प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी का महात्मा गांधी से वैचारिक लड़ाई कोई नई बात नहीं है। गांधी जी को सफाई इंस्पेक्टर बना देने का काम मोदी-एक के कार्यकाल में बखूबी हुआ है। मोदी-2 में यह जारी रहेगा, यह तय है। आजादी दिवस के दिन लाल किले के प्राचीर से दिए गए भाषण में मोदी ने प्लास्टिक कचरे से मुक्ति के अभियान को गांधी जयंती के दिन शुरू करने की घोषणा की है। ऊपर से निर्दोष दिखने वाली इस घोषणा को प्रधानमंत्री और भाजपा के बाकी कार्यक्रमों से अलग नहीं देखना चाहिए। इसके राजनीतिक संदर्भ को समझे बिना हम उस वैचारिक मुठभेड़ को नहीं समझ सकते हैं जो आरएसएस और गांधी जी के बीच लगातार जारी है। जवाहर लाल नेहरू से संघ सीधी लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन गांधी जी से यह लड़ाई छिपे ढंग से हो रही है।
इसमें कोई शक नहीं कि प्लास्टिक प्रदूषण पर्यावरण के लिए अत्यंत नुकसानदेह है। एक बार उपयोग में आने वाला प्लास्टिक पूरे प्लास्टिक प्रदूषण का 70 प्रतिशत है। दुनिया में चीन की यांगत्जी नदी सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा ढोती है । इसके बाद अपनी पवित्र गंगा नदी का नंबर आता है। देश के कई हिस्सों में दिखाई देने वाले कचरे के पहाड़ों का बड़ा हिस्सा इन्हीं प्लास्टिक कचरे से बना होता है। इससे मुक्ति पाना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन उनसे मुक्ति पाने का क्या यही तरीका है कि आप लोगों से इसे उपयोग में लाने से मना करें, लेकिन इसके उत्पादन पर कोई रोक नहीं लगाएं? यह नीति निरर्थक है इसका अंदाजा गलियों में चल रही प्लास्टिक थैलियों को देख कर हेता है। यह पुलिस की अतिरिक्त कमाई का जरिया बन गया है।
इन चीजों से गांधी जी को जोड़ने का क्या अर्थ है? क्या गांधी जी की प्राथमिकता गांव में शौचालय बनाने और सडक का कचरा साफ करने की थी? स्वच्छता को जिस तरह गांधी जी के अभियान को जोड़ा जा रहा है वह भी एक राजनीतिक साजिश है। गांधी जी सादगी और परस्पर सहयोग वाले जीवन जीने की शैली अपनाने पर जोर देते थे। सफाई के उनके अभियान का सामाजिक अर्थ था। एक तो यह बीमारी से मुक्त रहने और खेती को फायदा पहुंचाने के लिए था और दूसरा, वह श्रम से जोड़ कर जाति व्यवस्था से आए छुआछूत जैसे रोगां के खिलाफ इसका इस्तेमाल करना चाहते थे। गांधी जी के विचारों पर अमल करने का मतलब है कि प्लास्टिक संस्कृति और उपभोक्ता संस्कृति पर हमला। क्या मोदी सरकार इसके लिए तैयार है? विकास के नाम पर बेछूट उपभोग और ऐय्याशी को बढावा देने वाली सरकार से ऐसी उम्मीद करना भी निरर्थक है। गांधी जी के विचारां में सभ्यता की एक पूरी दृष्टि है। इसमें बड़ी मशीनों से उत्पादन का निषेध है और हाथ से बने उत्पादनों पर आधारित आर्थिक संस्कृति को विकसित करने की बात है। गांधी जी सिर्फ अपने आसपास के कचरे को साफ करने में ही विश्वास नहीं करते थे, वे सभ्यता को उस कचरे से मुक्त करना चाहते थे जिसे पूंजीवाद और उपनिवेशवाद ने दिया है। गांधी जी को घरों में शौचालय और सड़कों पर झाड़ू लगाने के अभियानों से जोड़ना एक राजनीतिक अन्याय है। यह गांधी को संदर्भ से काटने का अभियान है। यह काम पहले की सरकारें भी करती रही हैं। लेकिन उन्होंने यह काम अपनी राजनीतिक मजतबूरियों में किया ताकि वे अमीरों के पक्ष में आर्थिक नीतियां बना सकें। उदारीकरण की नीति के बाद ऐसे अभियानों में तेजी आई क्योंकि गांधी जी के स्वदेशी के विचार उदारीकरण की नीति से सीधे टकराते हैं। भाजपा या संघ परिवार वाले सिर्फ कारपोरेट के फायदे के लिए गांधी जी के विचारों पर वार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं।
गांधी जी के विचारों के प्रति भारतीय जनता पार्टी या मोदी सरकार का कितना आकर्षण है यह उनकी बाकी नीतियों से भी स्पष्ट होता है। सबसे ताजा उदाहरण कश्मीर है। क्या गांधी जी कश्मीर में बिना संवाद के जरिए धारा 370 के प्रावधानों और धारा 35ए को खत्म करने के फैसले का समर्थन करते? आखिकार जिस इलाके के नौजवान आतंकवाद का प्रशिक्षण पाने सरहद पार चले जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां उनकी बात सुनी नहीं जाएगी और जहां के लोग लगातार सेना और प्रशासन से टकराते रहते हैं, वहां लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को शून्य कर देने के पीछे कौन सी सोच हो सकती है? हमें इस सोच को समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि इसमें संवाद की जगह दमन को महत्व है। कश्मीर में जो कुछ किया गया है वह इसी सोच को दर्शाता है। सैन्यवाद की वकालत हिंदुत्ववादियों ने आजादी की लड़ाई के समय भी की थी। जब देश अंग्रेजों के साथ जंग कर रहा था, हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे ने अंग्रेजों की मदद के लिए सैनिक स्कूल खोला था। अंग्रेज वैसे तो मुसोलिनी और फासीवाद के खिलाफ लड़ रहे थे, लेकिन यहां मुसोलिनी से प्रभावित डा मुंजे से सहयेग कर रहे थे और सहयोग ले रहे थे। आजादी के आंदोलन की सोच को मिटाने में लगी सरकार किस तरह सैन्यवाद को विकसित करना चाहती है, यह प्रधानमंत्री मोदी के लालकिले के संबोधन में भी दिखाई देता है। चीफ आफ डिफेंस स्टाफ के पद का सृजन इसी का एक उदाहरण है। इस पद के बारे में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी चर्चा हुई थी और एक अत्यंत शक्तिशाली सैन्य अधिकारी के विचार को भारतीय लोकतंत्र की जरूरतों के प्रतिकूल माना गया था।
गांधी जी के विचारों के खिलाफ चल रही लड़ाई का दूसरा उदाहरण है बढती भीड़-हिंसा के खिलाफ सरकार की खामोशी। यह खामोशी लालकिले से मोदी के संबोधन में भी दिखी। देश में मॉब लिचिंग की बढती घटनाओं को लेकर प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। पहलू खान के मामले में आए अदालती फैसले ने भी इस बात पर मुहर लगा दी कि पुलिस और प्रशासन इसके प्रति पूरी तरह असंवेदनशील है। ऊपर से लेकर नीचे तक का प्रशासन एक मौन सहमति दे रहा है।
गांधी के विचारों को प्लास्टिक की थैली में बंद करने के बदले सभ्यता के कचरे को साफ करने के अभियान को अपनाने की जरूरत है। कारपोरेट को फायदा पहुंचाने या उसे नहीं छूने की नीति से प्लास्टिक क्या प्रकृति और जीवन का कोई कचरा साफ नहीं हो सकता। गांधी जी ने नई जीवन शैली की पूरी तस्वीर रखी थी जिसमें हाथ से बने सामान के उपयेग और प्रकृति से जितना मिले उतना ही लेने की सलाह है। अगर हम उन विचारों की ओर लौट नहीं सकते तो हमें गांधी जी के विचारों के साथ मजाक भी नहीं करना चाहिए।

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