चाहे नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या फिर कोई और हो, किसी के लिए भी एक साथ दो या इससे भी अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लडने पर भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून में कोई रोक नहीं है। फिर भी ऐसा करना क्या तार्किक और नैतिक रूप से सही माना जा सकता है? दरअसल किसी भी व्यक्ति का एक से अधिक स्थानों से चुनाव लडना उसके डिगे हुए आत्मविश्वास का परिचायक तो होता ही है साथ ही इससे उन क्षेत्रों के मतदाताओं का अपमान भी होता है और बाद में उपचुनाव की स्थिति में सरकारी खजाने पर भी अनावश्यक बोझ पडता है।

वैसे भारतीय राजनीति में इस भौंडी और अनैतिक परंपरा की शुरुआत भाजपा की ‘नैतिकता’ के ‘शिखर पुरुष’ अटल बिहारी वाजपेयी ने 1957 में दूसरे आम चुनाव से की थी। वह उनके राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव था। उस चुनाव में वे एक साथ उत्तर प्रदेश के तीन निर्वाचन क्षेत्रों- मथुरा, बलरामपुर और लखनऊ से खडे हुए थे। बलरामपुर में वे जीत गए थे जबकि मथुरा और लखनऊ में उन्हें हार का सामना करना पडा था। मथुरा में तो उनकी जमानत भी नहीं बच पाई थी। बाद में एक बार इंदिरा गांधी भी 1980 में अपनी पारंपरिक रायबरेली सीट के अलावा आंध्र प्रदेश की मेडक सीट से भी चुनाव लडी थीं। वे दोनों जगह से जीती थीं और बाद में उन्होंने मेडक सीट से इस्तीफा दे दिया था।

1996 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव भी ने भी दो जगहों- आंध्र प्रदेश की नांद्याल और ओडिशा की बेरहामपुर सीट से चुनाव लडा था। दोनों जगह से जीतने पर उन्होंने नांद्याल सीट खाली कर दी थी, जिस पर उपचुनाव हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के आकांक्षी रहे समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव भी 1998 के मध्यावधि चुनाव में दो क्षेत्रों- संभल और कन्नौज से खडे हुए थे। दोनों ही जगह वे विजयी रहे थे और बाद में उन्होंने कन्नौज सीट खाली कर वहां से अखिलेश यादव को चुनाव लडाया था। इसके अलावा भी अन्य कई नेता हुए हैं जिन्होंने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एक से अधिक सीटों पर चुनाव लडा है।

इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में अपनी लोकप्रियता के शिखर पर रहते हुए गुजरात की वडोदरा और उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से चुनाव लडा था और बाद में वडोदरा सीट से इस्तीफा दे दिया था। इस समय चर्चा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी दो क्षेत्रों से चुनाव लडने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि वे अपनी परंपरागत अमेठी सीट के अलावा केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लडेंगे। चर्चा यह भी है कि राहुल के खिलाफ भाजपा दूसरी सीट पर भी स्मृति ईरानी को ही मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र का मखौल नहीं तो और क्या कहा जाएगा?

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