आजाद भारत में पहली बार किसी सरकार ने कारपोरेट के पक्ष में खड़े होने की खुली घोषणा की है। पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने में पहले की सरकारें भी पीछे नहीं रही हैं, लेकिन बजट- भाषण में भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके योगदान के प्रशंसा-गीत गाने की हिम्मत किसी को नहीं हुई थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट-भाषण में साफ बता दिया है कि यह सरकार कारपोरेट हितों की रक्षा के लिए बनी है और यह काम वह बिना किसी हिचक के करेगी। सीतारमण ने अपने भाषण की शुरआत में ही बता दिया कि देश की तरक्की में  कारपोरेट का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने भारतीय कारपोरेट को संपत्ति का सृजन करने वाला और रोजगार देने वाला बताया। वित्त मंत्री ने कहा कि वैध तरीके से मुनाफा कमाने के वे नीची नजर से नहीं देखते। उन्होंने कहा कि वे देशी-विदशी निवेश के एक पवित्र चक्र की शुरूआत करने के लिए कई पहलों का प्रस्ताव कर रही हैं। उन्होंने देश के सार्वजनिक क्षेत्रों को कोई वाह-वाही नहीं दी जिसने अंग्रेजों की लूट के बाद  कंगाल हो गए भारत की अर्थ-व्यवस्था को संवारा और इस देश को आत्म-विश्वास से भरा।  उल्टे वित्त मंत्री ने भारत की आजादी को मुकम्मल करने वाली उन आर्थिक नीतियों को कोटा-लाइसेंस राज कह कर गालियां दी जिसने इस देश को ज्ञान-विज्ञान से लेकर टेक्नोलौजी में इतना आत्मनिर्भर बनाया कि यूरोप-अमेरिका के असहयोग के बावजूद परमाणु ऊर्जा से लेकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतना आगे बढा दिया है कि वह दुनिया के किसी भी मुल्क से होड़ ले सकता है। दिलचस्प तो यह है कि इन्हीं सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेच कर सरकार उस घाटे को पूरा करने की कोशिश कर रही है जो मेहुल चौकसी और नीरव जैन जैसों की लूट से खस्ता हाल बैंकों के कारण सरकार को उठाना पड़ रहा है।
मोदी सरकार की नजर में वैध कमाई क्या है और कारपोरेट की देश की भागीदारी में तरक्की का क्या मतलब है? इसे अडानी को देश के लाभ कमाने वाले तीन हवाई अड्डों को सौंपने से लेकर जियो को चलाने के लिए सरकारी कंपनी बीएसएनएल को डुबोने के काम में देखा जा सकता है। आजाद भारत में जितने बड़े-बड़े घोटाले उदारीकरण वाली आर्थिक नीतियां के दौर में हुए, उतने बड़े घोटाले कोटा-लाइसेंस राज में नहीं हुए थे।
आंकड़ों को छिपाने और जरूरी आर्थिक मुद्दों को हल करने में विफल इस बजट को असली उद्देश्यों का पहचानना मुश्किल नहीं है। वित्त मंत्री सिर्फ ‘देशी-विदेशी निवेश का पवित्र चक्र’ शुरू करना नहीं चाहती हैं बल्कि संसाधनों की लूट को बेलगाम करना चाहती हैं। यह लूट बैंकों से शुरू होती है। बजट पिछले बजट समय बैंकों का सात लाख 35 हजार करोड़ रूपए का कर्ज पचा लेने वाले उद्योगपतियों से इसे वसूलने के उपायों पर खामोश है। इसके बदले इसने कारपोरेट टैक्स को 35 प्रतिशत से 25 प्रतिशत कर 99.3 प्रतिशत कंपनियों को 10 प्रतिशत टैक्स कम देने  लाभ दे दिया है। इससे हजारों करोड़ का नुकसान सरकार को होगा। बजट में महज दिखावे के लिए ढाई करोड़ से ज्यादा कमाने वालों के आयकर पर सेस लगा दिया गया है।
एयर इंडिया समेत बाकी सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने के अलावा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के बहाने मादी सरकार देश भर में फैली सरकारी जमीनों को निजी कंपनियों के हवाले करने की व्यवस्था कर रही है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, जल मार्ग, सड़कों और बदंरगाह को उनके हवाले करने का काम पहले से चल रहा है। इस बजट में इन कामों को और भी तेज करने का इंतजाम किया गया है। देश के बाकी संसाधनों की तरह ही इस बजट में अंतरिक्ष के क्षेत्र में हासिल ज्ञान की लूट का रास्ता खोल दिया गया है। इसके लिए एक सरकारी कपंनी बनाने का प्रस्ताव इस बजट में किया गया है जिसे इस  ज्ञान को बाजार में बेचने का जिम्मा सौंपा जाएगा। अंतरिक्ष क्ष्ोंत्र में हुए अनुसंधानों का बाजारी लाभ लेने के लिए कई देशी-विदेशी कंपनियां लंबे समय से लालायित हैं। उन्हें अनुसंधान में एक पैसा लगाए बगैर इसका लाभ मिल जाएगा। विदेशी कंपनियों की ओर से देश के पारंपरिक ज्ञान की चोरी की ख्ुली छूट सरकार ने पहले से ही दे रखी है। अब तो हाल यह है कि नीम या हल्दी जैसी औषधियों के उपयोग के विदेशों में हो रहे पेटेंट के खिलाफ सरकार कोई कदम नहीं उठाती है।
पिछले 45 बरसों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाले इस दौर में सरकार  मेक इन इंडिया का नारा देने के अलावा क्या कर रही है? इस बजट में भी उसी नारे को दोहराया गया है। सच्चाई यह है कि यह सरकार रक्षा उत्पादन से लेकर रेल के डिब्बे भी आयात कर रही है। रेल कारखानों और आर्डिनेंस कारखानों में उनकी क्षमता से कम काम हो रहा है और इसका असर देश की उत्पादन क्षमता पर पड़ रहा है। अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए रफाल की टेक्नोलौजी लेने से हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड को रोकने और ्बने-बनाए लड़ाकू विमान खरीदने का किस्सा तो लोगों को मालूम ही है। रेलवे से लेकर अन्य क्षेत्रों के  अनुसंधान केंद्रों को अपंग बना दिया गया है।
दूसरी ओर, देश को प्रकुति ने जो संपत्ति सौंपी है और जिसे यहां की जनता ने अपनी मेहनत से खड़ी की है, उसे छीन कर कारपोरेट के हाथों में सौंपने के बदले में मोदी सरकार जनता को क्या दे रही है? उसने गरीब और वंचितों के लिए खर्च करने से लगभग मना कर दिया है। औरतों पर होने वाले खर्च को घटा दिया गया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण पर होने वाले खर्च में मामूली बढोतरी की गई है। अल्पसंख्यकों पर  होने वाला खर्च ज्यों का त्यों है और मनरेगा पर होने वाले खर्च में इस साल 1000 करोड़ रूपए की कटौती कर दी गई है। शिक्षा और स्वास्थ्य के खर्च में भी कोई बड़ी बढोतरी नहीं हुई है।
यह बजट उन लोगों को खुली चुनौती है जो संसाधनों पर लोगों का हक मानते हैं। यह उन लोगों को खुली चुनौती है जो मानते हैं कि भारतीय  नागरिकों के टैक्स के पैसे से खड़ी हुई संपत्ति को बेचना अपराध हैं।  क्या लोगों ने प्राइवेट सेक्टर को देश की संपत्ति सौंपने के लिए वोट दिया है?
यह बजट आजादी की विचारधारा  पर हमले का हिस्सा है। आजादी के लिए लड़ने वालों ने वायदा किया था कि देश की संपत्ति जल, जमीन और जंगल पर लोगों का अधिकार होगा। हर पेट को भरपेट जीवन, हर तन को कपड़ा और हर सिर को छत का वायदा किया गया था। इसमें यह वायदा भी किया गया था कि लोगों की आमदनी में ज्यादा अंतर नहीं होगा-यानि एक समाजवादी किस्म का समाज बनाया जायगा। यह बजट इस विचार को सिरे से खारिज करता है और देश की अर्थव्यवस्था को पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यस्था बनाने का सपना बेच रहा है? क्या भारत का सपना यही था? गांधी जी ने उपभोग और विलासिता के जीवन के बदले सादगी भरे जीवन का दर्शन दुनिया के सामने रखा था। उन्हें हाथ से काम करने की संस्कृति और विकेंद्रित उद्योगां की वकालत की थी। आज भी कुटीर और लघु उद्योग ही देश में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा कर रहे हैं। आजाद भारत की सरकारें इससे हटती गईं और अंत में गांधी के सपने को त्याग दिया गया।  अांबेडकर, नेहरू, जेपी, लोहिया से लेकर देश के सभी बड़े नेताओं ने लोगों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने और बराबरी लाने के सपना पाला था। उस सपने को उदारीकरण की अर्थव्यवस्था ने नष्ट कर दिया है। सूटकेस की जगह लाल कपड़े और बजट की जगह बही-खाते का नाम लेकर  राष्ट्रवाद का दिखावा किया जा रहा है और विदेशी कंपनियों को संसाधन लूटने की खुली छूट दी जा रही है।
इस राष्ट्रवाद का कुपोषण, भुखमरी, बीमारी और बेरोजगारी से लड़ने का कोई इरादा नहीं है। इस राष्ट्रवाद को इससे कोई मतलब नहीं है कि दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों की आधी संख्या भारत में है और दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चे इसी देश में मरते हैं। हम भुखमरी में 119 देशो में 103 वें स्थान पर हैं और पड़ोसी देशों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान को छोड़ कर सभी हमसे बेहतर स्थिति में है। देश का सपना ज्यादा सड़़कों और ज्यादा मोटर गाड़ियों  का हो या  भुखमरी, कुपोषण, बीमारी और अशिक्षा से लड़ने का ?
लेकिन इस बजट के जरिए मोदी सरकार-दो ने भारतीय चिंतनधारा और गाँधी के सपनों पर चौतरफा हमला किया है। इसके लिए उसने कई झूठ भी बोले हैं। वित्त मंत्री ने अप्रैल , 2018 से चल रही स्टडी इन इंडिया की स्कीम को अपनी नई योजना बता दी है। उन्होंने यह दावा किया कि भारत दुनिया में छठे नबर की अर्थव्यवस्था बन गई है, लेकिन यह बताना भूल गईं कि 1964 में ही भारत सातवें स्थान पर पहुंच गया था। इसके अलावा बजट में फरवरी, 2019 के आंकड़े ज्यों के त्यों  रख दिए  हैं और पिछले साल हुयी वास्तविक आमदनी और किये गए खर्च को छिपा लिया।  बजट में ऐसे झूठ कभी नहीं बोले गए क्योंकि इस दस्तावेज की पवित्रता मे पहले की सरकारों का विश्वास था। यह सरकार सभी संस्थाओें की पवित्रता को नष्ट करने में लगी है।
क्या कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियां भारतीय चिंतनधारा पर इस हमले से लड़ने के लिए तैयार हैं? इसका उत्तर  ‘नहीं’ में  आएगा। कांग्रेस ने पी िंचदंबरम को बजट पर हमले के लिए लगाया। वह उदारीकरण की उन सारी नीतियों को बनाने वालों में से हैं जिन पर ये सरकार चल रही है। उनका आरोप था कि विदेशी निवेश बढाने के विवरण नहीं दिए गए हैं। देश की सभी पार्टियां तेजी से सड़क बनाना चाहती हैं, देश का संसाधन बेचना चाहती हैं ताकि उन्हें इससे होने वाली कमाई में हिस्सा मिल सके। किसी को भूख से मरने वाले बच्चों और आत्महत्या कर रहे किसानों की चिंता नहीं है। सच्चे समाजवादी और वामपंथी इस हमले को लेकर जरूर चिंतित दिखाई देते हैं।

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