लोकसभा चुनाव के लिए मतदान सिलसिला खत्म होने के साथ ही सभी राजनीतिक दलों, और उम्मीदवारों का भविष्य तथा उससे भी ज्यादा देश का भविष्य इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और वीवीपैट की पर्चियों में बंद हो चुका है। अब नतीजों का इंतजार है। लेकिन एग्जिट पोल के आए नतीजों पर भरोसा किया जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और उसके गठबंधन एनडीए को भारी-भरकम बहुमत के साथ जीत हासिल होने जा रही है। एग्जिट पोल्स के अनुमानों से भाजपा गदगदायमान है। उसका ऐसा होना स्वाभाविक ही है। लेकिन विपक्षी दलों ने इन अनुमानों को सिरे खारिज कर दिया है।

हालांकि कई राजनीतिक और चुनाव विश्लेषकों का भी मानना है कि चुनाव के वास्तविक नतीजों में भाजपा ही सबसे बडी पार्टी और एनडीए ही सबसे बडे गठबंधन के रूप में उभरकर आएगा, लेकिन वे एग्जिट पोल्स के नतीजों को पूरी तरह गले नहीं उतार पा रहे हैं। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी वरिष्ठ नेता रहे उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी कह रहे हैं कि पिछले 20 सालों से एग्जिट पोल्स के अनुमान गलत साबित होते आ रहे हैं, लिहाजा अभी जो एग्जिट पोल्स नतीजे आए हैं, उन पर भरोसा न करते हुए हमें 23 मई को आने वाले वास्तविक नतीजों का इंतजार करना चाहिए। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी इससे मिलती जुलती ही बात कही है।

दरअसल एग्जिट पोल्स पर संदेह करने की कई ठोस वजहें मौजूद इसके पीछे ठोस वजह भी है। दरअसल हमारे देश में जब से एग्जिट पोल का चलन शुरू हुआ तब से लेकर अब तक एग्जिट पोल के सबसे सटीक नतीजे सिर्फ 1984 के आम चुनाव में ही रहे। अन्यथा तो लगभग हमेशा ही वास्तविक नतीजे एग्जिट पोल के अनुमानों से हटकर रहे हैं। इस सिलसिले में पिछले दो दशक के दौरान हुए तमाम चुनावों के कुछ चुनिंदा उदाहरण गिनाए जा सकते हैं, जब एग्जिट पोल्स के अनुमान औंधे मुंह गिरे और वास्तविक नतीजे उनके उलट आए। ऐसा होने पर एग्जिट पोल्स करने वाली एजेंसियों और उन्हें दिखाने वाले टीवी चैनलों की बुरी तरह भद्द भी पिटी। लेकिन इससे उन पर कोई फर्क नहीं पडा।

2004 के आम चुनाव में लगभग सभी एग्जिट पोल्स के नतीजों में बताया गया था कि अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए फिर सरकार बनाएगा, लेकिन वास्तविक नतीजे इसके बिल्कुल उलट रहे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की सरकार बनी। डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। 2009 के आम चुनाव में भी सभी एग्जिट पोल्स के नतीजों में यूपीए और लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई वाले एनडीए के बीच कांटे की टक्कर बताते हुए दोनों को ही बहुमत के आंकडे से बहुत दूर दिखाया गया था। लेकिन असल नतीजों में यूपीए को बहुमत से थोडी सी कम यानी 262 सीटें मिली और सपा-बसपा के बाहरी समर्थन से उसने सरकार बनाई। एनडीए को महज 159 सीटें ही मिल सकीं।

इन दो आम चुनावों के अलावा पिछले पांच साल के दौरान हुए तमाम विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल्स भी हकीकत से बहुत दूर रहे हैं। 2014 में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में सभी एग्जिट पोल्स भाजपा की सरकार बनवा रहे थे, लेकिन नतीजे आए तो 70 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा को महज तीन सीटें मिलीं और कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुला। सारे अनुमानों को ध्वस्त करते हुए आम आदमी पार्टी ने 67 सीटों के साथ सरकार बनाई। 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भी सभी एग्जिट पोल्स के अनुमान बुरी तरह जमींदोज हुए थे।

इसके बाद तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ के चुनावी नतीजों ने भी एग्जिट पोल्स के अनुमानों को अपने आसपास तक नहीं फटकने दिया। ऐसा नहीं है कि एग्जिट पोल्स के नतीजे सिर्फ भारत में मुंह की खाते हो, विदेशों में भी ऐसा होता है, जहां पर कि वैज्ञानिक तरीकों से एग्जिट पोल्स किए जाते हैं। दो दिन पहले हुए आस्ट्रेलिया के चुनाव को ताजा मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। आस्ट्रेलिया के संघीय चुनाव में तमाम सर्वेक्षणों में विपक्षी लिबरल-नेशनल गठबंधन को बहुमत के करीब और सत्ता में आता हुआ दिखाया गया था लेकिन चुनाव नतीजे बिल्कुल उलट रहे। इस सिलसिले में अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के चुनाव को भी याद किया जा सकता है, जिसमें सारे ओपनियन और एग्जिट पोल्स हिलेरी क्लिंटन की बढत दिखा रहे थे लेकिन चुनाव नतीजों जीत ट्रंप की हुई।

हालांकि दावा तो हमारे यहां भी वैज्ञानिक तरीके से ही एग्जिट पोल्स करने का किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। वैसे हकीकत यह भी है कि भारत जैसे विविधता से भरे देश में जहां 60-70 किलोमीटर की दूरी पर लोगों के रहन-सहन और खान-पान की शैली, भाषा-बोली और उनकी आवश्यकताएं और समस्याएं बदल जाती हो, वहां किसी भी प्रदेश के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों के मुट्ठीभर लोगों से बातचीत के आधार पर किसी सटीक निष्कर्ष पर पहुंचा ही नहीं जा सकता। यह बात सर्वे करने वाली एजेंसियां भी जानती हैं लेकिन यह और बात है कि वे इसे मानती नहीं हैं।

दरअसल हमारे यहां चुनाव को लेकर जिस बडे पैमाने पर सट्टा होता है और टेलीविजन मीडिया का जिस तरह का लालची चरित्र विकसित हो चुका है, उसके चलते एग्जिट पोल्स की पूरी कवायद सट्टा बाजार के नियामकों और टीवी मीडिया इंडस्ट्री के एक संयुक्त कारोबारी उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। कभी-कभी सत्तारुढ दल भी इस उपक्रम में भागीदार बन जाता है। इसलिए एग्जिट पोल्स के अनुमानों को सिर्फ सस्ते मनोरंजन के तौर पर ही लिया जा सकता है।

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