मोदी सरकार इस साल फिर से 4 लाख टन अरहर दाल का आयात कर रही है।   इस साल फसल भी थोड़ी कम हुई।  लेकिन पिछले साल तो दलहन की भरपूर फसल हुई थी , उसके बावजूद सरकार ने मोजाम्बिक से दो लाख टन अरहर और डेढ़ लाख टन मूंग और उड़द की दालों के आयात को हरी झंडी दे दी थी।

आखिरकार ऐसी क्या मजबूरी है जो हमे हर साल मोजाम्बिक से दाल खरीदना पड़ रही है।  दरअसल 2016 में मोदी सरकार ने मोजाम्बिक से एक समझौता किया है। दालों की खरीद के साथ-साथ, वहां दालों की खेती और खेती के लिए जरूर तकनीक मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है।  2016 में अगले पांच सालो के लिए मोजाम्बिक से तुअर और अन्य दालों का आयात दोगुना कर दो लाख टन प्रतिवर्ष करने को मंजूरी दी गयी थी। .यानी यहाँ उत्पादन कम हो या ज्यादा हो हमे दाल मोजाम्बिक से ही खरीदनी होगी। 

भारत दुनिया में दलहनों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, फिर भी उसे अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए हर वर्ष 60 से 70 लाख टन दालों की कमी पड़ती है।  मोदी सरकार चाहती तो यह कमी यही से पूरी की जा सकती है।  देश का किसान ही इतना सक्षम है कि वह दलहन की इतनी और फ़सल आसानी से उगा सकता है। पिछले साल ही दलहन की रिकार्ड फसल हुई है।

लेकिन मोदी सरकार को विशेष रूप से मोजाम्बिक से ही दाल मंगानी है।  ऐसा इसलिए है कि 2015 में ही अडानी जी की कंपनी ने अपने बंदरगाहों पर दलहन के रखरखाव के लिए इंडिया पल्सेस ग्रेंस एसोसिएशन (आईपीजीए) के साथ समझौते कर लिया था।  इसका मकसद देश भर में दालों की लागत प्रभावी आपूर्ति सुनिश्चित करना बताया गया।  इसका सीधा मतलब यह है कि अफ्रीका से आयात होने वाली सारी दाल अडानी के ही पोर्ट पर उतरेगी ओर उसके भंडारण की व्यवस्था भी वही होगी।  यानी पोर्ट पर कितनी भी दाल जमा हो सकती है।  पोर्ट का विशेष दर्जा होने की वजह से चेकिंग होना भी मुश्किल है।

यानी इम्पोर्ट की गयी दाल में अडानी जी की पूरी मनमानी चलेगी और  वो जो भाव निर्धारित करेंगे उसी दाम पर मोहर लग जाएगी। मोजाम्बिक के किसानों को ट्रांसपोर्टेशन तक की कीमत भारत सरकार चुकाएगी और  भारत मे दलहन का कम या ज्यादा उत्पादन होने के भी किसानों को सही कीमत नहीं मिलेगी।

यही तो है सबका साथ ओर सबका विकास!

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