पांच  जनवरी २०१९ को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने पलामू में मंडल डैम का शिलान्यास किया !  1972 में शुरू हुई योजना के इस दोबारा शिलान्यास से सैंतालिस बरस तक थमी महाविनाश की वह गाथा फिर से शुरू हो गयी है जिसने मंडल-कुटकू से जुड़ी यादें गड्ड मड्ड हो रही हैं और उनके साथ जंगलों के असंख्य बिम्ब भी! किससे शुरू करूं गाथा इस महाविनाश की? बिरसी मुन्डाइन से, जिसे मंडल डैम ने मेहनतकश मजदूरिन से वेश्या बना दिया, धनेसर उरांव से जिसे किसान से कैदी बना दिया, सुघड़ खरवार से जिसकी दो पीढ़ियों ने तीन बार विस्थापन झेला, कुटकू के घनघोर जंगलों से जिन्हें बंजर कर दिया, वहां के उन लाखों पेड़ों से जो काटे गए और अब फिर काटे जायेंगे, निरीह जंगली जानवरों से जो बिला वजह मारे गए, उन तितलियों से जो जंगली पगडंडियों पर अपनी गोल पार्लियामेंट बना बैठा करती थीं, उन शहतीरों से जिनके साए में मैंने रातें बिताई थीं, लेकिन फिर जिन्हें बंजर में बेजान पड़े देखा था, या आन्दोलन के नाम पर ठगे गए विस्थापितों से, या शुरू करूं खुद अपने आपसे जिसकी जिंदगी, पूरा अस्तित्व मंडल की एक सुबह ने हमेशा के लिए बदल दिया? कहाँ शुरू करूं मंडल, कुटकू, कोयल, कोइना, हरया, कारो नदियों की यह महागाथा? या फिर उस भ्रष्ट अफसरशाही से जो मोदी की चुनाव सभा के लिए भीड़ जुटा रही है और बेहद डरी हुई भी है कि कहीं काले रंग की कोई चीज महामहिम को न दिख जाए. सफेदपोश सत्ता को काले रंग से बहुत डर लगता है।
पलामू के पुलिस कप्तान ने पत्र जारी किया कि कोई भी व्यक्ति काले रंग की कोई चीज चादर, कपड़ा, छाता – काले रंग का कुछ भी सभा में न लाने पाए लेकिन एसपी साहब उन काली यादों का क्या करोगे जो तुम्हारे जैसे अफसरों, नेताओं, सरकारों ने पलामू, झारखण्ड और पूरे देश को दी हैं? उन काले कारनामों का क्या करोगे जो पिछले पचास वर्षों में मंडल, पूरे झारखण्ड के जंगलों और उनमें रहनेवाले वनवासियों एवं जीव-जन्तुओं के साथ तुमलोगों ने की हैं?
मंडल-कुटकू झारखण्ड का एक बेहद समृद्ध जंगल था. इस इलाके में 1970 तक चालीस से ज्यादा बाघ थे. हाथी थे। अन्य पशु-पक्षी भरे हुए थे. इसीलिए इस सघन वन को अंतर्राष्ट्रीय महत्व के टाइगर प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था।
लेकिन मंडल डैम योजना के चलते यहाँ की प्राकृतिक समृद्धि हमेशा के लिए खत्म हो गई।  हजारों जंगली जानवर मारे गए, बेघर हुए, अरबों रूपए बर्बाद हुए, हजारो लोग बेघर हुए. उनका पूरा सामाजिक सांस्कृतिक ताना-बाना ही बिखर गया।
मंडल डैम मनुष्य की धनलिप्सा की एक छोटी कहानी नहीं, महाभारत जैसी एक त्रासद महागाथा है।  इसके कुछ सिरे व्यक्तिगत रूप से मुझ से जुड़े हैं. कुछ जंगलों और जंगलों में रहनेवाले लाखों गरीब आदिवासियों, वनवासियों, विस्थापितों, पेड़ों, नदियों, पहाड़ों, वन्य जानवरों, पक्षियों और जंगलों की जमीन व आकाश से जुड़े हैं।   जैसे जैसे मैं अपनी शाम की ओर बढ़ रहा हूँ, जंगल मुझे पुकारते हुए कहता है – आ जाओ, अपनी माँ की गोद में, आओ मैं फिर से तुम्हें स्वस्थ कर दूं. लेकिन अब मैं नहीं जा सकता. बहुत दूर निकल आया हूँ. इसलिए लिख रहा हूँ,  विदाई का यह गीत. किसकी विदाई ? जंगल की या मेरी? या दोनों की?
यह किताब झारखण्ड/बिहार के जंगलों और उनसे जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित है, लेकिन यही स्थिति पूरे देश के जंगलों की है. मंडल और सारंडा जैसे जंगलों का नाश, जानवर, अविकास, अंधविश्वास, आदिवासी,  नक्सल, पर्यावरण, प्रदूषण, भ्रष्टाचार, विस्थापन, डायन-हत्या, प्राकृतिक सम्पदा का निर्मम दोहन – देश के कई इलाकों में आम मुद्दे हैं.
झारखण्ड एक परखनली है. इसमें पूरे देश के जंगलों, जंगली जीवों और वनवासियों के विनाश की प्रक्रिया देखी जा सकती है.
इस गंभीर विषय में मेरा दखल बस इतना है कि मेरे पिता एक वन अधिकारी थे, सो बचपन से मुझे जंगलों में जाने, जीने, उन्हें देखने-जानने के मौके मिले. मेरे पास  बस कुछ अनुभव हैं. जंगल से इसी भावात्मक  सम्बन्ध  के।
प्रकृति हमारे निजी जीवन, उसके सुख दुःख को स्पर्श करती है. प्रकृति की सबसे आकर्षक अभिव्यक्ति, है जंगल।  यह तन और मन दोनों को चंगा करता है। नदियों, पहाड़ों, जंगलों में रहने वाले इंसानों और जीव-जंतुओं को लगातार नष्ट कर प्रकृति की अमूल्य देन को खत्म किया जा रहा है। लेकिन आम लोग ऐसे व्यवहार कर रहे हैं, मानो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. कहीं कोई प्रभावकारी विरोध नहीं है।
दुनिया ने ग्रेटा वेनबर्ग के रुंधे हुए गले से उनकी बातें सुनीं, आंसू देखे, कुछ देर सोचा और फिर रोजमर्रे की ओर बढ़ लिए।  आप रुकें और देखें अपने आस पास – आपका रुकना, देखना, बोलना और गलत का विरोध करना ज़रूरी है.
किसी इलाके में उग्रवाद तभी बढ़ता है, जब व्यवस्था का भ्रष्टाचार और ऐय्याशी बढ़ती है, या फिर तब, जब किसी प्रशासनिक या प्राकृतिक कारण से लोगों का जीना कठिन हो जाए. अन्यथा आम तौर पर आम लोग शांतिप्रिय और सीधे ही होते हैं. ये सीधे सादे लोग अचानक क्यों उग्र होते चले जा रहे हैं ?

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