लोकतंत्र का महापर्व यानी लोकसभा चुनाव 2019 जारी है। पूरा देश पाखंड और घमंड से भरपूर तमाशे रोज देख रहा है। पाखंड के वाहक केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दल हैं और घमंड के वाहक कांग्रेस व अन्य प्रतिपक्षी दल। चुनाव के वक्त राजनीतिक दल और उसके नेता एक घोषणा पत्र जारी करते हैं। घोषणा पत्र लोकतंत्र की गीता, कुरान, बाईबिल, गुरुग्रन्थ होती है। नेताओं द्वारा भाषण में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। वे सब जनता की अदालत में दिए गए उनके इकबालिया बयान होते हैं। जनता इन्हीं आधारों पर फैसला करती है। उसी से कोई भी सरकार बनती और बिगड़ती है।

मोदी सरकार ऐेसे ही वादे कर 2014 में आई थी। केन्द्र में आकर मोदी सरकार ने किए गए वादे भुला दिए। पिछले पांच वर्षों में हर दिन झूठ और पाखंड के साथ उलटे दोषारोपण का खेल चलता रहा है। साक्षी महाराज से लेकर अन्य कथित साधु-साध्वियों के मुद्दे विहीन देश तोड़क बयान लोकसभा-विधानसभा के अंदर-बाहर आते रहे हैं। कथित साध्वी प्रज्ञा द्वारा शहीद हेमन्त करकरे के लिए दिया गया बयान उसी परम्परा की कड़ी है। यह उनका पहला बयान नहीं है, इसके पूर्व भी वो शहीद करकरे के लिए ऐसे ही बयान देती रही हैं। मोदी के मन की असल बात साध्वी प्रज्ञा और उसके बयान ही हैं। भाजपा अपने इसी छद्म हिन्दुत्व को पिछले 5 वर्ष से अमलीजामा पहनाने में लगी रही है।

इन होने जा रहे चुनावों के पूर्व भाजपा 11 लोकसभा उपचुनाव और 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव हार चुकी थी। वो अपनी जमीनी हकीकत समझ चुकी थी। उसने तत्काल यूटर्न लिया। पंजाब में अकालियों की मनुहार कर ली, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे से माफी मांग ली। बिहार में नीतीश कुमार को 2014 में अपनी जीती हुई 23 लोकसभा सीटों में से 6 देकर खुद को 17 पर समेट लिया। भाजपा आजादी के बाद से पिछले 72 वर्षों में सब मिलाकर 12 वर्ष सत्ता में रही है। इसलिए उसमें घमंड कांग्रेस जितना नहीं है।

मोदी सरकार के पास किसान, बेरोजगार की बर्बादी, नोटबंदी, जीएसटी की बदहाली से आहत जनता का सामना करने का कोई रास्ता नहीं था। रॉफेल जहाज घोटाले में नरेन्द्र मोदी अनिल अंबानी गठबंधन ने देश के सामने पिछले पांच वर्षों से कार्पोरेट के लिए काम कर रहा मोदी सरकार का छुपा एजेंडा सामने ला दिया था। राहुल गांधी के चौकीदार चोर है का उत्तर मोदी और उनके समर्थकों के पास नहीं था। मोदी-मोदी का गान चोर-चोर में बदल गया था।

मोदी के 2014 के भाषणों को सुनें, वादों को याद करें। वे गुजरात के गुड गवर्नेंस, आईटी नौकरी की बहार, टाटा को एक मिनट में इंडस्ट्री से शुरू होकर कश्मीर, पाकिस्तान को ठीक कर देंगे, जैसे अनेकानेक सपने दिखा कर सत्ता में आए थे। राफेल जहाज से निकले भ्रष्टाचार के प्रदूषण ने मोदी सरकार का बचा चेहरा खराब कर दिया था। मोदी-शाह इससे अनजान नहीं थे। अचानक पुलवामा घटित हो गया। यह सरकार और उसके खुफिया तंत्र की विफलता थी। बदले में बालाकोट हुआ। क्या हुआ? नहीं हुआ? कितना हुआ? प्रश्न उठे, उत्तर सेना के मनोबल को गिराना देश के साथ गद्दारी थी। वैसे भी पिछले पांच वर्षों में हर किए गए प्रश्न का उत्तर मुसलमान, आतंकवादी और पाकिस्तान था, बालाकोट उस पर करेला और नीम चढ़ा बन गया। मोदी और उनके भक्तों ने बालाकोट का चोला धारण कर लिया। पुनः मोदी-मोदी उद्घोष शुरू कर दिया।

इस बार यह सब कुछ स्वाभाविक नहीं, वरन पाखंड दिख रहा है। इसे मोदी लहर का नाम दिया जा रहा है। हकीकत इससे उलट है, कमजोरी इसी से समझी जा सकता है कि जिस मीडिया को गोदी मीडिया में पहले ही बदला जा चुका था। उसे और मोदी और गोदी बनाकर चुनाव सेना और न्यूक्लियर बम के नाम पर लड़ा जा रहा है। पहले देश फिर पार्टी और अंत में भाजपा का यह घोषित स्वर है। अपने कर्म एवं आचरण से मौजूदा सरकार सिद्ध कर रही है कि देश के नाम पर सिर्फ खुद है। गुजरात में वोट डालने और बनारस में चुनाव नामांकन में तमाम कानून कायदे और आचार संहिता का स्वयं प्रधानमंत्री मोदी की सरेआम उल्लंघन करती तस्वीरें आने वाले कल के भारत की तकदीर बयां कर रही हैं।

कांग्रेस की जिम्मेदारी थी, सबल प्रतिपक्ष बनकर नीति, सिद्धांत, संयुक्त कार्यक्रम के साथ गठबंधन बनाकर देश के नाम घोषणा पत्र जारी कर चुनाव में उतरने की। गठबंधन पूरा बन न सका। एक तर्क दिया जाता है कि राहुल गांधी का नेतृत्व प्रादेशिक दलों को स्वीकार नहीं है। हकीकत इससे ठीक विपरीत थी। दिल्ली की छत्री लगाना हर प्रादेशिक नेता के लिए जरूरी है। सीबीआई, एक्साइज, इनकम टैक्स और सेना सब यहीं से चलती है। लोकतंत्र के सभी स्तंभों का दिल्ली ही मुख्य केन्द्र है।

कांग्रेस के राबर्ट वाड्रा, चिदंबरम, शशि थरूर आदि मोदी सरकार की सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग से परेशान थे। बिहार में तेजस्वी लालू यादव के बंद होने से, बंगाल से ममता बैनर्जी, आन्ध्र से चन्द्रबाबू नायडू, महाराष्ट्र से शरद पवार परेशान होकर एकता के लिए दिल्ली आते थे। आम आदमी पार्टी उसके हर काम में रुकावट और बदले से हरियाणा, गोवा, उत्तराखंड, कश्मीर, कर्नाटक, केरल आदि उनके यहां पर की जा रही गैर संवैधानिक कार्यवाहियों से परेशान थे। शरद यादव ने भाजपा की सरकार में केन्द्रीय मंत्री का पद ठुकराया, प्रतिपक्षीय दलों की एकता के लिए साझा विरासत के रूप में दिल्ली, इंदौर, मुम्बई, जयपुर में १८ प्रांतीय दलों को बुलाकर चुनाव पूर्व गठबन्धन बनाने का प्रयास किया। लेकिन छोटे-छोटे स्वार्थों और घमंड ने इन कोशिशों को अंजाम तक पहुंचने से रोक दिया।

कांग्रेस ने बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु में गठबंधन कर भाजपा विरोधी वोटों को बंटने से रोका है। वहीं उत्तरप्रदेश, प. बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि में गठबंधन नहीं करके भाजपा को मदद पहुंचाने की दिशा में योगदान दिया है। सपा, बसपा, रालोद ने गठबंधन कर भाजपा को हराने की दिशा में ठोस काम किया है। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को उतारा। शक्ल में वे इंदिरा गांधी की याद दिलाती हैं। उनकी बातचीत, भाषण परिपक्वता की पुष्टि करते हैं। वे पूरे देश में एक लहर बन सकती थीं। कांग्रेस ने आत्मघाती सेल्फ गोल कर उनका मुंह उत्तरप्रदेश की ओर मोदी विरोधी वोटों को बांटने के लिए कर दिया।

राहुल गांधी को पप्पू कहा जाता रहा, हकीकत में वे पागल हैं। हमारे देश में संघर्ष करने वाले व सत्ता को ठोकर मारने वाले को ऐसा ही कहा जाता है । वे चाहते तो मनमोहन सिंह के दस वर्षीय कार्यकाल में कभी भी प्रधानमंत्री बन सकते थे। उनका मजाक उड़ाने वाले यह नहीं समझ सके कि सत्ता की चाहत में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी का क्या हश्र हुआ है। आज वे पूरे देश में कहीं भी जाएं तो उन्हें लेने पच्चीस लोगों का भी पहुंचना मुश्किल है। मोदी जब प्रधानमंत्री नहीं होंगे तो दस लोग भी नहीं पहुंचेंगे। राहुल गांधी कहीं भी जाएं हजारों लोग उन्हें लेने आते हैं और आते रहेंगे। राहुल गांधी के इस फक्कड़पन में उनकी पार्टी के पुराने सत्ताभोगी, घमंडी नेताओं का तड़का लग गया।

कांग्रेस की 60 वर्षों की सत्ता के अवशेष अनेक पूर्व मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, केन्द्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जैसों के रूप में आज भी मौजूद हैं। इनके पास पुराने पद का उससे कमाए वैभव का गुरूर है, लेकिन ये सब जनता से दूर हैं। इसलिए जनता को जब जहां, जिस प्रांत में कांग्रेस का विकल्प मिला, वो उससे दूर हो गई। ये सब नाम बड़े और दर्शन खोटे थे। पिछले तीस-चालीस वर्षों में कांग्रेस जहां से भी बाहर हुई है लौटकर वापस जगह बनाना तो दूर और नए प्रांत खोती जा रही है।

कांग्रेस की सत्ता की खुमारी और घमंड किस तरह बरकार रहा, उसे सिर्फ एक बानगी से समझ सकते हैं। विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में 114 सीट आने पर 3 सीट बहुमत के लिए कम पड़ रही थीं। उसे अखिलेश यादव और मायावती याद आ गए, जिनसे उसने गठबंधन ठुकरा दिया था। दोनों ने समर्थन दे दिया। चार निर्दलीय विधायक भी जीते थे। वे कांग्रेस के ही बगावती थे। कांग्रेस ने उन्हें भी आधी रात को बुला लिया। जब मंत्रिमंडल बना तब ३२ मंत्री बनाए। ये सातों लापता थे। अखिलेश यादव का बयान आया धन्यवाद आपने हमारा मंत्री नहीं बनाया। सरकार बनाने वालों ने अखिलेश यादव से बात करना उचित नहीं समझा। कांग्रेस को चार माह बाद होने जा रहे लोकसभा चुनाव का कोई एहसास नहीं था।

इन चुनावों में कांग्रेस का तर्क है कि वो पार्टी बना रही है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में कोई भी विचार, धर्म, संगठन या व्यक्ति आगे बढ़ा है, स्थापित हुआ है तो उसका मूल तत्व त्याग था। राम ने गद्दी छोड़ी, कृष्ण कभी राजा नहीं बने, महावीर, बुद्ध ने राज्य त्यागा, ईसा सूली पर चढ़े, मोहम्मद ने कुर्बानी दी, बोहरा समाज के प्रथम धर्मगुरु आधी रोटी खाते थे। सिखों के धर्म गुरुओं ने शहादत का इतिहास रचा। शिवाजी, प्रताप सैकड़ों वर्षों बाद आज पूजे जाते हैं। कांग्रेसी गांधी आजादी की लड़ाई से निकले हैं। समाजवादी आजादी की लड़ाई और आजाद भारत में निखरे हैं। कम्युनिस्ट का आधार माक्र्स-लेनिन के विचार और मेहनतकश के पसीने की खुशबू है। भाजपा का मूल आधार हिन्दुत्व है। इसके मूल में भी त्याग-सेवा है। ये सब त्याग की भूमि पर बलिदान के बीज से तैयार हुए खेत की लहलहाती फसल हैं। यदि कांग्रेस ने राफेल के लिए जन आंदोलन किए होते, लाठी खाई होती और जेल यात्रा की होती तो आज देश उसके साथ होता। दुर्भाग्य कि लोकतंत्र की उम्र जितनी बढ़ रही है, सत्ता अधिक केन्द्रित होती जा रही है। वहीं प्रतिपक्ष जनता से नजदीकी नहीं बना पाता है। इसका सबसे बड़ा कारण महात्मा गांधी के सत्याग्रह की अवधारणा से सबका दूर हो जाना है।

सरकारी एजेंसियों के उत्पीड़न की वजह से कांग्रेस का कुछ प्रांतों में गठबंधन बना है। यदि भाजपा ने राबर्ट वाड्रा, केजरीवाल, रामगोपाल यादव या मायावती को जेल भेज दिया होता तो प्रतिपक्षीय गठबंधन तुरंत हो जाता। प्रतिपक्षीय गठबंधन दो ही स्थितियों में बनता है। पहली जनता की रूलाई, दूसरी प्रतिपक्षीय नेताओं की पिटाई। पांच साल जनता रोती रही, लेकिन प्रतिपक्षी पिटने से बचते रहे। धर्मनिरपेक्षता और आजादी की दुहाई देने वाले भाजपा विरोधी दलों ने साझा विरासत की टूट के इस दर्द को नहीं समझा। वे खुद की और पार्टी की सीटों में उलझे रहे। मोदी जो पांच वर्षों में ऊँचाईयों से उतरकर बौने हो गए थे, उनके सामने प्रतिपक्षी भी अपना कद ऊंचा नहीं कर सके, दोनों ही बौने रह गए।

भाजपा को लग रहा है कि उसे 325 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। कांग्रेस को लग रहा है मोदी सौ के अंदर हैं और वो अपने सहयोगियों के साथ पार है। सच यही है कि जो डुबोते हैं, वे खुद पार नहीं हो पाते हैं। हो भी जाएं तो डूबे ही कहलाते हैं। इस चुनाव में कोई पार नहीं हो सकेगा। भाजपा असफल है, वो पाखंड है। कांग्रेस प्रतिपक्षीय एकता से वंचित है, वो घमंड है। सबके चेहरे बेनूर हैं। जनता के चेहरे पर जो नूर लाएगा, उसी के चेहरे पर असल नूर आएगा। अभी तो बिखरी, बगैर बहुमत की संसद ही सामने आएगी। बाकी जनता-जनार्दन है।

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