जातीय दबंगई और अहंकार से अपनी देह को ऐंठ कर जो अपने गांव की गलियों में गुजरते होंगे उनके परिजन भी गुजरात में मार खाने वाले होंगे। जिनके मोबाइल के डायलर ट्यून में आतंकित करने वाले स्वरों में भगवा नारे गूंजते हैं, उन्हें भी फोन आया होगा कि उनके भतीजे को ट्रेन में घुस कर गुजराती गुंडों ने पीटा है। मनुवाद के खिलाफ अतार्किक तरीके की लड़ाई लड़ते जो लोग हवा में मुट्ठियां लहराते हैं वे भी गुजरात में दिहाड़ी मजदूरी करते अपने भाई या बहनोई की कुशल क्षेम जानने को व्यग्र होंगे। यह ग्लानि, यह कुंठा बिहार और यूपी के न जाने कितने गांवों के कितने घरों में अभी पसर रही होगी कि उनका कमाऊ पूत अपना सिर फोड़वा कर पट्टी बांधे वहां से लौट कर आ रहा है जहां वह कमाने गया था। वह आ रहा है लुट-पिट कर, अपना बहुत कुछ गंवा कर, सबसे त्रासद…अपना रोजगार छोड़ कर।

गुजरात से भाग कर आने वालों की प्रतीक्षा सिर्फ उनकी मां और पत्नियां ही नहीं, उनकी विकल्पहीनता भी कर रही है। वे आएंगे, कुछ दिन जख्म सहलाएंगे, फिर किसी से ब्याज पर कर्ज लेकर किसी और ठौर को निकल जाएंगे जहां उन्हें काम मिल सके…ताकि वे खुद भी खा-पहन सकें और अपने बाल-बच्चों को भी कुछ भेज सकें।  अपने गांव-इलाके में उनके लिये कुछ नहीं है। यहां वे जितने दिन भी रहेंगे अपना बोझ खुद बनते जाएंगे। वे मन को कड़ा करेंगे, नम आंखों से बच्चों को निहारते रेलवे स्टेशन जाने वाली बस पकड़ेंगे और फिर किसी पुरबिया एक्सप्रेस, जनसाधारण एक्सप्रेस या इसी तरह की किसी ट्रेन की ठसाठस भरी जनरल बोगी में नारकीय ढंग से यात्रा करते किसी महानगर, किसी विकसित राज्य में जाकर पनाह लेंगे। वहां वे अमानवीय परिस्थितियों में रहेंगे, एक दिन में दो-दो आदमियों के बराबर काम करेंगे। कोई स्थायित्व नहीं, कोई रहनुमा नहीं।

इनमें कोई मैट्रिक फेल है तो कोई बीए पास, कोई पांचवीं तक पढ़ा है तो किसी को याद ही नहीं अब…कि जब उसने स्कूल जाना छोड़ दिया था तो वह किस क्लास में था। कोई दलित है तो कोई पिछड़ा, कोई अति पिछड़े समुदाय से आता है तो कोई सवर्ण है। कितने तो बाकायदा ब्राह्मण हैं जो मुफलिसी के मारे किसी दूर के शहर में बटन फैक्ट्री के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड बने हुए हैं, … काम की तलाश में साथ आया उनका चचेरा भाई बाबू लोगों की चाय के जूठे ग्लास दुकान तक पहुंचाने के काम में लगा है।

एक-एक कमरे में सात-सात, आठ-आठ लोग…पारी-पारी से सोते, पारी-पारी से जगते, भांग, खैनी, गांजा, दारू की मदहोशी में साथ-साथ डूबते-उतराते, बिहार-यूपी की पारंपरिक गंवाई संस्कृति की सहजता के साथ अपने दुखों को झेलते। इन सबकी नियति एक है। नवउदारवादी व्यवस्थाएं शोषण के मामले में पूरी तरह जाति और धर्म निरपेक्ष होती हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि गांव से काम की तलाश में आया हुआ कोई कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति किस जाति का है, या कि गांव में रहने वाला इसका बाप या भाई जातीय वोटों के किस ठेकेदार के आगे-पीछे घूमते अपनी जाति का वोट बेच रहा है, किस राजनीतिक शोशेबाजी का उपकरण बना हुआ है। जब बिहारी होने के कारण मार खाने की नौबत आती है तो सब पिटते हैं। क्या मुसहर…क्या ब्राह्मण…क्या यादव। 

भारत के विकसित राज्यों के लोगों के लिये बिहार तीसरी दुनिया का कोई अभिशप्त सा प्रदेश है जिसके अधिसंख्य लोग उनके यहां दिहाड़ी मजदूरी करने आते हैं, रिक्शा या ऑटो रिक्शा चलाने आते हैं, सब्जियों से लेकर पानी-पूरी तक का ठेला लगाने आते हैं, जो किसी स्लम टाइप के मुहल्ले में किराए पर बेतरतीब तरीके से रहते हैं, निरहुआ या पवन सिंह की फिल्मों में भोजपुरी नायिकाओं के फूहड़ लटकों-झटकों को देखने के लिये सिनेमा हॉल के बाहर लाइन लगा देते हैं।

होंगे भारत के कोने-कोने में बिहारी अफसर, प्रोफेसर। बिहार की पहचान तो यही वंचित समुदाय है। जमाने भर से छला गया वर्ग। इसके साथ इसके राज्य के, इसकी जाति के नेताओं ने छल किया है, वह मालिक भी छल कर रहा है जिसके काम में वह लगा है, वह रेलवे भी इससे छल करता है जो एक टिकट का पूरा दाम लेकर इसे बैठने को एक सीट तक नहीं देता, पूरी व्यवस्था ही उससे छल करती है। गांव में उसके बच्चे उसी का अगला संस्करण बनने की तैयारी में लगे हैं। उनकी भी यही नियति होने वाली है। काम करने लायक देह के विकसित होने पर उन्हें भी उन्हीं शहरों, उन्हीं फैक्ट्रियों की खाक छाननी है, उन्हीं सड़कों पर ठेला लगाना है, उन्हीं की तरह शोषित और अपमानित होना है, मार खाना है। गांवों में रह रहे इन बच्चों की विकल्पहीनता भी सिर्फ उनके जवान होने का इंतजार ही कर रही है। फिर तो…वही होना है जो उनके बाप-चाचा के साथ हो रहा है।

हालांकि…वे स्कूल जा रहे हैं लेकिन उनका स्कूल जाना उनके पढ़ने के लिये नहीं है, उनकी सरकार की भ्रामक उपलब्धियां दर्शाने के लिये है, जिनमें बताया जाता है कि इतने प्रतिशत बच्चे अब शिक्षा की मुख्य धारा में हैं, कि नामांकन अनुपात में इतनी वृद्धि दर्ज की गई है आदि आदि। बिहार सरकार की ही हालिया रिपोर्ट बताती है कि हाई स्कूलों में बच्चों की औसत उपस्थिति 24 प्रतिशत है। यानी 76 प्रतिशत बच्चे स्कूल में होकर भी स्कूल से बाहर हैं। वे सरकार प्रदत्त सुविधाओं का लाभ लेने स्कूल में नामांकित होते हैं, पढ़ने के लिये नहीं। लोभ की, मतदाताओं को उत्कोच की संस्कृति जैसे-जैसे विकसित होती गई, चेतनाओं का शिथिलीकरण उसी अनुपात में बढ़ता गया।

वैसे, स्कूल से बाहर रहने वाले ये 76 प्रतिशत बच्चे अगर स्कूल आना भी चाहें, पढ़ना भी चाहें तो उनकी पढ़ाई नहीं हो सकती। सरकार ने यह तय कर लिया है कि सरकारी स्कूलों में और सब कुछ होगा लेकिन पढ़ाई का माहौल नहीं होगा। शिक्षकों के सम्मान और अधिकारों से खिलवाड़ की नीति अपना कर और इस प्रक्रिया में अधिकतर अयोग्य लोगों को शिक्षक बना कर सरकार ने वंचितों की शिक्षा के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया है।

सर्वत्र कोलाहल है। शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं, कितने स्कूलों में कई-कई विषयों में वर्षों से शिक्षक हैं ही नहीं, न जाने कितने फर्जी डिग्रीधारी शिक्षक पूरे सिस्टम को अंगूठा दिखाते बच्चों के भविष्य को बर्बाद करने में लगे हैं। तो…इस तरह अगली पीढ़ी तैयार की जा रही है जो विकल्पहीन हो और जवान होने पर बड़े शहरों में जाकर मजदूरों का काम कर सके। पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण के चक्र में पिसने को अभिशप्त एक विशाल तबका…जो अब तक वास्तविक अर्थों में वोटर बन ही नहीं पाया है। जिस दिन यह वर्ग वोटर बनना सीख जाएगा…बहुत कुछ बदल जाएगा।

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