बाबा साहेब ने उत्पीड़न के खिलाफ उस काल में युद्ध शुरू किया जिसमें समाज में छुआछूत और बेगारी को एक कभी खत्म होने वाली सच्चाई माना जा चुका था। अग्रेजों ने 1857 के पहले भारतीय समाज की कुरीतियों  पर प्रहार करने की जो कोशिश की थी, उसे उन्होंने आजादी के प्रथम महासंग्राम के बाद त्याग दिया था। इसकी वजह यह थी कि इस महासमर में समाज के सभी वर्ग शामिल हो गए थे। उन्हें गुलामी के खिलाफ एक साथ संघर्ष करते देख कर अंग्रेज चैकन्ना हो गए और बदलाव के वे द्वार उन्होेंने बंद कर दिए जिससे भरतीय समाज आधुनिक और मानवीय बन सके। इसका एक उदाहरण है भारतीय सेना में भर्ती के नियमों मंे परिवर्तन। अंग्रेजों ने बहादुर जातियों की सूची बनाई और इसे पुरानी मान्यताओं के आधार पर गठित किया। महार रेजिमंेट जैसे रेजिमेंटों को भंग कर दिया क्योंकि 1857 के संघर्ष में इन रेजिमेेंटों के सैनिकों ने भी लिया था। अंग्रेजों का एक ही उद्देश्य रह गया था कि जाति और धर्म के आधार पर बंटे हुए इस समाज को उसी हालत में छोड़ दिया जाए या उसके विभाजन को और बढाया जाए ताकि लोग एक होकर संघर्ष न करें।
बाबा साहेब आंबेडकर  के सामने यही चुनौती थी कि सदियोें से दबे लोगों की मुक्ति की कामना को कैसे स्वर दें और राजनीतिक और सामाजिक, दोनों स्तरोें पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें। उन्हें उन लोगों के आत्मविश्वास को वापस लाना था जो सैंकड़ों साल से शिक्षा क्या मानव होने के बुनियादी अधिकार से वंचित थे। इसके लिए जरूरी था कि संवैधानिक लड़ाई से जो हासिल हो सकता था, उसे प्राप्त किया जाए और साथ ही, समाज में सही दर्जा पाने के लिए भारत की सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार किया जाए।  डा आंबेडकर ने दोनों ही काम ऐसी कुशलता के साथ किए कि आजादी के आते-आते दलितों को अधिकार को सैद्धांतिक मान्यता मिल चुकी थी। जब देश आजाद हुआ तो देश की उन शक्तियोें को भी इन अधिकारों को नामंजूर करने की हिम्मत नहीं हुई जो सामाजिक समानता में विश्वास नहीं करते थे और सैंकड़ों साल पुरानी जाति-व्यवस्था तथा ब्राह्मणों की श्रेष्ठता कायम रखना चाहते थे। आरएसएस या हिंदू महासभा के लिए भी दलितों के लिए भी उनका विरोध करना संभव नहीं रह गया था। वैसे, दलितों की मुक्ति में रास्ते में रोड़ा अटकाने और पुरानी व्यवस्था के बनाए रखने के काम उन्होंने बदस्तूर जारी रखे। दलितों और मुसलमानों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले गोरक्षा के आंदोलन आजादी के बाद तेज कर दिए गए। छुआछूत बनाए रखने और मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर पाबंदी रखने के प्रयास भी जारी रहे।
आज संघ परिवार की राजनीतिक इकाई भाजपा सत्ता में है और देश की उन संवैधानिक संस्थाओं के नष्ट होने का सिलसिला तेज हो गया है जिन्हें बनाने में भारत की शासन व्यवस्था को मानवीय और समता के मूल्योें पर आधारित रखने के लिए बाबा साहेब ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में बाबा साहेब और भी प्रासंगिक हो गए हैं। संसदीय राजनीति के अवसरवाद ने दलितों की राजनीति करने वाले कई महत्वपूर्ण नेताओं को उन लोगों की गोद में बिठा दिया है जो दलितों के अधिकार छीनने में विश्वास करते हैं। देश की आर्थिक व्यवस्था ऐसी बन गई है जिसमें किसान, खेतिहर मजदूर, असंगठित क्षेत्र के कामगार के लिए कोई जगह नहीं है। इस व्यवस्था में सबसे बुरी स्थिति दलित, मुसलमान और पिछड़े लोगों की है। उनका शोषण बढ गया है। इसके साथ ही आरक्षण को खत्म करने या उसे असरदार नहीं रहने देने की कोशिश चल रही है। दलित अत्याचार रोकने वाले कानून को कमजोर करने के प्रयास को हम देख ही चुके हैं।  ऐसी परिस्थिति में प्रतिरोध की नई शक्तियां भी उभर रही हैं  जिसमें रोहित वेमुला जैसे संवेदनशील प्रतिभा को अपनी शहादत देनी पड़ी है और चंद्रशेखर आजाद जैसे योद्धाओं को लगातार अत्याचार झेलने पड़े हैं। देश में जिग्नेश मेवाणी और चंद्रशेखर आजाद जैसे नौजवानोें का नया नेतृत्व पैदा हो गया है जो संघर्ष की नई भाषा और रणनीति गढने में लगा है। सदा की तरह बाबा साहेब उनकी प्रेरणा के स्रोत हैं।
डा आंबेडकर की जयंती के अवसर पर हमें एक बात याद रखनी चाहिए कि भारत के आजादी आंदोलन ने सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी का जो अहिंसक अस़्त्र दुनिया को दिया है। उसमें आस्था पैदा करने वाले तीन राजनेताओं को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। ये तीन हैं-महात्मा गांधी, बाबा साहेब और डा राममनोहर लोहिया। तीनों ने बुद्ध की करूणा को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया और मानव-मुक्ति के संघर्ष को नया आयाम दिया।  डा लोहिया और आंबेडकर भारतीय राजनीति में नया गंठजोड़ बनाने की कोशिश में थे, लेकिन बाबा साहेब के निधन के कारण यह संभव नहीं हो पाया। मंडल कमीशन की सिफारिेशें लागू करने के आंदोलन के समय इस गंठजोड़ ने अमली शक्ल भी ली और अब यह भारतीय राजनीति में जगह-जगह दिखाई भी देता है।
डा बाबा साहेब आंबेडकर भारत की आजादी के आंदोलन के वैसे योद्धा हैं जो अपनी मृत्यु के बाद भी युद्धरत हैं। यह हैसियत बहुत कम लोगों को नसीब होती है कि आप अपनी मौत के बाद भी अपने व्यक्तित्व और विचारों के कारण उपस्थित और प्रासंगिक रहते हैं। अपनी प्रासंगिकता के कारण वह दुनिया की उन महान विभूतियोेें के बीच खड़े हैं जिनके लिए इतिहास और वर्तमान का फर्क मिट चुका है। वह आज भी उस आबादी की आवाज बने हुए हैं जिसकी आवाज सैंकड़ों साल तक छिनी रही। जब तक वर्ण और जाति की क्रूर व्यवस्था बनी रहेगी, डा आंबेडकर इससे लड़ने के लिए मौजूद रहेेंगे।
आज यह जरूरी है कि आरएसएस और भाजपा जैसी सांप्रदायिक और समानता-विरोधी शक्तियों को पारजित किया जाए और संविधान को बचाया जाए। ऐसे में, बाबा साहेब सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं।

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