मिस्र के पेशेवर फ़ुटबाल खिलाड़ी मौहम्मद सालाह ब्रिटेन में लीवरपूल के प्रीमियर लीग क्लब के लिए खेलते हैं. गोल दागने के तुरंत बाद जैसे ही वह सजदे में झुकते हैं तो स्टैंड्स में बैठे लीवरपूल के श्वेत बहुल दर्शकों का हुजूम आहलादित होकर समवेत स्वरों में गाने लगता है “अगर सालाह ने एक गोल और दाग़ दिया तो मैं शर्तिया मुस्लिम बन जाऊँगा.”

असल में जब खेल के दौरान सालाह गोल दागते हैं तो उसका असर न केवल पवेलियन में बैठे दर्शकों पर बल्कि स्टेडियम की दीवारों के बाहर तक होता है. फुटबाल को मारी गई उनकी हर एक किक स्टेडियम के बाहर मौजूद इस्लामोफोबिया से ग्रस्त पूर्वाग्रही दिमागों पर भी प्रहार करती है. स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध में पाया गया है कि जब से (जून 2017) सालाह ने लीवरपूल प्रीमियर लीग के लिए खेलना शुरू किया है तब से लीवरपूल और उसके आसपास के इलाकों में मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत और उससे उपजी हिंसा की वारदातों में भारी गिरावट आई है.

शोध में यह बात भी सामने आई कि ब्रिटेन के फुटबाल फैन पहले ट्विटर पर जिस कदर मुस्लिम-विरोधी ट्वीट्स किया करते थे, सालाह को टीम में शामिल किए जाने के बाद उनकी संख्या आधी हो गई है. इतना ही नहीं शोध के दौरान लीवरपूल के आठ हजार से भी ज्यादा फैन्स के साथ संवाद में यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि सालाह की वजह से उनके दिमाग में इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रहों की ऊँची-ऊंची दीवारें अब गिरने लगी हैं. एक स्नेही मुस्लिम पिता और पति के रूप में सालाह की छवि ने गैर-मुसलमानों के जेहन पर ऐसी सकारात्मक छाप छोड़ी है कि अब उन्हें मुसलमानों से डर नहीं लगता.

शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि मुस्लिम समाज की सफल शख्सियतों के अन्य समाजों के साथ संवाद एवं मेलजोल को प्रोत्साहित किया जाए तो यह उनके प्रति फैली दुर्भावना और दुराग्रहों का शमन करने में निश्चय ही कारगर साबित होगा. यह विश्वास भी व्यक्त किया गया  कि यह “सालाह इफेक्ट’ न केवल लीवरपूल बल्कि समूचे विश्व को धीरे–धीरे अपने आगोश में ले लेगा.

इसी साल क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने के बाद इंग्लैण्ड की टीम के कप्तान मॉर्गन ने जीत का श्रेय ‘अल्लाह’  को देते हुए बताया, ‘‘मैंने आदिल (विजेता इंग्लैण्ड टीम के मुस्लिम खिलाड़ी) से बात की थी, उसने कहा कि अल्लाह पक्के तौर पर हमारे साथ है. असल में हमारी टीम बहु-संस्कृतिवाद का जीता-जागता उदाहरण है.’’ ब्रिटेन में ‘सालाह इफेक्ट’ की एक सकारात्मक बानगी दिखाता कप्तान मॉर्गन का यह बयान पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना रहा.

हाल ही में ब्रिटेन के राजकुमार विलियम और उनकी पत्नी कैथरीन मिडल्टन ने अपने पहले दक्षिण एशियाई दौरे के लिए पाकिस्तान को चुना. पांच दिवसीय इस दौरे में कैथरीन इस्लामिक संस्कृति के अनुरूप न केवल सर को दुपट्टे से ढंके रहीं बल्कि पति विलियम के साथ लाहौर की एक मस्ज़िद में बाकयदा ज़मीन पर बैठकर कुरान की तिलावत भी की. निश्चय ही शाही युगल का यह व्यवहार पाकिस्तान की सरकार और जनता को खुश करने के लिए नहीं बल्कि अपने वतन में मुसलमानों के प्रति फैली हुई दुर्भावना और दुराग्रहों का शमन करने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास था.

इस वर्ष इथोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. प्रधानमंत्री अहमद ने पड़ोसी देश इरीट्रिया के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अवधारणा का पोषण करते हुए न केवल युद्ध विराम की पहल की बल्कि दशकों से चले आ रहे सीमा-विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से हल कर लिया. उन्होंने एक परम्परावादी मुस्लिम बहुल देश में महिला-सशक्तिकरण हेतु राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढाने के लिए रचनात्मक कदम उठाए. उनकी सरकार में शामिल महिला मंत्रियों की संख्या 20 है जो कुल मंत्रियों की संख्या का आधे से भी ज्यादा है. इतना ही नहीं अबी अहमद ने पहली बार देश के रक्षामंत्री पद पर एक महिला को आसीन किया.

इस साल नोबेल पुरस्कार के लिए नामित व्यक्तियों की सूची में दो और मुस्लिम महिलाओं का नाम भी शामिल था; सोमालिया की 29 वर्षीय ईवाद ऐमान और लीबिया की 24 हाजेर शरीफ. ऐमान ने सोमालिया में ऐसा पहला सेंटर शुरू किया है जो यौन शोषण, हिंसा और बलात्कार की शिकार महिलाओं की मदद करता है. हाजेर शरीफ लीबिया में मानवाधिकारों और महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रशंसनीय काम कर रही हैं.

न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में मस्जिदों पर हुई गोलीबारी की घटनाओं के बाद प्रधानमंत्री खुद काला हिज़ाब पहनकर मुसलमानों के पास उनका दर्द बांटने पहुंची. मुस्लिम महिलाएं हिज़ाब की वजह से पहचान लिए जाने के डर से बाहर नहीं निकल रही थीं. मुस्लिम महिलाओं के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करने के लिए श्वेत महिलाएं हिज़ाब पहनकर सडकों पर निकलीं और जुम्मे की नमाज़ के वक़्त मस्जिदों के बाहर एकत्रित हुईं.

ये सभी उदाहरण मुसलमानों के दानवीकरण की प्रवृत्ति को थामने की दिशा में यूरोपीय एवं अन्य देशों की सरकारों व संगठनों द्वारा किए जा रहे रचनात्मक प्रयासों की एक कड़ी हैं. इन सभी उदाहरणों को यहाँ क्यों उद्धृत किया गया है, यह समझने के लिए प्रस्तुत आलेख का यह हिस्सा पाठकों की मदद करेगा

इस्लामोफोबिया ने यूरोप सहित लगभग पूरे विश्व को अपनी गिरफ्त में ले रखा है. इसने राष्ट्रवाद और विदेशियों से नफरत (Xenophobia) की एक ऐसी अति-दक्षिणपंथी विचारधारा को पुनर्जीवित कर दिया है जो अपने देश को हर हाल में इस्लाम और मुसलमानों से रहित देखना चाहती है. इस्लामोफोबिया मुस्लिमों के साथ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष भेदभाव, नफ़रत और हिंसा के रूप में पैर पसारता जा रहा है. यूरोप के अलग-अलग देशों में यह अलग-अलग रूपों में प्रकट हुआ है. मगर मोटे तौर पर लगभग सभी देशों में मुस्लिमों, उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन, वेशभूषा और धार्मिक स्थलों को हिंसक, भयावह और यूरोपीय जीवनशैली से बेमेल माना जाता है. यूरोप में दक्षिणपंथ के इस उभार ने 1930 और 1940 की भयावह स्मृतियों को एक बार फिर से ताज़ा कर दिया है. एक आम यूरोपियन इस्लाम को आतंकवाद की जननी मानने लगा है और इसे यूरोप में लोकतंत्र के लिए खतरे के रूप में देखता है. ट्रंप की जीत ने दक्षिणपंथी ताकतों के लिए खाद–पानी का काम किया है.

यूरोप में करीब 2.6 करोड़ की मुस्लिम आबादी है. इनमें से अधिकतर मुस्लिम रोज़गार की तलाश में आए थे या लाए गए थे और ये अक्सर उन कामों को करते थे जिन्हें ‘मुश्किल, गन्दा और खतरनाक़’ माना जाता था. अस्सी के दशक में  इन अप्रवासियों के परिवारों के भी यूरोप में आकर बस जाने से फिजां बदलने लगी और अब इन्हें आप्रवासी मजदूर न मानकर मोरक्को, पाकिस्तान और टर्की से आए ‘मुस्लिम‘ कहा जाने लगा. इन्हें यूरोपीय सामाजिक ताने-बाने के लिए एक खतरे के तौर पर देखा जाने लगा. कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी समूहों द्वारा किए गए छिटपुट हमलों और यूरोपीय मुसलमानों के उग्रवाद ने यूरोप में मुस्लिम विरोधी भावना ‘इस्लामोफोबिया’ को जन्म दिया.

जहाँ एक ओर यूरोप में बढ़ते हुए इस्लामोफोबिया ने संदेह, विवाद और नफरत को जन्म दिया है वहीं दूसरी ओर इसका शमन करने हेतु व्यक्तिगत व सामूहिक तौर पर तथा सरकारों की तरफ से कोशिशें जारी  है ताकि मुसलमानों के दानवीकरण की उस प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सके जिसने यूरोप के गैर–मुस्लिम समाजों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है. ये कोशिशें वैचारिक और जमीनी, दोनों स्तरों पर लगातार जारी हैं .
क्योंकि इस्लामोफोबिया का विचार मुसलमानों को यूरोपियन मूल्यों, जीवनशैली व संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखता है तो इस विचार का प्रतिकार करने के लिए समाज के विभिन्न क्षेत्रों में मुस्लिमों के सकारात्मक योगदान को परिभाषित, प्रचारित व प्रसारित किया जा रहा है. इस्लाम और मुसलमानों को स्त्री विरोधी माना जाता है तो इसके लिए मुस्लिम महिलाओं की उपलब्धियों, उनकी आवाज़ और रचनात्मक क्रियाकलापों को जनसाधारण के बीच प्रस्तुत करके मुस्लिम समाज की स्त्री–विरोधी छवि को बदलने /परिमार्जित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. इसके नए कथानकों / नैरेटिव का सृजन किया जा रहा है. मुस्लिम महिलाओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे कला , मीडिया व पोपुलर कल्चर के माध्यम से अपने-अपने जीवन की विविध उपलब्धियों को सामान्यजन के साथ साझा करें. इस्लाम और मुसलमानों को लेकर जो अर्धसत्य से लबरेज़ नैरेटिव चलाए जा रहे हैं उनका प्रतिकार किया जाना आवश्यक है .

यूरोपियन कमीशन ने इस्लामोफोबिया के प्रतिकार के लिए एक अलग इकाई  की स्थापना की है. यह इकाई मुस्लिम विरोधी नफरती भाषणों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, हाउसिंग, रोज़गार में भेदभाव और  पुलिस उत्पीडन आदि के आंकड़े इकठ्ठा करती है. यह नस्लवाद, ज़ेनोफोबिया एवं अन्य किसी भी किस्म की असहिष्णुता को रोकने की दिशा में रचनात्मक प्रयास कर रही है. यह इस्लामोफोबिया के खिलाफ यूरोपियन यूनियन के सभी 28 सदस्य देशों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के मध्य समन्वय स्थापित करने का काम करती है. यह समय-समय पर इस विषय पर वर्कशॉप व  सिम्पोजियम आयोजित करती है .

2016 में यूरोपियन कमीशन ने बाहर से आने वाले लोगों को अपने समाज में मिलाने के लिए एक दोतरफा एक्शन प्लान बनाया जिसमें आप्रवासियों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे भी यूरोपीय समाजों के मूल्यों को आत्मसात करने की कोशिश करें. यूरोपियन यूनियन के सभी देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने यहाँ नस्लवाद और ज़ेनोफोबिया से उपजे अपराधों को दण्डित करने के लिए कानून बनाए. पुलिस को विशेष तौर पर ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वह इस्लामोफोबिया के कारण हुए अपराधों को पहचान सके और सभी समाज एवं राजनीतिक संस्थाओं के बीच तालमेल बैठाए और ऐसे अपराधों को कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाए.

सहिष्णुता को लेकर ऑनलाइन सकारात्मक कथानक सृजित किए जा रहे हैं. इस पहल का नतीज़ा यह निकला कि ट्विटर पर दक्षिणपंथियों द्वारा चलाए गए हैशटैग ‘PunishAMuslimDay’ को  ‘LoveAMuslimDay’ ने भारी शिकस्त दी. बहुलतावादी समाज की अवधारणा को खुले दिलोदिमाग से आत्मसात किया जाने की दिशा में काम हो रहा है. दोनों तरफ के दक्षिणपंथी तत्वों पर लगाम लगाने की कोशिशें जारी है क्योकि ये दोनों एक दुसरे को खाद पानी मुहैया करते हैं.

राजनीतिक विचारधारा चाहे कोई भी हो, लगभग सभी राजनीतिक दल इस्लामोफोबिया की सच्चाई को स्वीकारते हैं. इस्लामोफोबिया को महज़ शब्दजाल बताकर उसके दुष्प्रभाव को कम करके आंकना एक भूल होगी क्योकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह शब्दजाल कब हिंसा में तब्दील हो जाए. मुसलमानों को साथ लेकर चलना होगा उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. ध्यान रहे हाशिए पर धकेले गए लोग अक्सर तीव्र और घातक प्रतिक्रिया देते हैं.

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