आज गोवर्द्धन पूजा का दिन है। यानी उत्तर भारत में पशुपालकों का बडा पर्व। यह पर्व भारतीय संस्कृति में स्थापित मान्यताओं के प्रति उस पहले विद्रोह का प्रतीक भी है, जो द्वापर युग में इंद्र की निरंकुश सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ कृष्ण के नेतृत्व में हुआ था। इसी विद्रोह से कृष्ण की सामाजिक क्रांति के योद्धा-नायक की छवि उभरती है। इस छवि को उकेरने वाली आवश्यक सामग्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं में भी है और भागवत में भी यह उपलब्ध है।

इंद्र प्रतीक थे पुरातन धार्मिक व्यवस्था के। वह व्यवस्था बंधी थी यज्ञ-याग और कर्मकांड से। ब्रजभूमि में भी इंद्र की पूजा का रिवाज था। माता यशोदा और बाबा नंद भी परंपरा के अनुसार इंद्र की पूजा कर उन्हें भोग लगाना चाहते थे, लेकिन बाल कृष्ण ने उनके ऐसा करने पर ऐतराज किया। वे इंद्र को लगाया जाने वाला भोग खुद खा गए और कहा, देखो मां, इंद्र सिर्फ वास लेता है और मैं तो खाता हूं। यशोदा और नंद बाबा ने कृष्ण को समझाया कि मेघराज इंद्र अपनी पूजा से प्रसन्न होते हैं…उनकी पूजा करो और उन्हें भोग लगाओ तो वे जल बरसाते हैं और ऐसा न करने पर वे नाराज हो जाते हैं। कृष्ण के गले पर यह बात नहीं उतरी। उन्होंने आसमानी देवताओं के भरोसे चलने वाली इस व्यवस्था को चुनौती दी। गोपों की आजीविका को इंद्र की राजी-नाराजी पर निर्भर रहने देने के बजाय उसे उनके अपने ही कर्म के अधीन बताते हुए कृष्ण ने कहा था कि इस सबसे इंद्र का क्या लेना-देना। उन्होंने इंद्र को चढ़ाई जाने वाली पूजा यह कहते हुए गोवर्धन को चढ़ाई थी कि हम गोपालक हैं, वनों में घूमते हुए गायों के जरिए ही अपनी जीविका चलाते हैं। गो, पर्वत और वन यही हमारे देव हैं।

आसमानी देवताओं या आधुनिक संदर्भों में यूं कहें कि शासक वर्ग और स्थापित सामाजिक मान्यताओं से जो टकराए और चुनौती दे उसे बड़ा पराक्रम दिखाने तथा तकलीफें झेलने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है। अपनी पूजा बंद होने से नाराज इंद्र के कोप के चलते प्रलयंकारी मेघ गरज-गरजकर बरसे थे ब्रज पर। आकाश से वज्र की तरह ब्रजभूमि पर लपकी थीं बिजलियां। चप्पा-चप्पा पानी ने लील लिया था और जल प्रलय से त्रस्त हो त्राहिमाम कर उठे थे समूची ब्रज भूमि के गोप। अपने अनुयायियों पर आई इस विपदा की कठिन घड़ी में समर्थ और कुशल क्रांतिकारी की तरह रक्षक-प्रहरी बनकर आगे आए थे कृष्ण। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से गोपों और गायों की रक्षा की थी।

कृष्ण के गोवर्द्धन धारण करने का एक ही अर्थ है कि जो व्यक्ति स्थापित व्यवस्था को चुनौती दे उसे मुक्त क्षेत्र का रक्षक-प्रहरी भी बनना पड़ता है। ब्रजभूमि के गोपों में इतना साहस कहां था कि वे इंद्र को चुनौती देते। किसी भी समाज में स्थापित मान्यताओं और व्यवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह एकाएक ही नहीं फूट पड़ता। उसके पीछे सामाजिक चेतना और उससे प्रेरित संकल्प के अनेक छोटे-बड़े कृत्य होते हैं। कृष्ण की बाल लीला ऐसे ही कृत्यों से परिपूर्ण थी। नायक के अद्‌भुत साहस और पराक्रम को अलौकिक मानने वाली दृष्टि ने कृष्ण के इस रक्षक रूप को परम पुरुष की योगमाया या अवतार पुरुष के चमत्कार से जोड़ दिया। लेकिन ज्यादा संभावना यही है कि कंस के संगी-साथियों और सेवकों के अत्याचारों से पीड़ित ब्रजवासियों में कृष्ण ने अत्याचारों का प्रतिकार करने की सामर्थ्य जगाई हो। यह सामर्थ्य उपदेशों प्रवचनों से जाग्रत नहीं होती, बल्कि उसके लिए नायक को खुद पराक्रम करते हुए दिखना पड़ता है।

कृष्ण लीला में जिन्हें पूतना, तृणावर्त, बकासुर, अधासुर, धनुकासुर कहकर आसुरी परंपरा से संबद्ध कर दिया गया है, वे सभी किसी न किसी रूप में क्रूरकर्मा कंस की अत्याचारी व्यवस्था से जुड़े हुए थे। वे सभी उस व्यवस्था की रक्षा के लिए और उसके दम पर ही लोगों पर अत्याचार करते थे। ऐसे सभी आततायियों से कृष्ण लड़े और जीते। इससे ही गोप-ग्वालों में इतनी जाग्रति आई कि वे देवराज इंद्र को भी चुनौती दे पाए और कंस की अत्याचारी व्यवस्था के विरुद्ध भी संगठित हो सके। क्रांति शास्त्र का सार्वकालिक और सर्वमान्य सिद्धांत है कि साहस का एक काम हजारो-हजार उपदेशों से ज्यादा प्रभावी होता है।

 

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