों की प्राथमिकता सूची में सबसे  आखिर में होता है. सत्र के दौरान संसद/ विधानसभा की कुर्सियां अक्सर खाली पड़ी रहती हैं.

भारत में विधायिका केंद्र की हो अथवा राज्य की, जब तक किसी विवादास्पद या अत्यंत महत्वपूर्ण बिल पर मतदान के लिए पार्टी द्वारा व्हिप न जारी किया गया हो तब तक अधिकतर सदस्य सदन में आकर झाँकने तक की जहमत नहीं उठाते.  ऎसी शर्मनाक स्थितियां भी पैदा हुईं हैं कि सदन में जारी चर्चा में भाग लेने के बजाए कतिपय सदस्य अपने मोबाइल फोन पर पोर्न फ़िल्में देखते पाए गए. सदन में जूते–चप्पल या कुर्सी–मेज़ें, माइक उठाकर एक–दूसरे पर फेंकने की शर्मनाक हरकतें अब आलोचना का विषय नहीं बनतीं. यह है हमारे देश के कानून निर्माताओं का दायित्वबोध!

कनाडा के प्रधानमंत्री द्वारा कम्पनी विशेष के प्रति नरमी पर कोहराम

कनाडा की एक बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग व निर्माण कम्पनी ने कर्नल गद्दाफी के राज में लीबिया में अधिकारियों को  2015 में करोड़ों डॉलर्स घूस देकर ठेके हासिल किए और बाद में लीबिया की सरकार से धोखाधड़ी का मामला सामने आया. ऐसे में कनाडा के कानून के अनुसार कंपनी को सरकारी ठेके मिलने पर दस साल के लिए पाबंदी लग जानी चाहिए थी. प्रधानमन्त्री जस्टिन त्रुदो मंत्रिमंडल की न्याय मंत्री और एटॉर्नी जनरल श्रीमती विल्सन– रेबोल्ड ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री  ने उन पर यह कहते हुए दबाव बनाया कि कंपनी को किसी कानूनी जंजाल में न फंसाएं क्योंकि कम्पनी बंद होने या उसका मुख्यालय देश से बाहर स्थानांतरित होने की सूरत में हजारों कनाडाई नागरिक बेरोजगार हो सकते हैं. प्रधानमन्त्री आरोपों के घेरे में आ गए और इस्तीफे तक की नौबत आ गई .मुकदमे की कार्यवाही जारी है.

इसके बरक्स भारत में क्या मजंर है इसकी बानगी देखिए- हमारे यहाँ लोग राजनीति में प्रवेश ही इसलिए करते हैं ताकि औद्योगिक घरानों, कोर्पोरेट्स, व्यवसाइयों के हितसाधन के लिए हर प्रकार के नैतिक–अनैतिक हथकंडों का इस्तेमाल किया जा सके जिसकी कीमत राजनीतिज्ञों द्वारा करोड़ों– अरबों रुपए की घूस के रूप में वसूली जाती है. इनके फायदे लिए कानून को तोड़ने–मरोड़ने का चलन नया नहीं है. उद्योग-व्यापार जगत तथा राजनेताओं की यह दुरभिसंधि हमारे देश की नींव को दीमक की चाट रही है. कोर्पोरेट्स देश की सत्ता पर काबिज़ हैं और अपने हितसाधन के लिए कानून की बांह मरोड़ने से गुरेज नहीं करते. आर्थिक भ्रष्टाचार के विरोध में सत्ता में आई तथाकथित ईमानदार छवि वाली पार्टियां भी सत्ता में आने के बाद हमाम में नंगी नज़र आ रही हैं.

प्रशासन में धर्मगुरु के नाजायज़ हस्तक्षेप के कारण राष्ट्रपति को 24 साल की कैद

दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति (अब भूतपूर्व) पार्क गेन-हाइ को 2016 में सत्ता के दुरूपयोग व आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप में 24 साल कैद और 17 लाख डॉलर जुर्माने की सजा सुनाई गई है. इस सारे स्कैंडल की जड़ में एक 60 वर्षीय महिला धर्मगुरु चोई सून–सिल हैं जिसका राष्ट्रपति के दिलो-दिमाग पर जादुई नियंत्रण था. धर्मगुरु ने राष्ट्रपति पर अपने प्रभाव का नाजायज फ़ायदा उठाते हुए बड़े–बड़े कोर्पोरेट्स से अरबों डालर्स का चन्दा अपने दो एनजीओ के लिए वसूला. इतना ही नहीं चोई नियमित रूप से राष्ट्रपति के स्टाफ को निर्देश दिया करती थी, राजनीतिक नियुक्तियां में उसका हस्तक्षेप एक आम बात थी. राष्ट्रपति के नीतिगत भाषणों की विषयवस्तु भी वही तय करती थी. यहाँ तक कि राष्ट्रपति किस दिन किस रंग के कपडे पहनेंगी यह भी गुरु के दिव्यज्ञान से निर्धारित होता था.

जब मामला प्रकाश में आया तो इसके विरूद्ध प्रदर्शन में दक्षिण कोरिया की जनता लाखों की तादाद में सड़कों पर उतर आई. जनता इस बात से आक्रोशित थी एक सामान्य नागरिक की हैसियत वाली धर्मगुरु को राष्ट्रपति ने इतनी ताकत किस कानून के तहत दी. 2016 में राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाया गया और अंतत: कैद की सजा हुई.

भारत की राजनीति में धर्मगुरुओं और नेताओं का चोली–दामन का साथ है. किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती. धर्मगुरुओं द्वारा राजनीति और राजकाज को प्रभावित करने के मसालेदार किस्सों के बगैर इस देश की राजनीति शायद बेस्वाद हो जाए. पिछले वर्ष एक राज्य सरकार ने कुछ पाखंडी धर्मगुरुओं को मंत्री का दर्जा प्रदान कर उनका सत्कार किया था. देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता की कमान एक धर्मगुरु के हाथों में है. कितने साधू–साध्वियां सांसद/विधायक हैं इसकी सूची बहुत लम्बी है.

सवाल उठता है कि राजनैतिक नुकसान उठाकर भी नैतिक मूल्यों की रक्षा करने की प्रवृति का हमारे देश में इस कदर अभाव क्यों है? नैतिकता के नाम पर सत्ता हासिल करने के बाद उन्हीं नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाली राजनीतिक पार्टियों को सवालों के कटघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में देखने को क्यों नहीं मिलती?

आजादी के बाद से नैतिक मूल्यों में लगातार आ रही गिरावट सामाजिक सड़न की तरफ साफ़ इशारा करती है  रंगे हाथों पकड़े गए नेता–अफसर स्वयं को ‘षड्यंत्र‘ का शिकार बताकर सहानुभूति बटोरते दिखाई देते हैं. व्यवस्था राजनीतिक हो या सामाजिक, नैतिकता जैसे सार्वभौम मूल्यों की उपयोगिता को प्रत्येक देश और काल में स्वीकार किया गया है. प्राचीन भारतीय जीवन-व्यवस्था नैतिक मूल्यों की पैरोकार रही है.

विश्व का प्रथम राजनीतिक विचारक प्लेटो राजनीतिशास्त्र को नीतिशास्त्र का ही अंग मानता था. उसका विचार था कि राजनीति नैतिकता पर आधारित होनी चाहिए. भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में नैतिकता और राजनीति के मध्य अटूट सम्बन्ध की स्थापना महात्मा गांधी ने की. शायद इसका कारण यह था कि उन्होंने राजनीति को लोकसेवा का माध्यम माना था, ताकत व सत्ता प्राप्ति का नहीं. उनका मानना था कि जनसेवा या लोकहित अनैतिक साधन अपनाकर नहीं किया जा सकता. मगर अफ़सोस कि आज उन्हीं गांधी के देश में सार्वजनिक जीवन से नैतिक मूल्यों की विदाई हो चुकी है.

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