पिछले सप्ताह भर से भाजपा और उनके समर्थकों की कहीं छुपी तो कहीं उजागर खुशियां उनके चेहरों पर आसानी से पढी जा सकती है। उसमें देशभक्ति भी दिखती है लेकिन उससे ज्यादा उनका गुरूर दिखता है। आगामी चुनाव में वोटों की लहलहाती फसल और सत्ता की लॉटरी खुलने की उम्मीदें जगाने वाला दृश्य दिखता है, जिसकी पुष्टि विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए कुख्यात कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी कर रहे हैं, जो कह रहे हैं कि कर्नाटक की 28 में से 22 सीटें भाजपा के लिए पक्की हो गई हैं। दूसरी ओर कांग्रेस में इससे ठीक उलटा दृश्य उपस्थित है। वहां गम और निराशा कहीं छुपी हुई तो कहीं उजागर होती दिख रही है, जो उसके नेताओं के चेहरों पर पढी जा सकती है।

युद्धोन्माद के इस दौर में ‘देशभक्ति’ का जैसा प्रदर्शन भाजपा कर रही है, वैसा कांग्रेस नहीं कर पा रही है। उसकी स्थिति वैसी ही है जैसे किसी की लॉटरी तो खुल चुकी है लेकिन लॉटरी का टिकट गुम हो गया है या फट गया है।

भाजपा इस माहौल का लाभ लेने के लिए समय पर चुनाव करवा सकती है, वहीं कांग्रेस परिस्थितियों के दबाव में अपने दबे हुए गुरुर को छोडकर गठबंधन की ओर अग्रसर हो सकती है। पिछले दिनों कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल की गठबंधन की पहल को ठुकराया है। मीडिया ने केजरीवाल से पूछा कि आप कांग्रेस से गठबंधन की पहल कैसे कर रहे हैं? उनका उत्तर था, देश में लोकतंत्र को बचाना ज्यादा जरूरी है।

गुजरा सप्ताह प्रतिपक्षी दलों को रास्ता दिखा गया है। 44 जवानों शहादत और उस पर की गई कार्रवाई ने एक का मनोबल बढ़ाया है, तो दूसरे का घटाया है। आज देश की जरू रत लोकतंत्र है। भाजपा हो या कांग्रेस, कोई भी खुदा न बने। खुदा के बंदे अर्थात जनता सर्वोपरि रहे। इसी से लोकतंत्र और देश दोनों जिन्दा है।

सेना लडती है, सैनिक मरता है। देश लडता है, देश मरता है। इस लडने-मरने में कुछ की कुर्बानी होती है, शहादत होती है। कुछ की दुकानें सजती हैं, कुछ को सत्ता मिलती है। कुछ की सत्ता छीनती है। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई हो या द्बितीय विश्वयुद्ध या फिर 1962, 1965 और 1971 के युद्ध, सभी में मुनाफाखोरों ने कालाबाजारी कर अकूत धन कमाया था। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में कितने ही हिंदुस्तानी मुलाजिमों ने देशवासियों पर हंटर और गोलियां बरसाई थीं। कितने ही राव, रायबहादुर, जागीरदार, जमींदार, मनसबदार, राजा और नवाबांे ने अपनी किस्मत चमकाई थी। वह दौर अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

युद्ध के बादल काफी हद तक छंट गए हैं। इससे कई लोग जहां राहत महसूस कर रहे हैं, वहीं कई लोगों मायूस हैं, अपने को आहत महसूस कर रहे है। देशभक्ति और एकता की लहर ने पूरे देश को एक कर दिया था। पूरे देश ने शहीदों की कुर्बानी और उनके परिवार मिली ताजिन्दगी की तकलीफों के दर्द को महसूस किया है। इस पूरे माहौल में बहुतों की अधूरी हसरतें छुपी हुई हैं। ये हसरतें देशभक्ति की भी हैं और सत्ता की चाह की भी। इसका स्पष्ट नजारा हम आने वाले चंद दिनों में देखेंगे, जब युद्धकालीन अनुशासन नहीं होगा। लोकतंत्र का महापर्व चुनाव होगा। जो सामने है, वह पूरा सच नही है, वह तो आना बाकी है। एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना है। लेकिन ये पब्लिक है जो सब जानती है, यह हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि भी है।

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