अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी एनएसए में सिस्टम्स इंजीनियर के तौर पर एडवर्ड स्नोडन एक ऐसे प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे जिसमें अमेरिकी नागरिकों सहित दुनिया भर के अति महत्वपूर्ण लोगों की निजी डिजिटल जानकारी गुप्त तरीके से एकत्रित जा रही  थी. यह NSA का एक अति गोपनीय व संवेदनशील डिजिटल निगरानी प्रोग्राम था.  व्यक्ति की निजता (प्रायवेसी) पर हुए इस सरकारी हमले से आहत स्नोडन ने इस बारे में अपनी आपत्तियां संस्था के प्रशासन से साझा की मगर उन्हें अनसुना कर दिया गया. व्यथित स्नोडन NSA की नौकरी छोड़कर हांगकांग चले गए और वहां पहुंचकर उपरोक्त प्रोग्राम की बहुत सारी जानकारी, रिकॉर्ड्स एवं जासूसी की तकनीक पत्रकारों के साथ साझा कर दी.

स्नोडन को अपने इस  ‘दुस्साहस’ की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी. इस खुलासे से बौखलाई सरकार ने उनका पासपोर्ट तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया. उन्हें हांगकांग छोड़ना पड़ा. एक महीने तक मास्को हवाई अड्डे पर स्टेटलेस व्यक्ति के तौर पर रहे. अब पिछले 5 सालों से वह रूस में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं. अमेरिका की सरकार ने इसे देश के खिलाफ जासूसी मानते हुए उन पर मुकदमा दायर कर रक्खा है.

ताजा प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘ परमानेंट ऑर्डर ‘ में NSA में अपने अनुभवों को याद करते हुए स्नोडन लिखते हैं “ मैं एक ऐसे टर्मिनल पर बैठा हुआ था जहां से मैं हर वक्त बेरोकटोक दुनिया के हर उस आदमी की बातचीत सुन और देख सकता था जो अपने  फोन या कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर रहा था. मैंने यह निश्चय कर लिया था कि जनता की अनुमति व संज्ञान में लाए बिना सरकार द्वारा की जा रही  इस डिजिटल जासूसी को बेनक़ाब किया जाना जरूरी है “

स्नोडन द्वारा किए गए सनसनीखेज़ खुलासों का क्या असर हुआ?

2015 में काँग्रेस (यूस की संसद) ने ‘ यूएस फ्रीडम एक्ट ‘ पारित किया जिसके तहत अमेरिकी नागरिकों के फोन रिकॉर्ड्स की एकसाथ बड़ी संख्या में जानकारी इकठ्ठा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अब यदि सरकार किसी व्यक्ति का फोन रिकॉर्ड जांचना चाहती है तो उसे कोर्ट से इजाजत लेनी होगी.

इस घटनाक्रम के बाद चूंकि सामान्य नागरिक इस बारे में अधिक जागरूक हो गए थे कि सरकार और फेसबुक जैसी कम्पनियां ग्राहकों का व्यक्तिगत डेटा इकट्ठी करती हैं तो ‘एंड टू एंड एनक्रिप्शन’ का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाने लगा है. अब वेब ट्रैफिक अधिकांशत: एनक्रिप्टेड होने लगा है अर्थात अब प्रेषक और प्रेषित के अतिरिक्त कोई तीसरा व्यक्ति उनके संदेश अथवा आवाज़ को पढ़ या सुन नहीं सकता.

व्हाट्सएप्प कम्पनी ने साइबर कानून की जिन धाराओं के तहत जासूसी सॉफ्टवेयर की निर्माता इजरायल की कम्पनी पर मुकदमा दायर किया है वह भी इसी घटनाक्रम के बाद प्रभाव में आई.

व्हाट्सएप्प में सेंधमारी

इसे संयोग कहा जाएगा या साज़िश कि इस साल अप्रैल के महीने में फोन निर्माता कंपनी एप्पल  ने एक विज्ञापन जारी किया जिसमें उन्होंने दावा किया उनके फोन का सिक्योरिटी सिस्टम इतना मजबूत है कि इसमें कोई बाहरी घुसपैठ नहीं की जा सकती. ठीक उसी वक्त इजरायल की एक सॉफ्टवेयर कम्पनी NSO अपने सेल्स अधिकारियों के साथ मीटिंग में एक बहुत ही महत्वपूर्ण अपडेट के बारे में विचार -विमर्श कर रही थी जो प्रायवेसी को लेकर एप्पल के दावों को तार- तार करने में पूर्णतया सक्षम था.

कम्पनी के तकनीशियनों का दावा था कि व्हाट्सएप्प पर महज़ एक मिस्ड फोन कॉल के ज़रिए आईफोन में उनके नए जासूसी सॉफ्टवेयर को सफलतापूर्वक  प्रविष्ट कराया जा सकता है जो आईफोन के सारे गुप्त रहस्यों को  खंगाल डालेगा. सॉफ्टवेयर का नाम था Pegasus पेगासस. मिस्ड कॉल करने के चंद मिनटों के भीतर यह सॉफ्टवेयर मिस्ड कॉल करने वाले को फोन में मौजूद सारा एन्क्रिप्टेड कंटेंट और ग्राहक की निजी जानकारी जैसे प्रायवेट मैसेज, लोकेशन और यहाँ तक कि फोन के कैमरे और माइक्रोफोन पर चल रही गतिविधियों को लाइव भेजने लगता है.

पेगासस सॉफ्टवेयर को तैयार करने में इस्तेमाल की गई तकनीक कितनी ताकतवर और अचूक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है इसकी बिक्री को इज़रायल का रक्षा मंत्रालय स्वयम नियंत्रित करता है. कम्पनी का दावा है कि वे केवल सरकारों को यह जासूसी सॉफ्टवेयर बेचते हैं, व्यक्तियों को नहीं .

अब दुनियाभर की सरकारें  पैसा देकर उस जासूसी उपकरण को खरीद सकती थीं जिस पर  अभी तक ब्रिटेन और यूएस की सुरक्षा एजेंसियों का एकाधिकार  हुआ करता था. ज़ाहिर है कि इतनी ताकतवर तकनीक पर एकाधिकार  ने इजरायल की सरकार को कूटनीति के मोर्चे पर एक विशेष ताकत मुहैया करवा दी है. ऐसा माना जाता है कि इस सॉफ्टवेयर ने इजरायल की पहुँच उसके जानी दुश्मन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक बना दी है. हालंकि इजरायल की सरकार ने आज तक कभी भी NSO के साथ अपने सम्बन्धों की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं की है. वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार कमाल खशोगी की इस्ताम्बुल में हुई हत्या के बाद से पेगासस संदेह के घेरे में आ गई है .

मजे की बात यह है कि इज़रायल ने अपनी  सेना के अधिकारियों के लिए विशेष रूप से सुरक्षित फोन इज़ाद कर रखे हैं. सरकार  के अधिकांश उच्चाधिकारी स्मार्ट फोन का इस्तेमाल नही करते, वे पुराना नोकिया फोन इस्तेमाल करते हैं.

NSO का दावा है कि पेगासस का इस्तेमाल दर्जनों देशों ने केवल आतंकी हमलों को रोकने, ड्रग कारोबार को नेस्तनाबूद करने और अपहृत बच्चों को छुडवाने में किया है. मगर ‘सिटीजन लैब’ ने NSO के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि असल में पेगासस के हमले के शिकार अपराधी नहीं वरन पत्रकार और सिविल सोसायटी के वे सदस्य हुए  है जिन्हें सत्ता अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानती है.  हैकिंग का पर्दाफ़ाश करने में सिटिज़न लैब ने ही व्हाट्सएप्प की मदद की है .

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो से सम्बद्ध ‘ सिटिजन लैब ‘ नामक यह रिसर्च ग्रुप डिजिटल जासूसी  के शिकार लोगों की मदद करता है. इसके शोधकर्ता, जो पेगासस सॉफ्टवेयर की गहन पड़ताल और ट्रैकिंग कर  रहे हैं ,का मानना है कि लगभग ४५ देशों की सरकारें इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रही है. NSO ग्रुप का आधे से ज्यादा राजस्व मध्य – पूर्व यानी खाड़ी के देशों से आता है.

गत माह अक्तूबर  में व्हाट्सएप्प के प्रमुख विल कैथकार्ट ने बयान जारी किया कि इसी साल मई महीने में व्हाट्सएप्प की वीडियो कॉल सुविधा पर साइबर हमला हुआ था जिसे सफलतापूर्वक नाक़ाम दिया गया था. इस हमले में उपभोक्ता के फोन पर एक अजीबोगरीब सा वीडियो काल आया. यह प्रकार का मिस्ड कल था. फोन की घंटी बजते ही हमलावर ने उसके फोन में एक जासूसी करने वाला सॉफ्टवेयर इंस्टाल कर दिया. महीनों की पड़ताल के बाद व्हाट्सएप्प ने हमलावर की पहचान कर ली है हमलावर की पहचान इजरायल की एक साइबर सिक्योरिटी टेक्नोलॉजी कम्पनी NSO Group के तौर पर की गई है . व्हाट्सएप्प ने 30अक्तूबर, 2019 को कैलिफोर्निया के एक अदालत में U. S. Computer Fraud and Abuse Act के तहत उसके खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है. ज्ञात हो कि दुनिया के 180 देशों में व्हाट्सएप्प के 1.5 बिलियन उपभोक्ता हैं.

29 अप्रैल 2019 से 10 मई 2019 के बीच करीब 1400 ग्राहकों के मोबाइल फोन पर हमला हुआ था. परेशान करने वाली बात यह है हमले के शिकार अधिकांश ग्राहक दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार और  सभ्य समाज (सिविल सोसायटी) के सदस्य हैं.  प्रवक्ता ने कहा कि व्हाट्सएप्प निजता (प्रायवेसी) के अधिकार को व्यक्ति का मौलिक अधिकार मानता है अत: उसकी व्यक्तिगत बातचीत को सुनने या देखने का अधिकार किसी को भी नहींहै . नि:संदेह  मोबाइल फोन ने हमारे दैनिक जीवन को आसान बनाया है मगर यह उपयोगी उपकरण हमारी लोकेशन और बातचीत पर नजर रखने में भी सक्षम है. मगर हमने हमेशा उपभोक्ता की निजता की रक्षा की है इसीलिए उपभोक्ता के फोन कॉल्स और चैट पर दोनों तरफ ठीक उसी तरह ताला लगाया है जैसे दरवाजे पर लगाते हैं. End to end encryption  सिक्योरिटी सिस्टम के ज़रिए  हमने ऐसी व्यवस्था की है कि फोन पर आए सभी कॉल और संदेशों  की चाबी केवल कॉल रिसीवर और कॉलर के पास होती है, कोई बाहरी व्यक्ति उसे देख या सुन नहीं सकता.

डिजिटल निगरानी के औजारों का दुरूपयोग किया जा रहा है. इस तकनीक का गैर-जिम्मेदार कंपनियों और सरकारों के हाथों में आना सभी के लिए खतरे की घंटी है. पेगासस की जनक कंपनी ने भी यह कहकर अपना पल्ला झाड लिया है कि इस जासूसी सॉफ्टवेयर से प्राप्त हुआ डेटा खरीददार देशों के सर्वर्स में इकठ्ठा होता है जिस तक न तो उसकी पहुंच है और न ही अधिकार .

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्पेशल प्रतिवेदक  डेविड काये ने एक अभियान  शुरू किया है  जिसके तहत खतरनाक जासूसी सॉफ्टवेयरों की खरीद–फरोख्त, ट्रांसफर और इस्तेमाल पर तब तक  प्रतिबंध लगाए   जाने की मांग की है जब तक इस बारे में कोई मजबूत नियामक तय न हो जाएं. वह कहते हैं कि निगरानी के ये औजार मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन  करते हैं मगर इसके बावजूद इन पर किसी किस्म का कोई प्रभावी राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय नियन्त्रण नही है. व्हाट्सएप्प के प्रमुख विल कैथकार्ट ने टेक्नोलॉजी कंपनियों से अपील की है कि वे इस अभियान में सहभागिता करें .

लोकतंत्र निर्भीक स्वतंत्र पत्रकारिता और सिविल सोसायटी के बल पर फलता – फूलता है और इन्हें कमजोर करने की साजिश इन संस्थाओं के अस्तित्व को खतरे में डालती हैं . अत; सरकारों द्वारा  एंड टू एंड एन्क्रिप्शन तकनीक को कमजोर करने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए .

इन पंक्तियों को लिखे जाने तक भारत में लाखों की संख्या में ग्राहक व्हाट्सएप्प को छोड़कर दूसरी मैसेजिंग सेवाओं का रुख कर रहे हैं. सवाल उठता है कि अगर NSO कम्पनी केवल सरकारों को यह जासूसी सॉफ्टवेयर बेचती हैं तो  भारत में पत्रकारों और एक्टिविस्टों के फोन में व्हाट्सएप्प के ज़रिए घुसपैठ किसने की ?

कई हलकों में आवाज़ उठ रही है कि व्हाट्सएप्प कम्पनी पर ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी और सेंधमारी का मुकदमा दायर किया जाना चाहिए. इन आवाजों को समझना चाहिए कि सेंधमार व्हाट्सएप्प नहीं बल्कि पेगासस के खरीददार हमारे आका हैं जिन्होंने सेंधमारी से अनजान निर्दोष व्हाट्सएप्प ग्राहकों की निजता पर डाका डाला है. आकाओं से जवाब तलब किया जाना चाहिए. कितने भोले हैं हम!

 

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