छह दिसंबर उन्नीस सौ बानवे को केवल बाबरी मस्जिद का ही ढांचा नहीं टूटा था और भी कई ढांचे ढह गए थे, जिनकी खबर हमें अब तक मिलती रहती है। उस दिन पहली बार उपद्रवियों की जीत कानून और व्यवस्था पर हुई और उस दिन यह साबित हो गया था कि विवेक और न्याय से उन्माद बड़ा है। उन्मादियों को कुछ भी कर गुज़रने का हक है। बाद में यह भावना और यह सोच अनेक जगह उजागर होने लगी। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक में हमने इसे देखा और महसूस किया कि अरे उस दिन तो इंसाफ का ढांचा भी ढह गया था।

हर मॉब लिंचिंग में हमें ढहती हुई बाबरी मस्जिद की आवाज़ सुनना चाहिए। यह आवाज़ कहती है कि हमारी भावना के ऊपर कानून कुछ नहीं है, हम अभी इंसाफ करेंगे और अपना मनचाहा इंसाफ करेंगे। छह दिसंबर उन्नीस सौ बानवे को हमने अनजाने ही यह ऐलान कर दिया था कि हम उस संविधान को नहीं मानते, जो हमारी भावना के आड़े आता है। संविधान को नकार तो उसी दिन दिया था, अब बस उसे बदला जाना बाकी है। कानून को उसी दिन धता बता दी गई थी, जो अब तक जारी है। पुलिस व्यवस्था को उसी दिन जनभावना का गुलाम बना दिया गया था, जो हैदराबाद के एनकाउंटर में भी आपको दिख जाएगा। पुलिस भी जनभावना के अनुरूप काम कर रही है।

अभी चार दिन पहले हैदराबाद में भीड़ मांग कर रही थी कि हत्या और रेप के आरोपी को हमारे हवाले कर दो, हम पीट पीट कर मार डालेंगे। पुलिस भी भीड़ में बदल गई और जो काम भीड़ को करना था, पुलिस ने कर डाला। भीड़ और पुलिस में कोई फर्क नहीं रहा। पुलिस वेतन लेती है कानून का पालन कराने के लिए और एजेंडा मानती है भीड़ का, उन्मादियों का। अगर छह दिसंबर नहीं होता, तो शायद यह नहीं होता और शायद रेप भी इतने नहीं होते। एकांत में लड़की का मिल जाना क्या उन्मादियों को बाबरी मस्जिद मिल जाने जैसा नहीं है, जिसकी हिफाजत कोई नहीं कर रहा, जिसे तोड़ा और ढहाया जा सकता है, जिसके मलबे से खेला जा सकता है?

बाबरी मस्जिद का मलबा आपको अनेक घटनाओं की बुनियाद में मिल जाएगा। मगर याद रखिए कि विवेक का हार जाना, न्याय व्यवस्था का हार जाना ना तो 1992 में अच्छी खबर थी और ना 2019 में अच्छी खबर है। बल्कि अब तो यह खबर और भी बुरी है। तब विनाश के बीज डले थे और अब फल आने वाले हैं। अब यह भी हो सकता है कि कहीं कोई रेप हो जाएगा, लड़की की हत्या हो जाएगी, तो पुलिस असल अपराधियों को ढूंढने की बजाय किसी भी गरीब को पकड़ कर उसके सिर इल्जाम लगाएगी और फिर कर देगी एनकाउंटर…बलात्कारी का खात्मा, इंस्टंट न्याय…।

एनकाउंटर का पैटर्न यही है कि सबसे पहले तो एनकाउंटर किया जाता है वास्तविक अपराधियों का। हैदराबाद मामले में हो सकता है वास्तविक अपराधियों की ही हत्या पुलिस ने की हो। मगर बाद में एनकाउंटर होने लगते हैं मासूमों के, निर्दोषों के। पुलिस कच्चा माल तैयार रखती है कि अब अगर कहीं कुछ हो जाए, तो मामले को दबाने के लिए किसका एनकाउंटर करना है। फर्ज कीजिए कि किसी ने आपके बच्चे को रेप के झूठे केस में फंसा दिया और एनकाउंटर की मांग उठी तो क्या होगा? क्या हमारी पुलिस मासूमों के एनकाउंटर के लिए बदनाम नहीं है? अगर कानून में खामियां हैं, तो उसमें बदलाव की मांग कीजिए, अपने सांसद से। अगर न्याय प्रक्रिया धीमी है, तो उसमें सुधार की मांग कीजिए। लेकिन एनकाउंटर पर जश्न मनाना तो ठीक नहीं है। एनकाउंटर पर खुश होने वाले लोग वैसे ही हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने पर खुश थे, नाच रहे थे। बाबरी मस्जिद के ढहने से और क्या क्या ढहा है, यह शायद हमें अगले दस बीस साल और देखना पड़े।

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