घर में हँसते खेलते मिट्ठू अचानक बेहोश होकर गिर पड़ा.था.
मिट्ठू मेरा सबसे छोटा भाई, मंदबुद्धि, सोलह वर्ष की उम्र में भी बोल नहीं सकता था. देखने मं हृष्ट पुष्ट, हम चारो भाई बहन में सबसे सुंदर लेकिन बुद्धि एक साल के बच्चे जितनी.
पिछले पन्द्रह दिनों में उसे बेहोशी का यह तीसरा दौरा था. कारण कुछ साफ नहीं. क्लीनिक से लौटते हुए माँ, पिताजी, हम भाई बहन सभी चुप थे. सभी के मन में डॉक्टर का वह निर्मम, पेशेवर वाक्य गूँज रहा था, – ऐसे रिटारडेड बच्चों का जीवन बीस बरस से ज्यादा नहीं होता. इस खौफनाक भविष्यवाणी की काली छाया सबके चेहरों पर साफ दिख रही थी.
छोटे भाई के सिर का एक्सरे, वह खोपड़ी, देख मैं एकदम सहम गया था. यह खोपड़ी और ऐसी ही खोपड़ियां उन तमाम हँसते बोलते सुंदर लोगों के अन्दर हैं? नशीली आँखों के पीछे ऐसे ही गड्ढे है? और यही हूँ मैं?
उसके बाद घर के माहौल को जैसे एक ग्रहण लग गया. सभी ऊपर से सामान्य दिखने की कोशिश करते और अन्दर डॉक्टर के उस वाक्य से जूझते रहते. पिताजी मिट्ठू को लेकर बहुत भावुक थे.
बात १९७७ ध् ७८ की है. तब मैं रांची कॉलेज से बी ए पास कर एम ए में प्रवेश का इंतजार कर रहा था. मेरा कोई दोस्त नहीं था. कोई शौक नहीं थे. मन की अशांति का उपाय खोजने के लिए मैं सिर्फ दर्शन और धार्मिक किताबें पढता. लेकिन जीवन और मृत्यु, जीवन और संसार की निरर्थकता, अस्तित्व की अर्थहीनता – या यूँ कहें कि एक घने नकारवाद ने मुझे घेर लिया था.  जिसका कोई निदान मुझे न उन पुस्तकों में मिलता था, न किसी पूजा पाठ में. किसी बात में कोई रस नहीं. न कोई आकांक्षा, न कोई दिलचस्पी. परेशानी बहुत बढ़ जाए, खास कर शाम को, तो खुद से भागने के लिए निरुद्देश्य भटकना इधर उधर.
“बोल मिट्ठू, बोल, अम्मा, बोल मिट्ठू, बोल बाबा.”
सुग्गा सीख गया. मिट्ठू ने बोलना नहीं सीखा, लेकिन सब उसे मिट्ठू ही कहने लगे. वर्षों अम्मा इस उम्मीद में रहीं कि मिट्ठू कभी नानी माँ के सुग्गे की तरह ही टर टर बोलने लगेगा. कितने पूजा पाठ, गंडे-ताबीज, ज्योतिषी, पीर के यहाँ अम्मा दौड़ीं, लेकिन मिट्ठू को न बोलना था, न बोला. उम्मीद कब नाउम्मीदी में पथराई किसी को पता भी नहीं चला. पिताजी तो अब किसी भी पूजा पाठ का नाम सुनते ही चिढ़ जाते थे. मिट्ठू सोलह सत्रह साल का हो चुका था, लेकिन वही बच्चा का बच्चा. उसकी आंखों मे देखिये तो कभी दो ढाई साल का शरारती बच्चा दिखेगा, कभी एकदम उदास, अर्थहीन अस्तित्व. डॉक्टर ने भले अब कहा हो कि वह ज्यादा नहीं जियेगा, लेकिन पिताजी को ये डर शुरू से ही था. इसलिए मिट्ठू जैसा था, उन्होंने उसे वैसा ही स्वीकार कर लिया था. कभी कभी उन्होंने ये कोशिश जरूर की थी कि उसे किसी विशेष स्कूल में भरती करा दें ताकि वह कुछ सीख सके लेकिन बिहार झारखण्ड में ऐसा कोई स्कूल नहीं था. एकाध अनाथालय किस्म के थे, जिनमे बच्चों की हालत देख माँ पिताजी सिहर गए थे. फिर उन्होंने खोज बंद कर दी थी. साल यूँही बीतते गए माँ की ठोकरें खाती उम्मीदों में और पिताजी की स्टोइक नाउम्मीदी में. जिन्दगी चल ही रही थी, अर्ध चेतना में, जिसे अब अचानक बेहोशी के दौरों और डॉक्टर की भविष्यवाणी ने एकबारगी झकझोर दिया था. सारी जांच पड़ताल, दौड़-धूप का स्थाई निष्कर्ष बस यही निकला कि कभी भी दौरे पड़ सकते हैं और कभी भी …. नहीं इसके आगे
ऐसी ही एक शाम, धुंध भरी, बस्ती से दूर भटकते हुए मैंने पीछे देखा-डोरंडा मोहल्ले की बत्तियां दिख रही थीं. अँधेरे में वापस लौटते समय शहर की बत्तियां बहुत दूर दीख रही हैं. अँधेरे में न रास्ते का पता है और न पत्थरों का. ठोकरें बताती हैं किधर कहाँ मुड़ना, किधर झुकना. पता नहीं कोई पगडण्डी भी है या बस यूँही बियाबान. पीछे श्मशान में क्या सचमुच भूत रहते हैं? वो भी तो देखते होंगे दूर शहर की ये बत्तियां. क्या सोचते होंगे वे इन्हें देख कर? उन्हें लगता नहीं होगा कि वे अब जिन्दगी और रोशनी से वंचित हैं? आउटकास्ट पैरिया हैं? उदास नही हो जाते होंगे वे इस वंचित अस्तित्व से? कैसा लगता होगा उन्हें? मैंने महसूस करने की कोशिश की. कल्पना करूं कि मैं भी एक भूत हूँ और अब से चालीस पचास साल बाद या सौ दो सौ साल बाद ऐसे ही किसी श्मशान के अँधेरे से सुदूर शहर की रोशनियाँ देख रहा हूँ. कैसा लगेगा मुझे-आउटकास्ट फॉर एवर होकर? तबतक ये रोशनी ये शहर का स्वरूप बिलकुल बदल चुका रहेगा. आगे भी बदलता जायेगा लेकिन क्या फर्क पड़ता है? जिंदगी और मौत का फासला तो वही रहेगा. एक बार भूत बनने के बाद मैं हमेशा भूत ही रहूँगा-वंचित, क्षुब्ध, अपने होने से नाराज. मुझे सिहरन हो आई अपनी इस कल्पना से.
एक बार मैंने कल्पना करने की कोशिश की थी कि यदि मैं मिट्ठू जैसा हो जाऊं तो कैसा महसूस करूंगा. उस समय कुछ खास महसूस नहीं कर सका. लेकिन दो तीन दिनों बाद सपने में लगा कि मैं बोल नही पा रहा हूँ. मेरी गुलाबी बैचमेट मेरे घर के सामने खड़ी है, किसी से कह रही है-‘’देखो, गुंजन को क्या हो गया है.’’
 मैं उसे पुकारने की कोशिश करता हूँ, चीखना चाहता हूँ, लेकिन हलक से कोई आवाज ही नहीं निकलती. नींद खुल गई थी, डर से गूं गूं करते हुए, पसीने से लथपथ और दिल जोरों से धड़कता हुआ. नहीं. ये सब बिलकुल नहीं सोचना चाहिए. जिंदगी और मिट्ठू के बारे में स्वामी जी ने समझाया था-“व्हाट कैनॉट बी क्योर्ड, मस्ट बी एनद्योर्ड.”
मैं घर में घुसा तो दूर से ही कुछ गहमा गहमी दिखी थी. चार पाँच लोग बाहर बरामदे में हँसते गपियाते खड़े थे. अन्दर जाते ही बहन मुस्कुराते हुए बोली, “पिताजी का प्रोमोशन हो गया है. कल ही डाल्टनगंज ज्वाइन करने जा रहे हैं.” सुन कर मुझे भी खुशी हुई. लेकिन मन कहीं भीतर डूबा ही रहा.
अगली सुबह पिताजी डाल्टनगंज जाने लगे तो मुझे भी खींच ले गए. बोले, ‘’आप आजकल बहुत उदास और सबसे भागे भागे रहते हैं. मेरे साथ डाल्टनगंज घूम आइये तो मन बदलेगा.’’
मन तो खैर क्या बदलेगा, लेकिन जाने से भी क्या फर्क पड़ता है?
मैं साथ चला गया. वहां अकेलापन और गहरा गया. नई जगह. बड़ा सा घर, रहनेवाले सिर्फ हम दो और एक चुप्पा खानसामा.
“क्या बात है? किस सोच में आप डूबे रहते हैं?”
– “कुछ नहीं.”
– “कुछ तो है. जो भी बात हो मुझे बताइये. आप कुछ छिपा रहे हैं.”
उनके बार बार पूछने पर भी मैं कुछ बता नहीं पाता था. क्या बताता ? कैसे बोलता कि आपके पाँव मिटटी बन कर मुझे डराते हैं? क्या बताता? यही कि आप का शरीर मुझे मिटटी नजर आता है? मिट्ठू की मृत्यु के दुह्स्वप्न देख कर मैं रातों को सो नहीं पाता हूँ? सपनों में श्मशान, गिद्ध और हड्डियाँ देखता हूँ? जीवन को निरर्थक अस्तित्वहीन देखता हूँ? क्या बताता उन्हें? कैसे कहता कि आप और आपका ये संसार, ये बंगला, पोस्ट और परिवार, हमारा सारा वजूद मिथ्या है, बस मिटटी है. कहीं कुछ भी नहीं जो स्थाई हो, जिसे थाम कर मैं नकारवाद के इस अथाह समुद्र से बाहर निकल सकूं. इस सब मिथ्या के मुकाबले महान मनीषियों ने जिस चिरंतन ईश्वर की कल्पना की है, उसका भी कोई माने-मतलब है नहीं. और अगर हो भी तो हमे क्या फर्क पड़ता है? उस ईश्वर के लिए हम तो वही हैं, ऐज फ्लाइज टू वैनटन बॉयज …
एक शाम पिताजी ऑफिस से लौटे, मेरा चेहरा पढ़ा और बोले,
“चलिए, आपको घुमा लायें.”
मैं चुपचाप उनके साथ गाड़ी में बैठ गया. कोई उत्सुकता नहीं कि कहाँ जा रहे हैं.
जीप जल्द ही शहर से बाहर निकल गई. गाड़ी चलाते हुए वे रास्ते और उनमें दिखने वाले खास पेड़ पौधों के बारे में बताते जा रहे थे दृ वैज्ञानिक नाम, प्रजाति, उपयोग और न जाने क्या क्या. उधर मैं गाल पर हाथ रखे एकदम निर्लिप्त बैठा था. क्या फर्क पड़ता है दृ कुछ भी नाम हो. कोई उपयोग हो.
जल्द ही हम बरवाडीह पहुँच गए. वहां उन्होंने रेंज ऑफिसर मुजीब खान साहब को साथ ले लिया और आगे चल पड़े. दोनों फारेस्ट अफसरों के बीच बैठा मैं उनकी बातचीत एकदम उदासीन भाव से सुन रहा था, बल्कि सुन भी नहीं रहा था. लेकिन कुछ हिस्से मेरे कानों में पड़ जा रहे थे. जैसे,
“जिस जंगल से हम गुजर रहे हैं, ये टाइगर प्रोजेक्ट का डूब एरिया है. जिस कुटकू रेस्ट हाउस में आज रात ठहरेंगे, अगले साल उसके सौ फुट ऊपर तक पानी रहेगा, क्योंकि डैम पूरा होने के बाद वहां जलस्तर 1100 फुट हो जायेगा जबकि रेस्ट हाउस 1000 फुट पर ही है.’’
मुझे क्या लेना देना था ?
रात हो चुकी थी. घुमावदार रास्ते के दोनों ओर जीप की हेडलाइट्स के दायरे में दिख रहे थे, घने जंगल के लंबे चैड़े पेड़. वे पेड़ गाड़ी बढ़ने के साथ तुरंत फिर उसी अँधेरे में गुम हो जाते. सामने सीमित रौशनी और बाकी हर ओर से खदेड़ता हुआ घुप्प अँधेरा. लग रहा था अँधेरा गाड़ी से दौड़ लगा रहा हो. कभी कभी कोई हिरन, साम्भर या कोई अन्य जानवर सड़क के अगल बगल दिख जाता. कभी किसी झाडी में छिपी आँखें जीप की रौशनी में चमकतीं, और फिर तुरंत चारो ओर फैले अँधेरे का हिस्सा बन जातीं. पिताजी पहले भी बता चुके थे, अँधेरे में जो आँखें हरी चमकती हैं, वे घासफूस खानेवाले जानवरों की होती हैं और जो लाल चमकती हैं, वे मांसाहारी जानवरों की होती हैं. अधिकतर तो हरी ही थीं. लेकिन कभी कभार कोई लाल ऑंखें भी दिखीं.
जंगल की अनगिनत आवाजें जीप के इंजिन की आवाज में दब जाती होंगी वर्ना जंगल कभी चुप कहाँ होता है! अनगिनत आवाजें आती रहती हैं. बस कान लगा के सुनिए तो…..वो बुलाते हैं. मैंने जंगल की यह पुकार अपने खून में कई बार महसूस की है. आदिम पुकार जिससे डर भी लगता है और जिसका आकर्षण आपको कहीं चैन से जीने भी नही देता. यह वही पुकार है जंगल की जो आवारगी जगाती है. आला दर्जे की आवारगी जिसमें आप अपनी रूह से मिलने निकल पड़ते हैं, कभी सुरक्षित पिकनिक में, तो कभी दुर्गम एकाकी जंगलों में.
जिन आवाजों को कभी भूल नही पाऊँगा, उनमें एक सुनी थी जब मैं शायद आठवीं में था. पटना से हम सपरिवार ट्रेन से गया पहुंचे थे. रात में ही जीप से चतरा के लिए चल दिए थे. रास्ते में एक घने जंगल के बीच गाड़ी खराब हो गई. सुबह का इंतजार करने के अलावा कोई उपाय नहीं था.
शायद अक्टूबर या नवम्बर का महीना था. हल्की ठण्ड लेकिन गर्म कपड़ों में बर्दाश्त करने लायक. अम्मा की हिदायत थी कि हम सब एकदम चुप रहें. डर के मारे हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं था. धीरे धीरे रात गहराने लगी और उसके साथ जंगल की आवाजों का स्वभाव बदलता गया. कभी कई जानवरों, और चिड़ियों की आवाजें एक साथ आतीं, कभी सिर्फ झींगुर की एकरस ध्वनि, फिर उस एकरसता को तोड़ते किसी सियार या फेकार की तेज आवाज. अब एकदम नीरव शान्त. गहराती धुंध में डूबी हुई आवाजें, चांदनी में डूबा जंगल. ऊंचे दरख्तों और बांस के पत्तों के बीच से रात बना कर चांदनी जहाँ तहां अंधेरे को भेदती नीचे आ रही थी. हर दरख्त किसी साए सा लगता था, हल्की हवा और सफेद अँधेरे में हिलता हुआ. कभी कभी दूर से किसी जानवर की आवाज आती तो लगता कि वह जरूर हमारी ही तरफ आ रहा होगा. जानवरों की उन आवाजों का कोई मतलब मेरी समझ में नही आ रहा था. हम चारो भाई बहन दम साधे जीप के अन्दर बैठे थे. लेकिन रात का मौन गहराने के साथ एक अलग किस्म की आवाज को बरबस ध्यान से सुनने लगा. यह आवाज थी पत्तियों से ओस के टपकने की आवाज. एकदम नीरव सफेद शांत के बीच टप…. टप….. टप… रात के जंगल में पेड़ों की पत्तियों से धीमे धीमे ओस टपकने की आवाज अद्भुत होती है, खास कर अगर रात चांदनी हो.
लेकिन यह बचपन की बात थी. कुटकू जाते समय चांदनी नहीं, घुप्प अँधेरा था और मैं अब निस्सारता जैसे सवालों से छाया-युद्ध करने लायक होने लगा था. पलामू के भीतरी जंगलों से यह मेरी पहली मुलाकात थी और मैं अपनी इच्छा से आया नही था, लाया गया था, ताकि मुझे अपनी कभी न खत्म न होनेवाले नश्वरतावाद से बाहर निकाला जा सके. लेकिन जो नश्वरतावाद मन के भीतर इतना गहरे फंसा बैठा था कि किसी भी बात का, जीने मरने का कोई मतलब नहीं रह गया था. (क्रमशः)

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