राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कथित विचारक और अन्य अंधराष्ट्रवादी जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमन्त्री और शेरे कश्मीर के बेटे फारुक अब्दुल्ला की कटु आलोचना करते रहते हैं और उनकी देशभक्ति पर अक्सर सन्देह व्यक्त करते हैं। जबकि मैं उन्हें इन सब कथित राष्ट्रवादियों से बड़ा देशभक्त मानता रहा हूं। लेकिन मुझे अपनी बात प्रमाणित करने के लिये अभी तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल रहा था। अब जाकर मुझे एक ठोस प्रमाण मिला है, जिसका उल्लेख मैं साझा करना आवश्यक समझ रहा हूं।

केंद्र में जब अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब 24 दिसम्बर 1999 को कुछ विमान अपहरणकर्ताओं ने इंडियन एअर लाइंस का काठमांडू से दिल्ली आ रहे विमान आईसी-814 का अपहरण कर लिया था। इस विमान में 184 यात्री तथा क्रु सदस्य थे। विमान को पहले चंडीगढ़ ले जाया गया, वहां से पहले लाहौर फिर दुबई तथा अंत में कंधार (अफगानिस्तान) ले जाया गया था। उस समय की सरकार की सबसे बड़ी असफलता यह थी कि जब अपह्रत (हाईजैक) विमान में चंडीगढ़ में ईंधन भरा गया तब कमांडोज़ से छापामार कार्रवाई करवा कर अपहरणकर्ताओं (हाईजैकर्स) को पकड़ने का कोई प्रयास नहीं किया गया। विमान चंडीगढ़ से ईंधन भरवा कर वहां से लाहौर चला गया जहां अपहरणकर्ताओं को आईएसआई द्वारा हथियार उपलब्ध कराए गए। पाकिस्तान में उस समय जनरल मुशर्रफ सेनाध्यक्ष थे जिन्होंने कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ करायी थी। यह विमान अपहरण कारगिल युद्ध के बाद ही हुआ था।

भारत सरकार ने दुबई एअरपोर्ट पर छापामार कार्रवाई करने के बारे में विचार किया था, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात की सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी। इसके बाद कंधार में अपहर्ताओं से छह दिन की लम्बी सौदेबाजी के बाद विमान यात्रियों के बदले में तीन प्रमुख आतंकवादियों को मुक्त करने का समझौता हुआ। अपहर्ताओं से सौदेबाजी करने वाली इस टीम के मुख्य सदस्य वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोबाल थे। ये तीन आतंकवादी थे – 1. मौलाना मसूद अजहर 2. अहमद उमर सईद शेख और 3. मुश्ताक अहमद जरगर। मसूद अजहर और मुश्ताक अहमद जरगर जम्मू-कश्मीर की जेलों में बन्द थे तथा उमर शेख दिल्ली की तिहाड़ जेल में बन्द था। दो आतंकवादियों को लाने के लिये रॉ (RAW) के तत्कालीन प्रमुख एएस दुलत को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला की सहमति लेने के लिये श्रीनगर भेजा गया। इस आलेख की मुख्य बात यहीं से शुरू होती है। यह प्रसंग पूर्व रॉ प्रमुख दुलत की किताब “द स्पाई क्रॉनिकल्स : रॉ, आईएसआई एंड द इल्यूज़न ऑफ पीस” से ही लिया गया है।

 

एएस दुलत की किताब का वह अंश दिया गया है जिसके आधार पर यह आलेख लिखा गया है।

एएस दुलत ने जब श्रीनगर में फारुक अब्दुल्ला से मुलाकात की तो वे यह जानकर कि भारत सरकार ने तीन प्रमुख आतंकवादियों को छोड़ने का फैसला लिया है, अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाए। यहां तक कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तक देने के लिये तैयार हो गए। उन्होंने तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंतसिंह को फोन कर साफ कहा कि “आप गलत कर रहे हैं।” अंत में उन्होंने साफ कहा, “वह दो हरामी पाकिस्तानी (मसूद अजहर और उमर शेख), या वह जो कोई हों, मैं उनकी परवाह नहीं करता। भाड़ में जाएं। लेकिन मैं इस कश्मीरी ( जरगर) को नहीं जाने दूंगा।” फारूक अब्दुल्ला, मुश्ताक जरगर को इसलिये नहीं छोड़ना चाहते थे, क्योंकि वह 40 कश्मीरी पंडितों की हत्या का गुनहगार था और वे उसे फांसी पर लटकाना चाहते थे।

बहरहाल…. फारुक अब्दुल्ला अपना इस्तीफा लेकर राज्यपाल गिरीशचन्द्र सक्सेना उर्फ गैरी सक्सेना (पूर्व रॉ प्रमुख) से मिलने चले गए। अंततः गैरी सक्सेना के बहुत समझाने के बाद वे माने। हम यह जानते हैं कि इन तीन आतंकवादियों को छोड़ने का भारत और कश्मीर की जनता को कितना बड़ा खामियाजा चुकाना पड़ा है। इन्हीं में से एक मसूद अज़हर ने ही ‘जैश ए मोहम्मद’ जैसा खूंखार आतंकवादी संगठन बनाया जो भारत और कश्मीर में अधिकांश आतंकवादी घटनाओं के लिये जिम्मेदार है। दिल्ली में संसद भवन से लेकर पठानकोट, उरी तथा पुलवामा की आतंकवादी घटनाएं इसी संगठन की कारस्तानियां हैं। यदि उस समय फारुख अब्दुल्ला की बात मान कर भारत सरकार ने आतंकवादियों को छोड़ने के बजाय यात्रियों को छुड़ाने का कोई और रास्ता अपनाया होता तो शायद सन 2000 से लेकर 2019 तक हमें अपने सैकड़ों जवानों और निर्दोष नागरिकों की जान से हाथ नहीं धोना पड़ता।

हमारे लिये यह खुशी की बात है भारतीय वायु सेना की एअर स्ट्राइक में जैश कमांडर और मसूद अजहर का साला यूसुफ अजहर नामका आतंकवादी मारा गया है। वह बालाकोट के जैश के सबसे बड़े ट्रेनिंग कैम्प को संचालित कर रहा था। यह यूसुफ अजहर ही वह आतंकवादी था जिसने 1999 में एयर इंडिया के विमान का अपहरण किया था। इसके अलावा मसूद अजहर का बड़ा भाई और उसके परिवार के अन्य सदस्य भी एअर स्ट्राईक में मारे गए हैं। यह हमारी सेना की बहुत बड़ी उपलब्धि है।

एएस दुलत की किताब का वह अंश दिया गया है जिसके आधार पर यह आलेख लिखा गया है।

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