गिरीश रघुनाथ कर्नाड नही रहे।  गिरीश कर्नाड एक बड़े नाटककार होने के साथ साथ बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक ओर कलाकार भी थे।  स्कूल के समय से ही थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था अपने एक संस्मरण में वो लिखते हैं,

, ”जब मैं 17 साल का था, तब मैंने आइरिस लेखक ‘सीन ओ कैसी’ की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने मुझे एक पत्र भेजा. पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैं यह सब करके अपना वक्त जाया न करूं, बल्कि कुछ ऐसा करूं, जिससे एक दिन लोग मेरा ऑटोग्राफ मांगे. ”

”मैंने पत्र पढ़कर ऐसा करना बंद कर दिया. मेरे माता-पिता दोनों की ही थियेटर में दिलचस्‍पी थी. मेरे पिता उस समय काम के सिलसिले में घूमते रहते थे. बाल गंधर्व के नाटक हों या मराठी थियेटर, उन दोनों की दिलचस्पी पूरी रहती थी. वे अक्सर थियेटर की बातें घर में किया करते थे. थियेटर कितना शानदार होता था, यह मैंने उन्हीं से सुना. इसके बाद मेरी इसमें रुचि बढ़ती गई. ”

गिरीश ने कन्नड़ भाषा में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज़ के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए।

गिरीश कर्नाड की नाट्य कृति ‘अग्नि और बरखा’ में अभिव्यक्त समकालीन प्रश्न’ नाम से असम की सुनैना देवी ने एक शोध किया है।  वह गिरीश कर्नाड के बारे में लिखती हैं , “कर्नाड का मानना है कि आधुनिक जीवन की विसंगतियों को आधुनिक परिस्थितियों में नहीं समझाया जा सकता; जिस तरह से भूतकाल (मिथक) के द्वारा भविष्य को दर्शाया जा सकता है। यही कारण है कि कर्नाड अपने नाटकों की पृष्ठभूमि भूतकाल यानि मिथक से ग्रहण करके अपनी अंत:दृष्टि से वर्तमान में लाकर भविष्य को उद्घाटित किया हैं। कर्नाड ने अपनी ज्ञान शक्ति के द्वारा भारतीय परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात किया। कर्नाड अपने नाटकों का पाठक/दर्शक वर्ग पर सशक्त वास्तविक, चिंतनशीलता का व्यापक रुप में प्रभाव छोड़ जाते हैं। ”

एक अदभुत कल्पनाशील लेखक/कलाकार को हमारा नमन !

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