वरिष्ठ सीपीआई नेता गुरूदास दासगुप्ता के निधन की खबर आई तो मुझे एक वाकया याद आ गया। शायद यह 2012 का साल था। उन दिनों मैं डेक्कन हेराल्ड अखबार में काम करता था। उनसे इंटरव्यू का समय लेने संसद भवन के सीपीआई कार्यालय में गया तो उन्होंने कहा कि वे तो कल ही कोलकता के लिए निकल रहे हैं। वहां से पटना जाएंगे। लौटने की तारीख दूर देख कर मैं निराश हो रहा था। उन्होंने कहा कि तुम कल एयरपोर्ट तक साथ चलो और रास्ते में इंटरव्यू कर लो। तय समय पर उनके पास पहुंच गया और साथ हो लिया। नई आर्थिक नीतियों, वामपंथी एकता और भ्रष्टाचार आदि पर उनसे बेबाक बातचीत हुई।
वह देश के जाने-माने ट्रेड यूनियन नेता थे और कई बार के सांसद भी। कम्युनिस्ट आंदोलन को उसके मजबूत दौर में देख चुके थे और यह ढलान का दौर है। फिर भी, कोई निराशा नहीं व्यक्त कर रहे थे। चश्मे के उस पार से झांकती उन आंखों में एक स्वप्न जरूर दिखाई देता था! वह संसद में अपने भाषण और टिप्पणियों लिए मशहूर थे।
इंटरव्यू की इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण दौर तब आया जब वह एयरपोर्ट पर उतरे और ड्राइवर से पूछा कि कामरेड इसके बाद आपकी कहां की ड्यूटी है। उन्होंने पूछा कि क्या वह मुझे मेरे दफ्तर छोड़ सकता है? उसने साफ मना कर दिया। मैं चौंका कि अपनी गाड़ी के ड्राइवर से इस तरह क्यों पूछ रहे हैं? आदेश क्यों नहीं दे रहे हैं? मैं ने सोचा कि रास्ते में कहीं उतार देगा तो आसान रहेगा क्यांंकि एयरपोर्ट के टैक्सी वाले अनाप-शनाप भाड़ा मांगेंगे। ड्राइवर मान गया।
रास्ते में ड्राइवर से पता चला कि गाड़ी पार्टी के लिए है और कामरेड गुरूदास को कहीं जाना होता है तो उन्हें बताना पड़ता है। उस दिन उसे किसी और कार्यक्रम के लिए तैनात किया गया था। वह उनके कहने से अपना कार्यक्रम नहीं बदल सकता था। उसी ने बताया कि संसद के रूप में मिलने वाला पूरा वेतन पार्टी के कोष में जाता था और उन्हें अपना मानधन पार्टी से लेना पड़ता था। सांसद बनने से उनकी तिजौरी में कुछ नहीं जाता था। कई बार के सांसद तथा देश के अग्रणी ट्रेड यूनियन नेता के अधिकार में एक कार तक नहीं थी! बाकी पार्टियों के पार्षदों और विधायकों की हैसियत देखते बनती है।
गुरूदास दासगुप्ता उसी कम्युनिस्ट पार्टी से निकले थे जिसे एक समय संसद में विश्वास नहीं था। जब आप गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट जन-प्रतिनिधियों पर नजर डालेंगे तो भारतीय संसदीय इतिहास के बारे में आपकी समझ बदल जाएगी। उन्होंने अपनी ईमानदारी और संसदीय क्षमता से देश की राजनीति को समृद्ध किया। हीरेन मुखर्जी, मधुलिमये, नाथ पै, सोमनाथ चटर्जी से लेकर गुरूदास दासगुप्ता तक एक लंबी सूची है। उन्होंने संविधान की शपथ ले ली तो इसे निभाया। उन्हें सत्ता का लोभ नहीं था और न जीवन के ऐशो-आराम की कोई ख्वाहिश। क्या उनकी तुलना ऐसे लोगों से हो सकती है जो संविधान की शपथ लेते हैं और उसे बेशर्मी से तोड़ देते हैं ? क्या उनकी तुलना उनसे हो सकती है जो ईमानदारी की बात करते हैं और विलासिता का जीवन जीते हैं?
कामरेड दासगुप्ता को नमन!

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