कुछ साल पहले तक भारत की आजादी का जश्न मनाते वक्त कम से कम इस बात पर हम फख्र कर सकते थे कि भारत एक लोकतंत्र है। हमारी चितंा इसे बेहतर बनाने की होती थी कि हम कैसे देश में बसने वाले सभी समूहों को भागीदारी दें। हमें लगता था कि अगर लोकतंत्र को सच्चा बनाना है तो आर्थिक और सामाजिक बराबरी की ओर बढना होगा। हमारी चिंता यह नहीं होती थी कि लोकतंत्र बचेगा या नहीं। 1975 में लगी इमरजेंसी के वक्त यह ख्याल जरूर आया था कि भारत में लोकतंत्र नहीं बचेगा। लोगों को यह लगा था कि शायद इंदिरा गांधी चुनाव नहीं कराएंगी। लेकिन उन्होंने न केवल 1977 में चुनाव कराए बल्कि 1980 में सत्ता में अपनी वापसी के बाद इमरजेंसी के दौरान बने उन कानूनोें को वापस लाने की जिद भी नहीं की जिसे जयप्रकाश नारायण के अंादोलन के कारण सत्ता में आई जनता पार्टी की सरकार ने रद्द कर दिए थे। कांग्रेस ने दोबारा इमरजेंसी का नाम भी नहीं लिया। आपातकाल की परीक्षा पास करने के बाद यह भरोसा हो गया था कि भारत के लोकतंत्र को कोई हरा नही सकता। हम समझने लगे थे कि पार्टियां सत्ता में आएंगी और जांएंगी, वे चुनाव जीतने के लिए पैसे तथा ताकत का इस्तमाल करेंगी तथा लोगांे की भावनाएं भड़काएंगी, लेकिन अंत में उन्हंे जनता की बात ही माननी पड़ेगी। टीएन शेषण के कार्यकाल में और इसकेे बाद चुनाव आयोग ने इतनी शक्ति हासिल कर ली थी कि यह लगने लगा था कि देश जनादेश को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक ढंग से प्रभावित करने की कोशिशें भी बर्दाश्त नहीं करेगा। जाति और सांप्रदायिक भावनाओं के आधार पर वोट मांगने के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अपना लिया था। क्या आजादी के 75वें साल में प्रवेश करते समय हम यह दावा कर सकते हैं कि हमारा लोकतंत्र साबूत है?
इस सवाल के जवाब में लोग पश्चिम बंगाल का उदाहरण दे सकते हैं कि बेशुमार पैसा बहाने, सरकारी संस्थाओं का दुरूपयोग करने, चुनाव आयोग के पक्षपात और सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी चुनाव नहीं जीत पाई और ममता बनर्जी वापस सत्ता में आ गई। लेकिन हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि बंगाल के चुनावों में भारतीय लोकतंत्र घुटने पर आ गया और वह कभी भी औंधे मुह गिर सकता है। इसके संकेत चंुनाव नतीजों के बाद राज्यपाल केे आचरणों और भाजपा की नौटंकियों में देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के जनादेश को खारिज करने में लगे हैं।
पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों से संतुष्ट होने वालों को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि मोदी-शाह से लोकतंत्र को बचाने के लिए लोगों को ममता बनर्जी की शरण में जाना पड़ा जिन पर व्यक्तिवादी ढंग से राज चलाने का आरोप है। वहां के नतीजों से कारपोरेट घराने भी खुश हांेगे कि लेफ्ट का सफाया हो गया। विचारधाराओं की विविधता को इस राज्य में भयंकर नुकसान हुआ है। यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। असल में वहां भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे कमजोर प्राणि की शक्ल में दिखाई दे रहा है जिसके वस्त्र चीथड़े हो गए हैं।
भारतीय लोकतंत्र की दुर्गति का सबसे बड़ा सबूत दिल्ली की सीमाओं पर महीनों से चल रहा किसानों का धरना है। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में जुटे लोग पूरे अनुशासन के साथ सत्ता की कठोरता तथा फरेब का अहिंसक मुकाबला कर रहे हैं। वे तीखी गर्मी, कड़ाके की ठंड और भारी बारिश के बीच वे पुलिस की घेराबंदी में डटे हैं। देश का पूरा विपक्ष उनके समर्थन में खड़ा है। लेकिन सरकार पूरी ढिठाई के साथ इस पर अड़ी है कि वह उन तीन कानूनों को वापस नहीं लेगी जो उसने खेती को कारपोरेट घरानोे को संौपने के लिए बनाए हैं।
हमने नागरिकता संशोधन कानून के मामले में देखा कि किस तरह शाहीन बाग की महिलाओं के आंदोलन को बदनाम करने तथा उनकी आवाज का दबाने के लिए सरकार ने हर तरह के हथकंडे अपनाए।
हम इस हालत की तुलना 2012 के अन्ना आंदोलन से करें तो फर्क समझ में आएगा। किसान आंदेालन की तुलना में काफी कम जन-समर्थन वाले आंदोलन की बात संुनने के लिए मनमोहन सरकार को मंत्रियों की कमेटी बनानी पड़ी थी। दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के आमरण अनशन पर संसद ने चर्चा की थी। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि मनमोहन सरकार को कोयला घोटाले से लेकर टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच करानी पड़ी थी। स्पेक्ट्रम घोटाले पर कैग की रिपोर्ट ही इसका सबूत है कि संस्थाएं कितनी आजादी से काम कर सकती थीं। कैग के मुखिया विनोद राय जिस जोश और आत्मविश्वास के साथ मीडिया के सामने पेश होते थे, वह किसी भी संवैधानिक संस्था के मुखिया के चेहरे पर आज दिखाई देता है क्या? चंुनाव आयोग से लेकर रिजर्व बैंक तक सकुचाए चेहरों की फौज ही दिखाई देती है।
यह भी याद रखने की जरूरत है कि विशाल बहुमत के सहारे सरकार चला रहे राजीव गांधी ने भी बोफोर्स घोटाले की जांच संसदीय समिति से कराई थी। बोफोर्स घोटाले के मुकाबले रफाल घोटाले में ज्यादा साफ सबूत हैं जिनकी जांच की जरूरत है। लेकिन मोदी सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा है।
इन सबसे बढ कर है पेगासस का मामला। भले ही लोग साफ-साफ देख रहे थे कि 2014 के बाद से सुप्रीम कोर्ट से लेकर बाकी तमाम संस्थाएं सरकार के खिलाफ कदम नहीं उठा रही थीं। लेकिन उनके सामने पर्दे के पीछे चल रही गतिविधियों साफ तस्वीर नहीं थी। यह अंदाजा लोग जरूर लगा लेते हैं कि संस्थाआंे की बांह मरोड़ने के लिए अपने लोगों को बहाल किया जा रहा है या सरकार का विरोध करने वाले लोगों की फाइलें खोली जा रही हैं। लेकिन भारत में एक ऐसा दिन भी आएगा कि नाजी जर्मनी या स्टालिन के सोवियत रूस की तरह विरोधियों ही नहंी अपने लोगों की हर गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी, उनकी हर बातचीत सुंनी जाएगी और उनके मिलने-जुलने का हिसाब-किताब रखा जाएगा। इस तरह का खुफिया तंत्र लोकतंत्र में नहंी चल सकता है। पेगासस का मामला सामने आने से इस बात का सबूत आ गया है कि भारतीय लोकतंत्र एक फासीवादी राज्य में बदल गया है और यह महज व्यक्तिगत पसंद या नासंदगी की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। यह इस बात का संकेत है कि वह लोगों को जवाब देना जरूरी नहीं मानते हैं। विपक्ष और संसद के साथ भी वह इसी तरह का रवैया अपनाए हैं। पेगासस खुलासें ने यह बता दिया है कि वह विरोधियों का सामना जनता की अदालत में करने के बदले उन्हें ‘ठीक’ करने में यकीन करते हैं। पेगासस ‘ठीक’ करने के काम आने वाला हथियार है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि जब सत्ता को जनमत की फिक्र न रहे तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र श्मसान की ओर बढ रहा है। पेगासस खुलासा इसी का संकेत दे रहा है।
लोकतंत्र के साथ ही सेकुलरिज्म का मसला है। उस मोर्चे पर हमारी हालत का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि कि भारत का प्रधानमंत्री राममंदिर का शिलान्यास करता है। बाबरी मस्जिद का ध्वंस भारत के सेकुलरिज्म पर कुल्हाड़ी का प्रहार था। लेकिन प्रधानमंत्री का आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ मंदिर के शिलान्यास की पूजा करना भारत के हिंदू राष्ट्र में बदलने की अनौपचारिक घोषणा है। इस समय हमें याद करना चाहिए कि महात्मा गांधी ने सोमनाथ मंदिर बनाने में सरकारी पैसा लगाने का विरोध किया था और मंदिर बनाने में दिलचस्पी ले रहे सरदार पटेल ने उनकी राय को स्वीकार किया था। जब मंदिर में जीर्णोद्धार के बाद कलश स्थापना के लिए डा राजेंद्र प्रसाद गए तो उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मना किया था और उनके कदम की आलोचना की थी यह राज्य के सेकुलर होने की अवधारणा के खिलाफ है। अब तो सरकारी पैसे से अयोध्या में धार्मिक कार्यक्रम हो रहे है। हिंदुत्व ने देश की राजनीति में ऐसी स्थिति बना दी है कि मोदी के विकल्प में खड़े राहुल गांधी के जनेऊधारी हिंदू होने का दावा पेश किया जाता है। मुसलमानों को पिछले सालों में मॉब लिंचिंग का सामना करना पड़ा है और नागरिकता संशोधन कानून जैसे पक्षपात को झेलना पड़ा है।
फादर स्टेन स्वामी की मौत राज्य प्रायेाजित हिंसा का ही एक नमूना है। इसके पहले हम जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 के खात्मा और स्वायत्तता की मांग कर रहे कश्मीर का राज्य का दर्जा छीन लेने की करतूत देख चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में देश के संघीय ढांचे की महत्वपूर्ण जगह है। हम जानते हैं कि उसकी आज क्या हालत है।
आजादी के 75 वेें साल में यह खोजना भी जरूरी है कि किन वजहों से हमारे लोकतंत्र की ऐसी हालत हुई है और हम अघोषित तानाशाही के दौर में पहुंच गए हैं। एक चीज तो साफ दिखाई देती है कि देश की अर्थव्यवस्था पर देशी-विदेशी पंूजी का शिकंजा कसने और जल, जमीन तथा जंगल की लूट तेज होने का लोकतंत्र पर हमले से सीधा संबंध है। लोकतंत्र को मजबूत करने वाली संस्थाओं-सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक चुनाव आयोग आदि-को कमजोर करने की रफ्तार उसी हिसाब से बढी है। मोदी सरकार उस राजनीतिक व्यवस्था को खत्म करने में लगी है जो आजादी के आंदेालन में उभरे विचारों पर आधारित है। आजादी का आंदोलन उपनिवेशवाद, विषमता तथा सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष था। मोदी सरकार के मार्गदर्शी संघ परिवार के विचार तीनों को बनाए रखने के पक्ष में है। हमें उस लोकतंत्र को फिर से जीवित करने का संघर्ष करना पड़ेगा जिसकी स्थापना आज से 75 साल हमने की।

 

 

 

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