आज़ अब पूरा विश्व महात्मा गांधी की एक सौ पचासवीं सालगिरह मना रहा है उसी वर्ष युद्ध और हिंसा का महिमा मंडन कितना आडम्बर पूर्ण और दुखद  है? एयर स्ट्राइक की कार्रवाई देखकर सीधे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार देना , क्या यह गांधी मूल्य की प्रतिष्ठा है? आज़ अहिंसा सत्याग्रह की कोई बात नहीं करता। सत्याग्रह कितना बड़ा शस्त्र है इसे भारत ही नहीं पूरी दुनिया ने देखा, समझा, अपनाया और सराहा है।  दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद और स्वतंत्रता  आन्दोलन अहिंसात्मक मूल्यों पर लड़ा गया।  भारत को छोड़ कर दुनिया के लगभग अधिकांश देश अहिंसा के मूल्य व महत्त्व को समझ रहे हैं। यहां मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियां तक युद्धोंन्माद बढ़ा रही हैं। चुनाव जीतने के लोभ में कोई भी दल अहिंसात्मक तरीके से बात -चीत करने पर बल नहीं दे रहा है।
दरअसल अहिंसा और सत्याग्रह पर अमल करने के लिए हिंसा करने वालों से बड़े साहस की जरूरत  होती है। अहिंसक सत्याग्रही शुरू में हारते हुए दिखते हैं , पिटते हुए दिखते हैं, पर धीरे-धीरे सूर्य की तरह वे हिंसा रूपी अंधेरे को समाप्त कर देते हैं। गांधी , गफ्फार खान, नेल्सन मंडेला,  मार्टिन लूथर किंग , विनोबा, सुब्बाराव , जे पी, सुंदर लाल बहुगुणा, बाबा आमटे, चंडी प्रसाद भट्ट ,  आदि ने अहिंसा और सत्याग्रह की अहमियत, जरूरत और प्रसांगिकता को अपने क्रियात्मक व्यवहार से  बार-बार सिद्ध ही नहीं किया ,बल्कि उसे ग्राह्य व प्रतिष्ठित बनाया। क्रांतिकारी भगत सिंह ने भी अपने एक लेख में हिंसा का तीव्र विरोध किया था और अहिंसा के महत्त्व को रेखांकित किया था। आज़ हमें हर प्लेटफार्म पर अहिंसा व सत्याग्रह की पुरजोर बात करनी चाहिए। वास्तव में अहिंसा व सत्याग्रह जीवन के   उच्चतम सांस्कृतिक  मूल्य हैं। हिंसा  पिछड़े  समाज का किसी भी समस्या के समाधान का जड़ व क्रूर तरीका है।
 अहिंसा व सत्याग्रह सांस्कृतिक रूप से उन्नत समाज का अचूक , अमोघ और अशेष शस्त्र है। यहां भौतिक बल की जरूरत नहीं होती है ,इस के लिए नैतिक बल की आवश्यकता  होती है , जाहिर है आज़ पूरे समाज में नैतिक बल का क्षरण ही नहीं हुआ बल्कि धीरे-धीरे लोप भी हो रहा है।  ऐसे में कौन करे सत्याग्रह और अहिंसा की बात!!! हां गांधी की बात करना , सम्मान देना व सम्मान लेना बड़ा आसान है। दूसरी बात अहिंसा व सत्याग्रह व्यक्तिगत लोभ -लाभ और यश  के लिए नहीं किया जाता, उसके पीछे असंख्य जन की मंगलकामनाएं सक्रिय रहतीं हैं। असंख्य जन-गण का कल्याण ही उसका प्रेरक तत्व है,हर तरह के अशुभ , अन्याय , अत्याचार , जिसमें व्यक्तिगत हित और यश भी शामिल है का विरोध करना सत्याग्रह का अभीष्ट है। यहां जय-पराजय का क्षणिक खेल नहीं होता, यहां होता है भविष्य के समाज को सत्य और अहिंसा से परिपक्व करना , उसे इन मूल्यों से मंडित करना। हम क्षणिक यश , लाभ-लोभ से मुक्त हो कर जीवन व समाज को अहिंसक व सत्यमुखी बनाने को तैयार है ?? वास्तव में गांधी की एक सौ पचासवीं वर्षगांठ पर हमारा यही कार्य भार व नैतिक दायित्व है।

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